Om Thanvi : मंत्री का काम एक बड़ी जिम्मेदारी है, बेहिसाब लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास पहुँचते हैं। मंत्री या उनके दोस्त-दुश्मन कुछ भी कहते हों, उनके पास एक अलग ठिकाना होना चाहिए। उनको वाहन और सुरक्षा भी मुहैया की जानी चाहिए। यह शासन का दायित्व है। लालबहादुर शास्त्री से अधिक सादगी वाला कौन होगा? पर घर-सुरक्षा उन्होंने ने भी ली थी।
जब तक आप सरकार को बहुमत नहीं मिला या आने-जाने या घर की सुविधा नहीं मिली, मंत्री अपने-अपने ढंग से चल-फिर लिए। इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि जब तक सरकार चले वे अपने वाहन से ही आते-जाते रहेंगे या फिर ग़ाज़ियाबाद में जा रहेंगे। केजरीवाल या मनीष सिसोदिया ने मेट्रो का सफर कर लिया तो उन्हें रोज मेट्रो में ठेलना भी न उनके हित में होगा न मुसाफिरों के।
मुझे नहीं लगता कि गाड़ी के मॉडल या उसके वीआइपी नंबर की इन लोगों ने मांग की होगी। पर अतिउत्साही अफसरों की पहल से वे अपने आप को बचाने में सक्षम हैं। इनोवा ही क्यों हो? छोटी कार पार्टी की छवि के अनुकूल होगी। अफसरों की क्या हिम्मत होगी जो आप साफ कहें कि जाइए छोटी गाड़ी लाइए, आम नंबर वाली। केजरीवाल भी एक फ्लैट से काम चलाने की कोशिश कर सकते हैं। उनको खयाल रखना चाहिए कि दुश्मन उनकी पार्टी के चारों तरफ पत्थर हाथ में लेकर खड़े हैं। हर गतिविधि को खुर्दबीन (magnifier) से देख और दिखा रहे हैं। वे कुमार विश्वास के पीछे विधानसभा की दर्शक-दीर्घा तक पहुँच गए थे कि आप यहाँ कैसे? तो दिल्ली के मुख्यमंत्री के दो बंगले उन्हें खटकते रहेंगे, चाहे आप लाख कहें कि उनमें एक दफ्तर का है।
मैंने शीला दीक्षित का बंगला देखा है। उसके आगे सोनिया गांधी का बंगला आ जाता है। शीलाजी के यहाँ बैठक से डाइनिंग हॉल तक (वहाँ तक इसलिए पहुंचा क्योंकि उन्होंने एक दफा खाने पर बुलाया था!) महल का ठाठ है। विशाल पसरा हुआ लॉन है। पता नहीं कितने एकड़ में होगा, पर पूरा बंगला जनपथ से मोतीलाल नेहरू मार्ग तक फैला है। कोई फ्लैट (चाहे उसमें निर्माण का परिमाण ज्यादा भी हो) इस बंगले की ऐयाशी का मुकाबला नहीं कर सकता। इसकी जमीन पर फ्लैट बना दिए जाएँ तो कमरों की संख्या कई गुना जाएगी।
पर इस बात को लोग अभी नहीं सुनेंगे। न वे यह याद करना चाहेंगे कि शीलाजी के काफिले में कितनी कारें होती थीं और दिल्ली का यातायात उनके लिए कैसे संचालित होता था। पायलट जीप ऐसे सायरन मारती थी कि सारी दुनिया को पता चले कि कोई जा रहा है। उन्हें छोड़िए, दिल्ली के अफसर कितने बड़े बंगलों में रहते हैं और उनके यहाँ सरकारी खर्च पर कितने नौकर-चाकर काम करते हैं? सब जानते हैं कि अफसरों की गाड़ियां कितने निजी उपयोग में आती हैं और उनकी लाल बत्ती बच्चों तक को स्कूल लाती-ले जाती रही है।
'आप' के मंत्री ऐसा कभी नहीं कर सकते। पर निंदा करने वाले इस तरफ ध्यान नहीं देंगे, न उन्होंने कभी उन अफसरों की तरफ ध्यान दिया जो सरकारी ही नहीं, निजी कार तक पर वीआइपी नंबर टांगे फिरते हैं। उनकी सारी ऊर्जा आप सरकार को बदनाम करने में लगी है। नकली फोटो, झूठे बयान, हेराफेरी के तथ्य दुष्प्रचारित करने में जैसे दुखी आत्माओं की पूरी फौज लग गई है। सो फिर कोहता हूँ कि केजरीवाल, इनसे सतर्क रहियो। अपना काम दिखाओ। वृहत्तर जनता उसको देखेगी और शाबाशी देगी। वही काम छछूंदर आत्माओं को रास्ता नपवाएगा।
जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.





