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काहे का हैप्पी न्यू इयर : पृथ्वी ने सूरज का एक पूरा चक्कर लगा लिया, हम जहां से चले थे, वहीं आ गए

Nadim S. Akhter :   वैसे कोई साल पुराना या नया नहीं होता. हममें से किसी को नहीं मालूम कि ब्रह्मांड में महाविस्फोट के बाद (अब तक की प्रचलित थ्योरी के मुताबिक) पृथ्वी नाम का यह ग्रह कब अंडाकार हुआ, कब इसके अपनी धुरी पर व सूर्य के चारों ओर घूमने की गति स्थिर हुई (जैसा कि आज है) और फिर यहां पनपी मानव सभ्यता ने अपनी-अपनी सुविधा के मुताबिक दिन-महीने और साल जैसे जुमले गढ़ दिए ताकि जीवन-समय-काल को व्यवस्थित होकर देखा जा सके.

Nadim S. Akhter :   वैसे कोई साल पुराना या नया नहीं होता. हममें से किसी को नहीं मालूम कि ब्रह्मांड में महाविस्फोट के बाद (अब तक की प्रचलित थ्योरी के मुताबिक) पृथ्वी नाम का यह ग्रह कब अंडाकार हुआ, कब इसके अपनी धुरी पर व सूर्य के चारों ओर घूमने की गति स्थिर हुई (जैसा कि आज है) और फिर यहां पनपी मानव सभ्यता ने अपनी-अपनी सुविधा के मुताबिक दिन-महीने और साल जैसे जुमले गढ़ दिए ताकि जीवन-समय-काल को व्यवस्थित होकर देखा जा सके.

लेकिन अंग्रेजी के जिस कैलेंडर के मुताबिक पूरी दुनिया आज चल रही है और नए-पुराने साल का हिसाब लगा रही है, उसी समय अलग-अलग मजहबों-सभ्यताओं के कैलेण्डर भी अपने हिसाब से चल रहे हैं. हिन्दुओं का कैलेंडर व नया साल अलग है, मुस्लिमों का अलग, चीनियों का अलग, रोम वालों-अफ्रीकियों का अलग. कई सभ्यताएं-धर्म आज भी अपने हिसाब से नया साल मनाते हैं. लेकिन पूरी दुनिया को एक सूत्र में बांधकर सर्वमान्य बन चुका अंग्रेजी का जनवरी-दिसंबर वाला कैलेंडटर ही ऐसा है, जिसमें घड़ी की टिक-टिक जब 31 जनवरी को रात के 12 बजने का मार्का छूती है, पूरी दुनिया जोश में डूब जाती है. कहती है नया साल आ गया. मुबारक-बधाई.

ये भी अजब है कि नए साल के जश्न की शुरुआत भी पूरी दुनिया में एक साथ नहीं होती. जापान में हमसे पहले लोग रात के 12 बजा लेते हैं और सऊदी अरब, ईरान, ब्रिटेन-जर्मनी में हमारे बाद रात के 12 बजते हैं. लेकिन नए साल के जश्न का बाजा सब बजाते हैं, पूरे जोश से. ये भी सोचता हूं कि पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में जहां दिन और रात की लंबाई 24 घंटों के खांचों में नहीं बंटी होती और जहां महीनों सूरज लगातार या तो चमकता रहता है (दिन होता है) या फिर महीनों गुल रहता है (रात होती है), वहां रहने वाले प्राणी नए साल का हिसाब कैसे लगाते होंगे???!! क्या ग्लोबल सिटिजन बनकर उनको भी हमारी 24 घंटे वाली दिन-रात-महीने-साल की थ्योरी अपना लेनी चाहिए या फिर अपनी हिसाब से नई थ्योरी गढ़कर नए साल के जश्न का वक्त हमसे अलग कर लेना चाहिए कि नहीं-नहीं, अभी तो यहां इतना कम दिन हुआ. 365 दिन बीतने में तो बहुत टाइम बाकी है टाइप से..!!

विज्ञान की नजर से देखें तो 365 दिन और कुछ घंटों का मतलब ये होता है कि हमारी पृथ्वी ने गजब की स्पीड से अपनी धुरी पर घूमते हुए अपने तारे यानी सूरज का एक चक्कर लगा लिया है. यानी जहां से पृथ्वी चली थी, अंतरिक्ष में ठीक उसी बिन्दु पर पुनः आ गई है. लेकिन इसमें भी छेद हैं. अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि अपनी कक्षा में घूमते हुए पृथ्वी ठीक उसी जगह पहुंची या नहीं, इसमें EROOR हो सकता है. तीन आयामों में देखकर पुथ्वी की exact position अपने पहले और बाद वाली जगह पर बता पाना इतना आसान भी नहीं.

लेकिन इतनी technicality वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दीजिए. मोटा-मोटी बात ये है कि एक साल बीत गया, माने पृथ्वी ने सूरज का एक पूरा चक्कर लगा लिया और हम जहां से चले थे, घूमकर वहीं वापस आ गए हैं. फिर क्यों ये कह रहे हैं कि नया साल आ गया??!! किसी नई जगह तो पहुंचे नहीं?? हां, बस ये बताने की कोशिश भर है कि जिस ब्रह्मांड की उम्र अरबों वर्ष है, हमने वहां पृथ्वी पर इतने महीने गुजार लिए. अच्छा है, लगे रहिए. नए साल का Agenda बनाइए, तय कीजिए और उस पर लग जाइए.

इसी बहाने कुछ नया करने की उम्मीद तो जगती है. कुछ खाब तो पैदा होते हैं. कुछ गलतियों को ना दोहराने की कसमें तो खाते हैं. एक दिन का जश्न तो मनाते हैं. इतिहास को नई तारीख और साल तो मिलते हैं हिसाब-किताब करने के लिए. तो पृथ्वी का वासी होने के नाते मेरी तरफ से भी आप-सब को नए साल की हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं और best wishes. सिर्फ एक बात का ख्याल रखिएगा कि किसी का दिल मत दुखाइएगा. बाकी सब तो मोहमाया है. जय हो. Happy New Year 2014!!!

लेखक नदीम एस. अख्तर प्रतिभाशाली पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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