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क्षत्रपों की राजनीति को नापेगी आप

अरविंद केजरीवाल ने सपना दिखाया, लोगों ने उन पर यकीन करते हुए अपना समर्थन दिया। अब एक बार फिर से बारी अरविंद केजरीवाल की है। जनता की उम्मीदों पर अगर वे खरे उतरते हैं, तो इससे न सिर्फ लोगों की सोच बदलेगी, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था ही बदल जाएगी. 
अरविंद केजरीवाल ने सपना दिखाया, लोगों ने उन पर यकीन करते हुए अपना समर्थन दिया। अब एक बार फिर से बारी अरविंद केजरीवाल की है। जनता की उम्मीदों पर अगर वे खरे उतरते हैं, तो इससे न सिर्फ लोगों की सोच बदलेगी, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था ही बदल जाएगी. 
 
जिस देश की पूरी राजनीति जातीय समीकरण, अपराध के राजनीतिकरण, सेक्युलर बनाम कम्युनल और धनकुबेरों पर आधारित हो, उसी देश में एक साल के भीतर एक आंदोलन से निकली पार्टी ने दिल्ली की राजनीति को बदल कर देश की जनता की आंखें खोल दी है। यह पार्टी है अरविंद केजरीवाल के संरक्षण में चलने वाली आम आदमी पार्टी अर्थात आप। 2013 के 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने न केवल 15 साल से दिल्ली की सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी को पैदल कर दिया, बल्कि भाजपा की राजनीति को भी रोक दिया है। लेकिन इस आप पार्टी की राजनीति यहीं तक नहीं है। 
 
इस चुनाव में कई तरह के उलटफेर आप पार्टी ने किए हैं। अरविंद केजरीवाल ने तीन बार लगातार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को करारी मात दी है। इस आप पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा के कई दिग्गज नेताओं की जमीन खिसका दी है। इसी आप पार्टी ने उन सभी बाहरी लोगों का वोट लिया है, जो कभी कांग्रेस और भाजपा में बिक जाते थे। इसी आप पार्टी ने चंदे के दम पर चुनाव लड़ने की कला देश के सामने पेश की है। जाति विहीन, संप्रदायविहीन और अपराधविहीन राजनीति कैसी होती है और इस राजनीति को देश की वही जनता कैसे आगे बढ़ाती है, जो अब तक कांग्रेस और भाजपा के बीच हांफती नजर आती थी, इसका भी एक सटीक नमूना केजरीवाल ने पेश किया है। याद रखिए केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की यह राजनीति आगे कितना सार्थक रहेगी और तमाम तरह के गुणा भाग से कब तक बची रहेगी, कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तो साफ है कि आगामी लोकसभा चुनाव में यह नई नवेली पार्टी तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की राजनीति को बिगाड़ने के लिए काफी है। मोदी की राजनीति को रोकने के लिए काफी है और लंपट राजनीति के लिए एक सबक है आप पार्टी। 
 
केंद्र सरकार के कुशासन और भ्रष्टाचार के गर्भ से निकली यह पार्टी आजाद भारत में 77 के बाद की एक दूसरी राजनीतिक क्रांति के रूप में सामने आई है, जिसके पास जनता के अलावा कोई अलग पूंजी नहीं है। 77 के चुनाव में जेपी की अगुआई में जनता पार्टी ने कांग्रेस की निरंकुश और भ्रष्ट सरकार को धूल चटा दी थी। उस जनता पार्टी के पास भी कोई पूंजी नहीं थी, न कोई जातीय समीकरण था और न ही किसी के पास राजनीति करने का कौशल, लेकिन जनता ने बदलाव किया और इंदिरा गांधी की हार हुई थी। अरविंद केजरीवाल आज उसी 77 के आंदोलन की याद दिला रहे हैं। आप की आगामी राजनीति का देश की सियासी राजनीति पर क्या असर होगा? इसकी हम चर्चा करेंगे, लेकिन थोड़ी जानकारी पार्टी के गठन, उसके आंदोलन और उसके इरादों को लेकर हो जाए।
 
