अरविंद केजरीवाल द्वारा विश्वास मत के दौरान प्रस्तुत 17 मुद्दों में से अधिकतर वही हैं जिनमें से अधिकतर 1947 को देश को आजादी मिलने के बाद से ही जस के तस पड़े हैं। रोटी, कपड़ा और मकान के बाद स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, बिजली, सुरक्षा जैसी उचित सुविधाओं के अभाव में जनता तब से ही त्रस्त होती रही है। उस समय की संसद और पहली विधानसभाओं में भी लगभग यही मुद्दे ऊंचे स्वरों में गूंजते रहे थे।
देश को आजाद हुए सात दशक होने को है परंतु इनके समाधान की तरफ गंभीरतापूर्वक किसी का ध्यान नहीं गया। अन्य पार्टियों के 200 मुद्दों की सूची में आम आदमी के ये 17 मुद्दे जैसे कहीं गुम हो गये। सत्र पर सत्र चलते रहे बड़ी-बड़ी बातें और डीलें हुईं, प्रस्ताव प्रस्तुत हुए और पारित भी हुए लेकिन जनता को कुछ खास नहीं मिल पाया और जनता ही अक्सर सरकार चुनने के बाद फेल होती रही।
आज फिर एक बार आम आदमी जागा और पूरी जनता ने उम्मीद लगाई है कि हर पार्टी के 200 मुद्दों में से केवल जनता के 17 मुद्दे यदि कार्यान्वित हो जाएं तो सचमुच स्वराज आ जाएगा। अब देखना यह है कि स्वराज अकेले अरविंद लाते हैं या इस महायज्ञ में अन्य प्रमुख पार्टियां भी शामिल होती हैं।
राजनीतिक पार्टियों के काम करने का तरीका भिन्न हो सकता है लेकिन जनता के मुद्दों को प्रमुखता देना ही अब उनके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरूरी और पहली शर्त हो जाएगा। क्यों न सभी राजनीतिक पार्टियां आत्ममंथन कर लें कि कौन से मुद्दे जनता के हैं, कौन से औद्योगिक घरानों के हैं, कौन से अंतरराष्ट्रीय संबंधों के हैं और कौन से भ्रष्टाचार से संबंधित हैं। अपने सभी मुद्दों की विषयवस्तु का सही तरह से अतंर्वस्तु विश्लेषण कर जनता के सामने प्रस्तुत करें।
भारत को आज विश्व के सर्वाधिक युवा राष्ट्र का दर्जा मिल चुका है व युवा इन 17 मुद्दों की तरफ बहुत पैनी निगाह से देख रहा है। यह मुद्दे बहुत साधारण से दिखते हैं परंतु आम आदमी के लिए बहुत खास हैं क्योंकि उसका परिवार और पूरा जीवन इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है। आदिम मानव से लेकर आज के आधुनिक मानव तक पहील दौड़ केवल मूलभूत सुविधाओं व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए है। सदियों से उपेक्षित महिला वर्ग हर युग में सम्मान और सुरक्षा की आवाज उठाते हुए आज भी 200 मुद्दों में अपनी जगह ढूँढता है। मुद्दों की लिस्ट लंबी हो सकती है परंतु मुद्दा तो वही माना जाएगा जो जनता की धुरी में आता है। हालिया राजनीति तो कुछ ऐसा ही बयान कर रही है कि वही नेता वही चुना जाएगा जो उनको पूरा करने का माद्दा रखता हो।
शहरी क्षेत्रों में झुग्गी बस्तियां 1947 का भी मुद्दा था और आज भी चर्चा में है परंतु किसी के लिए वोट बैंक के तौर पर तो किसी के लिए सस्ते मजदूर के तौर पर तो किसी के लिए आज एक नये रूप में मुद्दा बना है। आजादी के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और राजनेताओं ने बहुत लड़ाइयां लड़ीं और आजादी के बाद अधिकतर आम स्वतंत्रता सेनानी तो कहीं नेपथ्य में खो गये और अधिकतर नेताओं ने आजादी की कीमत को सूद सहित वसूलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गोरे चले गये थे लेकिन उसी ढर्रे पर देश आगे घिसटता रहा और देश के नेता आम आदमी के लिए खुदा सरीखे हो गये।
इस वीआईपी कल्चर के दर्शन आज देश के शहरों और राजपथों पर चलते हुए हो ही जाते जब नेता अपने लाव-लश्कर के साथ निकलते हैं आम आदमी को उनकी औकात दिखाते हुए। लेकिन आज यह साबित हो गया है कि सभी दिन एक से नहीं होते हैं आम आदमी के भी दिन फिर सकते हैं। संसद से सड़क तक आज आम आदमी की गूंज है और आज यह अदना सा आम आदमी खुद परिवर्तन के लिए चिल्लाता हुआ गद्दी पर जा बैठा है और सड़क पर खड़े हर आम आदमी में गाँधी नजर आ रहा है जो एक बार फिर स्वराज लाने के लिए अब कमर कस के निकल पड़ा है।
आने वाले आम चुनाव के लिए जनता गुहार कर रही है कि सीधे अपनी चकाचौंध के साथ राजनीतिक पार्टियां अपने सत्ता के गलियारों से न निकलें बल्कि सुदामा और कृष्ण का संबंध स्थापित करने के लिए मन में दया, करुणा, प्रेम, त्याग, सम्मान और श्रद्धा लेकर निकलें, जनता उसी स्थिति में गले लगाएगी।
डॉ. मोनिका वर्मा
वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक
इलैक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल





