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कुछ रिश्तों को नाम की जरूरत नहीं होती

‘जमाना बड़ा खराब है’ – जमाने की शान में यह बात हम बचपन से सुनते आए हैं, लेकिन यह कब अच्छा होगा, इसका पुख्ता जवाब शायद ही किसी के पास हो. जमाना सौ फीसदी सही कब होगा, यह तो जमाना ही जाने, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि अगर हम खुद की भूमिका पर गौर करें तो भी हालात काफी बदल सकते हैं.
‘जमाना बड़ा खराब है’ – जमाने की शान में यह बात हम बचपन से सुनते आए हैं, लेकिन यह कब अच्छा होगा, इसका पुख्ता जवाब शायद ही किसी के पास हो. जमाना सौ फीसदी सही कब होगा, यह तो जमाना ही जाने, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि अगर हम खुद की भूमिका पर गौर करें तो भी हालात काफी बदल सकते हैं.
 हालांकि ऐसी कोशिशें न तो कभी अखबारों की सुर्खियां बनती हैं और न ही वहां इनके लिए कोई जगह है. अक्सर जिंदगी के किसी मोड़ पर एक दौर ऐसा आता है जब हमें किसी की मदद की जरूरत होती है. साल 2005 की वह ठंडी रात आज भी मुझे याद है जब रात घर के बिस्तर पर गुजरी और दिन ऑपरेशन थिएटर में. 
दरअसल एक भयंकर दुर्घटना के बाद मुझे करीब एक महीना जयपुर के एसएमएस अस्पताल में बिताना पड़ा. उस दौरान जिंदगी की डोर कई बार कमजोर हुई, लेकिन किसी तरह यह टूटने से बची रही. बीच में हालात कुछ ठीक हो जाने पर मैं घर चलने की जिद करने लगा. आखिरकार पिताजी मान गए और हमने दोपहर की ट्रेन से जाने का फैसला किया, क्योंकि उसमें भीड़ कम थी. साथ ही सड़क पर लगने वाले झटकों से भी यह सुरक्षित थी. ट्रेन में मेरे सामने एक महिला बैठी थी. उसने मुझसे कोई बात नहीं की, लेकिन हमारा सामान रखने में उसने बहुत मदद की. अभी ट्रेन मुश्किल से एक घंटा ही चली होगी कि मुझे चक्कर आने लगे और जल्द ही मैं बेहोश हो गया. इस स्थिति में उस साहसी महिला ने ट्रेन रुकवाई और मुझे नजदीक के अस्पताल तक पहुंचाया. अगर उस दिन वह नहीं होती तो मेरे जिस्म के पोस्टमार्टम में महज कुछ ही घंटों की दूरी शेष थी. खैर…. किसी तरह जान बची और कुछ दिनों बाद घर आए.
इस घटना के करीब सात साल बाद मुझे रात को जयपुर जाना था. मैं रात एक बजे जयपुर के लिए बस में बैठा. कुछ ही दूर चलने के बाद ड्राइवर ने मुझे साफ बता दिया कि अब किराया दोगुना लगेगा, साथ ही जहां मैं जाना चाहता हूं उससे बहुत पहले उतरना होगा. उसकी इन बेतुकी शर्तों से असहमत होकर मैं नीचे उतर गया और अपनी राह पकड़ी. रात के सन्नाटे में दूर-दूर तक सिवाय अंधेरे के और कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. करीब दो किमी पैदल चलकर मैं नजदीकी रेलवे स्टेशन पहुंचा.
मुझे ड्राइवर पर बहुत गुस्सा आ रहा था जिसकी वजह से देर रात को पैदल परेड करनी पड़ी. अभी मैं स्टेशन पहुंचा ही था कि मैंने देखा, एक युवक भारी-भरकम थैले के साथ अपनी मां का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे चला आ रहा है. बाद में उसने बताया कि उसकी मां का हाल में ही पेट का ऑपरेशन हुआ है. वह एसएमएस अस्पताल जा रहा था. उसने बेहद संकोच के साथ मुझसे निवेदन किया कि मैं उनका सामान ले चलूं ताकि वह मां का ख्याल रख सके. ट्रेन आने पर मैंने उनका सामान उठाया और एक सीट तलाशी. मैं और वह युवक फर्श पर अखबार बिछाकर बैठ गए और उसकी मां को सीट पर लिटा दिया. सुबह जयपुर पहुंचने पर मैं उनका सामान रिक्शा तक पहुंचाकर आया. रवाना होने पर उस महिला ने विदा में अपना हाथ उठाया तो मुझे लगा कि वह मुझे आशीर्वाद दे रही है. लेकिन इस दौरान मैं उनका नाम पूछना तो भूल ही गया, फिर भी मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं, क्योंकि कुछ रिश्तों को नामों की जरूरत नहीं होती.
 
राजीव शर्मा
ganvkagurukul.blogspot.com
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