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सुख-दुख...

एक अपुष्ट आरोप को इतना उछाल कर उन लोगों ने एक प्रतिभावान और जुझारू व्यक्ति को असमय मौत की ओर धकेल दिया : ओम थानवी

Om Thanvi :  खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली। लेकिन क्या इसे सचमुच आत्महत्या कहेंगे? मैं उन्हें एक संवेदनशील मगर जुझारू व्यक्ति के रूप में जानता था। इंस्टीट्यूट फार सोशल डेमोक्रेसी संस्था चलाते थे। मुझे नहीं पता था कि रघुपति सहाय 'फ़िराक़' गोरखपुरी ने कभी फिरकापरस्ती के खिलाफ कोई किताब लिखी थी। खुर्शीद अनवर वह छोटी-सी किताब न केवल ढूंढ़ लाए, उसे "हमारा सबसे बड़ा दुश्मन" नाम से हिंदी में दुबारा छापा भी। हिंदू और इसलामी कट्टरवाद के खिलाफ वे खुद निडर होकर लड़ते-जूझते थे।

Om Thanvi :  खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली। लेकिन क्या इसे सचमुच आत्महत्या कहेंगे? मैं उन्हें एक संवेदनशील मगर जुझारू व्यक्ति के रूप में जानता था। इंस्टीट्यूट फार सोशल डेमोक्रेसी संस्था चलाते थे। मुझे नहीं पता था कि रघुपति सहाय 'फ़िराक़' गोरखपुरी ने कभी फिरकापरस्ती के खिलाफ कोई किताब लिखी थी। खुर्शीद अनवर वह छोटी-सी किताब न केवल ढूंढ़ लाए, उसे "हमारा सबसे बड़ा दुश्मन" नाम से हिंदी में दुबारा छापा भी। हिंदू और इसलामी कट्टरवाद के खिलाफ वे खुद निडर होकर लड़ते-जूझते थे।

'जनसत्ता' में वहाबियत के खिलाफ अनेक लेख लिखे। हाल में उन्होंने पाब्लो नेरूदा और अन्य कवियों की कविताओं के अनुवाद कर हमें सौंपे थे। खुर्शीद यारबाश शख्स थे। उनके घर बैठकें, खान-पान चलता रहता था। कुछ हफ्ते पहले सुना कि दिल्ली में ही एक अन्य एनजीओ में कार्यरत एक्टिविस्ट ने उनके खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया है। अनेक लोगों के साथ वह भी खुर्शीद के घर मेहमान थी। आरोप है कि उसकी शराब में खुर्शीद ने कुछ मिला दिया। उसकी तबीयत बिगड़ गयी। उसे वहीं रुकना पड़ा और सुबह कथित बलात्कार हुआ।

लेकिन उसने यह सब न पुलिस को रिपोर्ट किया, न मेडिकल कराया, न कोई साक्ष्य दिया। कुछ दिनों बाद यह आरोप फेसबुक पर चल पड़ा। इस पर खुर्शीद विचलित हो गए और उन्होंने मानहानि का मुकदमा कर अदालत की शरण ली। कल कुछ टीवी चैनलों पर यह मामला उठ गया। उन्हें जानने वाले भी अब फेसबुक पर गरियाने लगे। अवसाद में आज सुबह अपने घर से कूद उन्होंने जान दे दी।

मुझे नहीं मालूम कि बलात्कार के आरोप में सच क्या था। रिपोर्ट दर्ज होती और उचित जांच के बाद गुनाह साबित होता तो खुर्शीद अनवर को फांसी पर लटका आते। लेकिन एक अपुष्ट आरोप को इतना उछाल कर उन लोगों ने एक प्रतिभावान और जुझारू व्यक्ति को असमय मौत की ओर धकेल दिया, जो उनकी शोहरत से जलते थे। कहा जा रहा है कि आरोप की सीडी मौजूद है। मगर सीडी पर अंततः आरोप ही तो है। कैसी विडंबना है कि कानून ने अभी अपना काम शुरू ही नहीं किया था और मीडिया में कोई गुनहगार करार दे दिया गया! अलविदा खुर्शीद मियां। जानता हूँ यह संबोधन तुमको पसंद न था। पर आज प्यार से आखिरी बार बोलने दो।

जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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