आम आदमी पार्टी सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल एवं लोकपाल आंदोलन के बहुत से सहयोगियों द्वारा संगठित भारतीय राजनीतिक दल है। इसके गठन की आधिकारिक घोषणा 26 नवंबर 212, को भारतीय संविधान अधिनियम की 63वीं वर्षगांठ के अवसर पर जंतर-मंतर पर की गई थी। वर्ष 2011 में इंडिया अगेंस्ट करप्शन संगठन द्वारा अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए जनलोकपाल आंदोलन के दौरान भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा जनहित के प्रति प्रदर्शित उपेक्षापूर्ण और अहंकारपूर्ण रवैये के कारण राजनीतिक विकल्प की संकल्पना की जाने लगी थी। अन्ना हजारे भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन को राजनीति से अलग रखना चाहते थे, जबकि आंदोलन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव एवं अन्य सहयोगियों ने चुनाव में शामिल होने का फैसला किया। इसके द्वारा भारत के भ्रष्टाचार में संलिप्त राजनीतिक दलों का विकल्प देने की कोशिश की गई। गठन के बाद से इस दल ने अनेक प्रतिरोध किया, जिसमें सरकार एवं पूंजीपतियों की साठ-गांठ से बिजली, पानी आदि के मूल्यों में वृद्धि एवं यौन उत्पीड़न के विरुद्घ एक सशक्त कानून की मांग आदि शामिल हैं।
 
इंडिया अगेंस्ट करप्शन द्वारा सोशल साइट्स पर किए गए सर्वे में राजनीति में शामिल होने के विचार को व्यापक समर्थन का संकेत मिला। 19 सितंबर 2012 को हजारे और केजरीवाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उनके राजनीति में शामिल होने संबंधी मतभेद अंतहीन हैं, इसलिए उन्होंने समान लक्ष्यों के बावजूद अपना रास्ता अलग करने का निश्चय किया। जनलोकपाल आंदोलन के मनीष सिसोदिया, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव आदि कई प्रमुख लोगों ने केजरीवाल का साथ दिया, जबकि किरण बेदी, संतोष हेगड़े आदि कुछ अन्य प्रमुख लोगों ने हजारे से सहमति प्रकट की। केजरीवाल ने दो अक्टूबर 2012 को महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर राजनीतिक दल बनाने के फैसले की घोषणा की और भारतीय संविधान को अंगीकृत किए जाने की वर्षगांठ 26 नवंवर को इसका औपचारिक गठन किया गया।
 
इस पार्टी की संरचना भारत की अन्य राजनीतिक पार्टियों से अलग है। इस पार्टी ने अपने कामकाज के लिए निम्नलिखित मानक तय किए हैं-
 
-आम आदमी की पार्टी में कोई केंद्रीय आलाकमान नहीं होगा। परिषद के सदस्य ही कार्यकारिणी का चुनाव करेंगे और उन्हें वापस भी बुलाने की शक्ति भी होगी।
-इस पार्टी का वादा है कि हमारा कोई भी विधायक या सांसद अपने वाहनों पर लालबत्ती या किसी अन्य चिह्न का प्रयोग नहीं करेगा।
-इस पार्टी का वादा है कि इस पार्टी का कोई विधायक या सांसद किसी विशेष सुरक्षाबल का प्रयोग नहीं करेगा।
-इस पार्टी का वादा है कि हमारा कोई भी विधायक या सांसद किसी भी आलीशान सरकारी बंगले में नहीं रहेगा।
-आम आदमी पार्टी का वादा है कि उनकी पार्टी का कोई भी सांसद और विधायक 25 हजार से ज्यादा वेतन नहीं लेगा।
-इस पार्टी का वादा है कि अपराधियों और गुंडों को कभी भी टिकट नहीं दिया जाएगा। इसके साथ ही जांच के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा की कि जिन व्यक्तियों का आपराधिक रिकॉर्ड है या जिनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो चुके हैं, उन्हें पार्टी से चुनाव लड़ने नहीं दिया जाए।
-इस पार्टी का वादा है कि वह पूर्ण वित्तीय पारदर्शिता के साथ कार्य करेगी। दान द्वारा एकत्रित हर एक पैसे का ब्यौरा पार्टी की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाएगा। चुनावी खर्च को भी वेबसाइट पर घोषित किया जाएगा।
-इस पार्टी का वादा है कि वह एक ही परिवार के दो सदस्यों को टिकट नहीं देगी। साथ ही वे कार्यकरिणी के सदस्य भी नहीं बन सकते।
-इस पार्टी का वादा है कि अगर वह सत्ता में आती है, तो राइट टू रिजेक्ट कानून बनाया जाएगा।
-इस पार्टी का वादा है कि सत्ता में आने के बाद एक महीने के अंदर केंद्र में अन्ना वाला जनलोकपाल बिल और राज्यों में लोकायुक्त कानून पास किया जाएगा, जिसके दायरे में प्रधानमंत्री से लेकर चपरासी ग्रेड तक के लोग होंगे।
 
