गोरखपुर से शैलेन्द्र मणि के जागरण छोड़ने के बाद तो मानो जागरण की मुश्किलें कम होने का नाम नही ले रही हैं. खबर है कि दस सालों से जागरण को सेवा दे रहे वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ मणि ने भी जागरण को अलविदा कह दिया है. कभी जागरण के राष्ट्रीय पृष्ठों के लिए खबर लिखने वाले सिद्धार्थ मणि अब देवरिया से जनसंदेश के खेवनहार बन कर बतौर ब्यूरो चीफ ज्वाइन किये हैं. खबर ये भी है कि जनसंदेश को स्थापित करने की कवायद कुछ यूँ है कि सभी उपक्षेत्रों में प्रभारी तैनात कर दिए गए हैं.
हालत कुछ यूँ है कि देवरिया में जनसंदेश का कार्यालय पता वही है जो कभी दैनिक जागरण का जिला कार्यालय होता था. अगर सिद्धार्थ मणि के दावों को माने तो लगभग सभी प्रतिनिधि जो कभी दैनिक जागरण के लिए दिन रात एक किये थे वो अब जनसंदेश के लिए जागरण के समानांतर काम कर रहे हैं. क्षेत्रीय पत्रकारों के तेवर कुछ यूँ है कि जैसे वो जनसंदेश को बढ़ाने के लिए नहीं, जागरण का सूपड़ा साफ़ करने के लिए काम कर हों. खैर इन कवायदों में कितना दम है यह बात तो अभी वक़्त के गर्भ में अंगडाइयां ले रहा है, लेकिन जिस तरह से एक के बाद एक जागरण के पत्रकार बाहर हो रहे हैं कम से कम इतना तो मान लेना चाहिए कि जागरण की राह गोरखपुर में आसान नहीं है. फोन से बात में सिद्धार्थ मणि ने कहा कि जागरण में अगर खुद प्रदेश हेड गोरखपुर संभालने आ जाएँ तब भी उन्हें देवरिया में एक प्रतिनिधि ढंग का नहीं मिलेगा और अभी हमारे साथ और लोग आयेंगे, थोड़ा इनतज़ार करे जागरण.
देवरिया में पहले से अमर उजाला अपना अच्छा प्रभाव बना चुका है और ऊपर से राष्ट्रीय सहारा आदि ने भी अपने पाँव फ़ैलाने शुरू कर दिए हैं जो पहले से भी ठीक स्थिति में हैं ऊपर से अगर दैनिक जागरण का एक बड़ा तबका यदि जनसंदेश की मार्केटिंग करने लगा तब शायद दैनिक जागरण का निवाला गले के नीचे जाना मुश्किल हो जाएगा. अगर हम इन पत्रकारों के दावों पर यकीन ना करें तो सिरे से झुठला भी नहीं सकते. पत्रकारों का आरोप है कि जागरण के कई लोग तानाशाही रवैया अपनाने की कोशिश किये, अब उन सभी लोगों (शायद इशारा रामेश्वर पांडे की तरफ था) को अब उनकी ही भाषा में जवाब दिया जाएगा.
हालांकि पत्रकारों का एक दूसरा तबका जो मौके को भुनाने में व्यस्त है, इन बातों को शत-प्रतिशत स्वीकार करने को तैयार नहीं है. उनका मानना है कि जागरण को हटाना किसी के लिए टेढ़ी खीर है मगर इस बात से भी कोई नहीं नकारता कि अगर जागरण ने अपना स्टाफ प्रबंधन लोकल लोगों के माध्यम से नहीं सम्भाला तो शायद गोरखपुर में तो उसका जाना तय के बराबर है. फिलहाल यह भी खबर आई है कि देवरिया और संतकबीर नगर के बागी जागरण पत्रकारों की एक संयुक्त मीटिंग भी हुई है जिसमें जनसंदेश को बढाने से ज्यादा जागरण को डुबाने की रणनीति तैयार की गयी है और संतकबीर नगर से भी कई क्षेत्रीय प्रतिनिधियों को जनसंदेश में जोड़ लिया गया है. आगे और भी लोग जागरण को झटका देने वाले हैं. कुल मिला जुलाकर अगर यह कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि "हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था, मेरी कश्ती वहीँ डूबी जहां पानी कम था". आज जागरण की भी हालत कुछ यूँ ही है. जागरण के स्तम्भ उसे धराशायी करने को उतावले हैं.
गोरखपुर से पत्रकार एवं एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी "सहर" की रिपोर्ट





