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पांच-पांच सौ रुपये में बिके नहीं बल्कि सम्मानित हुए बनारस के इले‍क्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार!

वाराणसी में पत्रकारिता आज भी मिशन है। जहां प्रदेश व देश की राजधानी में करोड़पती व अरबपती पत्रकारों की लम्बी फेहरिस्त किसी से छुपी नहीं है| वहीं इले‍क्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया प्रबंधन के लाख शोषण के बाद भी वाराणसी के पत्रकारों ने पूरे देश में अपना जमीर नहीं बेचा है बल्कि परचम लहराया है। अगर कोई आयोजक अपने यहां बुलाकर अपनी क्षमता के अनुरूप सम्मान करे तो इसे भीख व दलाली की संज्ञा नहीं दी जा सकती, ऐसा लेने वालों का मानना है।

वाराणसी में पत्रकारिता आज भी मिशन है। जहां प्रदेश व देश की राजधानी में करोड़पती व अरबपती पत्रकारों की लम्बी फेहरिस्त किसी से छुपी नहीं है| वहीं इले‍क्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया प्रबंधन के लाख शोषण के बाद भी वाराणसी के पत्रकारों ने पूरे देश में अपना जमीर नहीं बेचा है बल्कि परचम लहराया है। अगर कोई आयोजक अपने यहां बुलाकर अपनी क्षमता के अनुरूप सम्मान करे तो इसे भीख व दलाली की संज्ञा नहीं दी जा सकती, ऐसा लेने वालों का मानना है।

बनारस के उमरहां के चौबेपुर स्थित स्वर्वेद मंदिर के जिस धार्मिक आयोजन की चर्चा भड़ास4मीडिया डाट काम पर है, इसे देख कर वाराणसी के इले‍क्ट्रानिक मीडिया जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई क्योंकि बार-बार इन्हें ही बदनाम किया जाता है। जबकि गिफ्ट लेने वालों में प्रिंट मीडिया के लोग भी थे। इस बारे में लाईव इण्डिया के वाराणसी के प्रतिनिधी पुरुषोत्तम चतुर्वेदी ने क्लाउन टाइम्स से एक अनौपचारिक बातचीत में कहा कि आयोजको ने तीन गाड़ियों से पत्रकारों को ले जाने की व्यवस्था की थी। कहा कि हमारे साथ जीतेंद्र (एनडीटीवी), पंकज (ईटीवी), नितिश पण्डेय (आज तक) गये थे।

अन्य दोनों गाड़ियों से भी पत्रकर गये थे। कार्यक्रम के बाद टीवी कलाकार मुकेश खन्ना ने सभी को बुलाकर च्वनयनप्राश, डबल बेड का कंबल तथा एक-एक लिफाफा पकड़ाया। अगर किसी ने सम्मान किया तो हम लोग क्या करें। इस बारे में इलेक्ट्रानिक मीडिया जर्नलिस्ट एसोशिएसन के अध्यक्ष गिरीश दूबे ने कहा कि पहले तो आर्गनाइजरों को पैसा नहीं देना चहिये। देने वाला ज्यादा जिम्मेदार है, वहीं लेने वाला भी कम दोषी नहीं है। लेने वालों में प्रिंट मीडिया के लोग भी थे। इस तरह की खबरें वही लोग प्रसारित कराते हैं या तो वे मीडिया से भगाये गये लोग हैं या पत्रकारिता की आड़ में लाइजनिंग में लगे रहते हैं। श्री गिरीश ने कहा कि इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि वाराणसी में कम पैसे में ज्यादा दौड़्ते हैं इले‍क्ट्रानिक मीडिया पत्रकार।

गिफ्ट में जूता मिले या कपड़े का टुकड़ा तो भी दौड़ जाते हैं पत्रकार

यह नजारा कहीं भी और कभी भी देखने को मिलता है, चाहे घड़ी मिले, या कपड़े का टुकड़ा, मोबाईल या देने वाला जूता दे, लेने वलों को कोई फर्क नहीं पड़ता, बस पता चले की कहां क्या मिलने वाला है, बिन बुलाये भी जाने में परहेज नहीं है। पत्रकारों को भले ही गिफ्ट कम पड़ने पर आयोजकों को ही झेलना पड़ता है। सभी कुछ खुशी-खुशी मिले, बस पता न चले किसी को। बनारस के उमरहां के चौबेपुर स्थित स्वंर्वेद मंदिर में आयोजकों से एक टीवी चैनल के पत्रकार के भिड़ने की खबर है। कहने लगे कि क्या भिखारी समझ रखा है, पांच सौ रुपये दे रहे हो। इस पर बाबा के समर्थकों ने समझाया कि अभी इतने रखिये, आगे कवरेज करेंगे तो और मिलेंगे। पत्रकार ले तो समाचार है और इले‍क्ट्रानिक अथवा प्रिंट मीडिया का प्रबंधन लाखों रुपया वसूल कर डकार जाये तो चर्चा नहीं होती। अगर पत्रकारों को उसकी मेहनत जायज मेहनताना मिले तो गिफ्ट के लिये नहीं दौड़ेगा पत्रकार।

उपरोक्त खबर का प्रकाशन क्लनाउनटाइम्स डाट काम पर किया गया है.

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