दरअसल, अन्ना जनांदोलन ने राजनीतिक दलों के चेहरों पर पड़े लोक हितैषी नकाब को हटाकर स्वार्थी सत्ताकांक्षी और जनविरोधी चरित्र को स्पष्ट कर दिया था। विपक्षी दलों के साथ ही इसमें सबसे विकृत चेहरा केंद्र में सत्ताधारी दल कांग्रेस का नजर आया। उसके वकील मंत्रियों कपिल सिब्बल, पी. चिदंबरम आदि ने स्वयं को शासक एवं अन्ना हजारे की टीम को गुलाम मानकर तुगलकी आदेश और बयान जारी किए थे। 14 अगस्त को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे पर व्यक्तिगत रूप से आक्षेप लगाते हुए कहा कि अन्ना भ्रष्ट हैं। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति सावंत की रपट का संदर्भ दिया था, जिसमें अन्ना को दोषी ठहराया गया था। उन्होंने यह नहीं बताया था कि न्यायमूर्ति सावंत की रपट के बाद इस मुद्दे पर सुखतांकर आयोग ने जांच की थी और अन्ना को आरोपमुक्त कर दिया था। इस आंदोलन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी, अंबिका सोनी आदि के साथ ही विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, लालकृष्ण आडवाणी, सीताराम येचुरी आदि का कद भी छोटा कर दिया। मनमोहन सिंह ने संसद में इस आंदोलन के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होने की चेतावनी दी थी। अंबिका सोनी ने इसे साफ करते हुए अमेरिका का नाम उजागर किया था।
 
सभी नेताओं ने बार-बार संसद की सर्वोच्चता की दुहाई दी और लोगों के प्रयासों को अराजक कार्रवाई ठहराने की कोशिश की। वे यह भूल गए कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग से शुरू होती है, जो भारत को संप्रभु, लोकतांत्रिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष बनाएंगे। कह सकते हैं कि अन्ना पर राजनीतिक दलों की टिप्प्णी को देश की जनता ने बर्दाश्त नहीं किया। केजरीवाल और अन्ना की राहें आज जुदा हो गई हैं, लेकिन यह अन्ना ही हैं जिसने केजरीवाल को जनता के बीच काम करने का सबक दिया है।
 
दरअसल, भारत में राजनीति इस बात पर चलती रही है कि देश की जनता भले ही भ्रष्ट हो, लेकिन शासक वर्ग को ईमानदार होना चाहिए। देश की जनता भी यही चाहती है। अगर जनता की सोच ऐसी नहीं होती, तो क्या लालू प्रसाद जेल जाते। चारा घोटाला में नेता और शासक वर्गों ने लूट मचाई, तो इस लूट में बहुत सारी जनता ने भी अपना हाथ साफ किया था। लेकिन उनका कुछ नहीं हुआ। आज भी जो लोग भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन करते दिखते हैं। संभव है कि उनके घरों में भी गलत तरीके से कमाए पैसे ही आते हों, लेकिन उसे वे भ्रष्टाचार में शामिल नहीं करते।
 
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आप पार्टी की दिल्ली में धमाकेदार तरीके से आने के मायने क्या होंगे? सच मानिए, उत्तर प्रदेश की राजनीति से लेकर बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र से लेकर पूरे देश की राजनीति बदलती नजर आएगी। एक ओर तो चुनाव आयोग के कड़े नियम और दूसरी ओर आप जैसी पार्टी का अवतरण राजनीति को शुद्ध करने के लिए काफी है। आप से सबसे ज्यादा क्षेत्रीय पार्टियों को खतरा है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक की राजनीति को आप प्रभावित करेगी। मोदी की राजनीति पर ब्रेक लगा सकती है आप। देश की जनता का मिजाज बदलते देर नहीं लगती और आप उस मिजाज को पहचान रही है।
 
लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.
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