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दिल्ली

यशवंत और जनार्दन के हौसले की दाद देनी चाहिए

शंभूनाथ शुक्ल : देवरिया के लिए निकले थे। शाम ठीक तीन बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए। शायद जीवन में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहली दफे गया। इतना गंदा और थर्ड क्लास स्टेशन पहली दफे देखा। यहां तक कि गाजियाबाद स्टेशन भी इससे बेहतर है। इतनी भीड़ कि रास्ता तक नहीं मिल रहा था और सैकड़ों ट्रेनों की आवाजाही ऊपर से।

शंभूनाथ शुक्ल : देवरिया के लिए निकले थे। शाम ठीक तीन बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए। शायद जीवन में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहली दफे गया। इतना गंदा और थर्ड क्लास स्टेशन पहली दफे देखा। यहां तक कि गाजियाबाद स्टेशन भी इससे बेहतर है। इतनी भीड़ कि रास्ता तक नहीं मिल रहा था और सैकड़ों ट्रेनों की आवाजाही ऊपर से।

पता चला कि हमारे गंतव्य वाली ट्रेन शाम 4.10 पर प्लेटफार्म नंबर 13 पर आएगी। प्लेटफार्म की गंदगी और पटरियों में बिखरे मैले की बदबू के बावजूद हम लोग (Pankaj Chaturvedi, Prathak Batohi, Yashwant Singh, Janardan Yadav) रात सवा आठ तक वहीं रुके पर ट्रेन नहीं आई। और स्टेशन पर कोई अधिकारी कुछ बताने को राजी नहीं।

बहुतों ने कहा कि अरे पुरबिया एक्सप्रेस नाम की कोई ट्रेन नहीं है। एक वेंडर ने बताया कि आती तो है पर कब चलेगी और कब पहुंचेगी पता नहीं। उस ट्रेन पर चल चुके एक यात्री ने बताया कि आप अपना खाना, पीने का पानी तो रखिएगा ही साथ में धोने वगैरह के लिए भी पानी रख लीजिएगा क्योंकि वह पानी भी नहीं मिलता।

एक ने बताया कि पहले तो सारी वीआईपी ट्रेनों को गुजारा जाएगा। यानी हम देवरिया पहुंचते तो शायद प्रोग्राम के बाद ही। इसलिए बेहतर लगा कि वापस ही चलें। भारतीय रेल की सुविधा का लाभ लेने की बजाय अपनी गाड़ी से ही देवरिया के लिए चल पड़ते। छह घंटे में कानपुर, आगे डेढ़ घंटे लखनऊ के वास्ते। वहां से दो घंटे में फैजाबाद फिर तीन घंटे गोरखपुर के लिए। और बस पहुंच गए देवरिया। पर उसके लिए एक दिन पहले निकलना श्रेयस्कर होता। सो बकौल पंकज लौट कर बुद्धू घर को आए।

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शंभूनाथ शुक्ल : सॉरी देवरिया! साथी Yashwant Singh और Janardan Yadav देवरिया पहुँच गए हालाँकि सुबह 10 बजे देवरिया पहुँचने वाली पुरबिया एक्सप्रेस आज शाम साढ़े 5 बजे पहुंची है. युवा साथी तो 22 घंटे की यात्रा कर फ़ौरन मंच पर पहुँच गए लेकिन मुझे मुश्किल हो जाती. इसीलिए अच्छा ही किया यात्रा रद्द करके. पर मेरे पास देवरिया, गोरखपुर, बस्ती, आजमगढ़, गाजीपुर, बलिया से लेकर इलाहाबाद तक से लोगों ने फोन किया कि वे सुनने को और मिलने के लिए आये थे. पर कोई बात नहीं अपन जायेंगे जरूर आगे फिर. लेकिन यशवंत और जनार्दन के हौसले की दाद देनी चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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