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सुख-दुख...

पत्रकारिता के आलोक

हिंदी पत्रकारिता की दुनिया में अपनी धारदार उपस्थिति के पहचाने जाने वाले आलोक तोमर का आज जन्म दिन है, दो साल पहले २० मार्च २०११ को उनका निधन हो गया था, मात्र पचास साल की उम्र में पत्रकारिता का यह आलोक बुझ गया था, मगर आज उनके जन्म दिन पर उनके लेखन की बरबस याद आ रही है.

हिंदी पत्रकारिता की दुनिया में अपनी धारदार उपस्थिति के पहचाने जाने वाले आलोक तोमर का आज जन्म दिन है, दो साल पहले २० मार्च २०११ को उनका निधन हो गया था, मात्र पचास साल की उम्र में पत्रकारिता का यह आलोक बुझ गया था, मगर आज उनके जन्म दिन पर उनके लेखन की बरबस याद आ रही है.

हिंदी पत्रकारिता में जनसत्ता ने एक नई भाषा और बेबाक तेवर के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी , इसके अगुआ संपादक थे प्रभाष जोशी, उन्होंने अपने अनुकूल टीम तैयार की थी , उस टीम में चयनित लोगों में ग्वालियर की भूमि से उभरे युवा पत्रकार आलोक तोमर भी थे. मुझे पता है उस वक्त जनसत्ता के लिए जिन पत्रकारो का चयन होना था,उनकी कठिन परीक्षा ली गयी थी. इ उस परीक्षा में आलोक उत्तीर्ण हुए थे, और फिर देश ने उनकी कलम के जौहर देखे और कुछ ही समय में आलोक हिंदी पत्रकारिता युवा शिल्पी के रूप में स्थापित हो गए।

जब कभी दिल्ली मेरा दिल्ली जाना होता था, तो आलोक तोमर से भी मिलना हो जाया करता था, मै गांधी शांति प्रतिष्ठान में रुका करता था, और जनसत्ता का कार्यालय उसके पास ही था, हालाँकि आलोक तोमर से मेरी रू-ब-रू मुलाकात कम हुयी , मगर उनकी लेखने से रिश्ता कायम रहा, जनसत्ता के माध्यम से उनकी खबरे पढ़ने को मिलती रही. -दो बार वे रायपुर भी आये तब भी मुलाकात हुयी। जब भी हम मिलते थे, पत्रकारिता पर चर्चाएँ होती। पत्रकारिता पर लिखा गया मेरा उपन्यास ''मिठलबरा' उन्हें पसंद था. शायद इसलिए कि वे हमेशा बिंदास और निर्भीक पत्रकारिता के पक्ष धर थे, और मेरे उपन्यास में भी वही तत्व थे।

बाद में अलोक तोमर जनसत्ता से अलग हो गए और स्वतंत्र पत्रकारिता शुरू की, ''डेटलाइन इंडिआ' फीचर सर्विस' ने देखते ही देखते अपनी पह्चान बना ली, क्योंकि उसका कंटेंट आलोक तोमर की तरह बेबाक हुआ करता था,, यह एक लोकप्रिय पोर्टल है . कालाहांडी पर केंद्रित उनकी पुस्तक काफी चर्चित रही , इस पुस्तक ने यह साबित कर दिया कि महानगर में रह कर पत्रकारिता करने वाले सच्चे पत्रकार भूख से लड़ते लोगों की पीड़ा समझने के लिए सुदूर गाँवों तक भी जाते है , वरना अब तो महानगरो में रहने वाले पत्रकार गाँवों की और जाना ही नहीं चाहते। आलोक तोमर अपवाद थे. वे पूरी दुनिया में घूमे तो भारत के गाँवों के दर्द पर भी कलम चलायी।

आलोक तोमर के जीवन के अंतिम दौर बेहद संघर्ष पूर्ण रहे , वे एक पत्रिका के संपदक हो गए और उस पत्रिका की अपनी खास पहचान बन गयी. इस पत्रिका में उन्होंने एक विदेशी पत्रिका में छपे कार्टून को प्रकाशित कर दिया था, जिसे ले कर खूब हंगामा मचा। इतना हंगामा हुआ कि आलोक तोमर की गिरफ्तारी हुई, उन्हें जेल जाना पड़ा. लेकिन इससे आलोक की लोकप्रियता का ग्राफ और अधिक बढ़ा, ये और बात है कि पत्रिका ने उनसे पल्ला झाड़ लिया। फिर भी आलोक विचलित नहीं हुए, उन्होंने ''डेटलाइन इंडिया' पर ध्यान केंद्रित किया और देखते ही देखते डेटलाइन ने भी धूम मचाना शुरू कर दिया .

आलोक तोमर का अन्तिम समय बेहद संघर्ष पूर्ण रहा , एक तो स्वतंत्र पत्रकारिता , उस पर कैंसर का हमला, इन सबसे जूझते हुए आलोक ने मुस्काराते रहे और कलम चलाते रहे , अपनी बीमारी के समय भी आलोक तोमर ने जो कुछ लिखा , वह एक पत्रकारिता का सशक्त उदहारण है. उनके पास एक कवि मन भी था आलोक ने अपनी बीमारी के दौरान जो कविता लिखी, उसे पढ़ कर उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति को समझ जा सकता है-

काल तुझसे होड़ है मेरी

जानता हूं चल रही है

मेरी तुम्हारी दौड़

मेरे जन्म से ही

मेरे हर मंगल गान में

तुमने रखा है ध्यान में

एक स्वर लहरी,

शोक की रह जाए

आपके दूत मुझसे मिलें हर मोड़ पर

और जीवन का बड़ा सच

चोट दें, कह जाएं

सारे स्वप्न, सारी कामनाएं, आसक्तियां

तुम्हारे काल जल में बह जाएं

लेकिन अनाड़ी भी हूं

अनूठा भी, किंतु

तुम्हारी चाल से रूठा भी

काल की शतरंज से कभी जुड़ा

और एक पल टूटा भी

तुम सृष्टि के पीछे लगाते दौड़

देते शाप और वरदान

और प्रभंजन, अप्रतिहत

चल रही है

दौड़ तुमसे मेरी

ए अहेरी

काल, तुझसे होड़ है मेरी..

काल से होड़ लेने वाले और अंततः पराजित होने वाले इस पत्रकार को मेरा नमन है । मृत्यु से भला कौन जीत सका है, मगर अपने सरोकारो और सृजन से व्यक्ति चिरकाल तक बना रहता है. आलोक ऐसे ही पत्रकार थे. आइसना (आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन) आलोक तोमर की स्मृति में हर साल किसी जांबाज पत्रकार को पच्चीस हजार रुपये का पुरस्कार देने की घोषण की. उम्मीद है यह परम्परा कायम रहेगी ताकि एक सशक्त पत्रकार को सम्मानित करके हम आलोक तोमर के तेवर वाली पत्रकारिता की परम्परा को आगे बढ़ा सके.

लेखक गिरीश पंकज 'सदभावना दर्पण' मासिक मैग्जीन के संपादक हैं.

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