Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

इलाहाबाद

समय और समाज से मुठभेड़ कविता की अनिवार्य जरूरत : नरेश सक्‍सेना

कवि को सदैव प्रतिपक्ष में रहना होगा तभी कविता भी प्रतिपक्ष की कविता होगी। कविता को अगर सुना नहीं गया तो समझिए कवि द्वारा कहा ही नहीं गया। समय चट्टानों को बदल देता है, समय कविता को बदल रहा है, स्‍वयं मुझे बदल रहा है। फैंटेसी और यथार्थ जो भी हो पर कविता को प्रतिपक्ष में खड़ा होना चाहिए क्‍योंकि समय और समाज से मुठभेड़ कविता की अनिवार्य जरूरत है। मेरा मानना है कि भाषा से निर्मित कलाए/विधाएं मनुष्‍य बनाने के जरूरी औजार हैं। ये बातें महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के क्षेत्रीय केंद्र इलाहाबाद द्वारा ‘समय, समाज और हिंदी कविता’ विषय पर आयोजित गोष्‍ठी के मुख्‍य अतिथि वरिष्‍ठ कवि श्री नरेश सक्‍सेना ने कही।

कवि को सदैव प्रतिपक्ष में रहना होगा तभी कविता भी प्रतिपक्ष की कविता होगी। कविता को अगर सुना नहीं गया तो समझिए कवि द्वारा कहा ही नहीं गया। समय चट्टानों को बदल देता है, समय कविता को बदल रहा है, स्‍वयं मुझे बदल रहा है। फैंटेसी और यथार्थ जो भी हो पर कविता को प्रतिपक्ष में खड़ा होना चाहिए क्‍योंकि समय और समाज से मुठभेड़ कविता की अनिवार्य जरूरत है। मेरा मानना है कि भाषा से निर्मित कलाए/विधाएं मनुष्‍य बनाने के जरूरी औजार हैं। ये बातें महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के क्षेत्रीय केंद्र इलाहाबाद द्वारा ‘समय, समाज और हिंदी कविता’ विषय पर आयोजित गोष्‍ठी के मुख्‍य अतिथि वरिष्‍ठ कवि श्री नरेश सक्‍सेना ने कही।

इलाहाबाद में बड़ी संख्‍या में जुटे साहित्‍यकारों की उपस्थिति में विषय की प्रस्‍तावना रखते हुए क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने कहा कि मैजूदा बाजारवादी दौर के बरअवस प्रगतिशील वैचारिक आग्रहों वाली रचना और आलोचना के जनवादी सरोकारों पर बहस जरूरी है। जब हम कहते है कि कविता मनुष्‍य बनाती है तो कविता के संदर्भ में जनपक्षधरता का सवाल भी बहस तलब है। कार्यक्रम के अध्‍यक्ष वरिष्‍ठ कथाकार एवं विश्‍वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि यह समय चुनौतियों से भरा है, और यह समय कविता विरोधी समय भी है। कठिन समय में ही बड़ी रचना संभव होती है। सोवियत रूस इसका उदाहरण है। आजादी के संघर्ष के दौर में कविता साहित्‍य के केंद्र में थी। आजादी के बाद मध्‍यम वर्ग के बढ़ते आकार के कारण कथा साहित्‍य केंद्र में आया। कविता की आंतरिक लय टूट रही है। कविता ऐसी रची जाए जो संदर्भ बने और समय पर बड़ी टिप्‍पणी की तरह पढ़ी जाए।
 
अपने बीज वक्‍तव्‍य में वरिष्‍ठ आलोचक श्री रविभूषण ने कहा कि कवि कर्म क्‍या है? कविता का क्‍या काम है? इसे पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। कवि और कविता समय और समाज में हस्‍तक्षेप करके ही जीवित रह सकते हैं। कवि को अपने समय और समाज की चुनौतियों की पहचान सबसे जरूरी कार्यभार है। पूंजीवादी सभ्‍यता के दौर में स्‍वार्थपरता को बढ़ावा मिल रहा है। हिंदी कविता के टोन को समझें तो इसमें कई काल खण्‍ड मौजूद है। समय का बदलना कैलेण्‍डर का बदलना नहीं है। वरिष्‍ठ आलोचक श्री चौथीराम यादव ने बहस को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, वही कविता कालजयी होती है, जिसकी चिंता के केंद्र में मनुष्‍य होता है। हिंदी कविता की शुरूआत मनुष्‍य केंद्रित कविता से होती है। कबीर की कविता हिंदी कविता का प्रस्‍तान बिंदु है। कबीर ने सर्वप्रथम अपने समय में समाज की अलगाववादी शक्तियों को पहचाना। कबीर ने धूमिल के तीसरे आदमी की शिनाख्‍त बहुत पहले कर ली थी। आज शहरी मध्‍य वर्ग की मानसिकता की कविता लिखी जा रही है।
 
वरिष्‍ठ कथाकार श्री महेश कटारे ने कहा कि हिंदी की आलोचना अलोकतांत्रिक रही है। उसने प्रतिरोध की संस्‍कृति को रेखांकित करने में कोताही की। इसीलिए मुक्तिबोध अभिव्‍यक्ति के सारे खतरे उठाने की वकालत करते हैं। गोष्‍ठी के वक्‍ता डॉ. संजय श्रीवास्‍तव ने कहा कि कविता बहुतायत में लिखी जा रही है, लेकिन वह पाठक तक किस रूप में पहुंच रही है यह महत्‍वपूर्ण है। कविता के आस्‍वाद के सवाल पर भी पुन: विचार की जरूरत है। क्षेत्रीय केंद्र के सत्‍य प्रकाश मिश्र सभागार में आयोजित गोष्‍ठी में अतिथियों का स्वागत सहायक क्षेत्रीय निदेशक, श्री यशराज सिंह पाल ने किया। कार्यक्रम का संयोजन, संचालन और धन्‍यवाद ज्ञापन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।

गोष्ठी में प्रमुख रूप से जियाउल हक, रामजी राय, ए.ए. फातमी, असरार गांधी, हरीशचन्द्र पाण्डेय, उमेश नारायण शर्मा, असरफ अली बेग, अनीता गोपेश, अनुपम आनन्‍द, के.के. पाण्‍डेय, जयकृष्‍ण राय तुषार, नीलम शंकर, सालेहा जर्रीन, फखरूल करीम, संध्‍या नवोदिता, रामायन राम, सुभाष चन्‍द्र गांगुली, एहतराम इस्‍लाम, रतिनाथ योगेश्‍वर, श्रीरंग पाण्‍डेय, अनिल सिंह, अनिल रंजन भौमिक, आनंद मालवीय, पूर्णिमा मालवीय, सविता सक्‍सेना सहित तमाम साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...