बाबा रामदेव अर्द्धसाक्षरनुमा इंसान हैं। पढ़े-लिखे कम हैं पर चालाक ज्यादा हैं। चालाक न होते तो योग की इतनी बढ़िया मार्केटिंग कैसे करते? योग स्वस्थ रहने जरिया रहा है। रामदेव ने उसे चिकित्सा विज्ञान के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। उनके "चमत्कारों" को चैनलों ने प्रसारित किया। चैनलों और रामदेव की कमाई साथ-साथ आगे बढ़ी।
एक कम पढ़े-लिखे इंसान ने जब अपनी सामर्थ्य से ज्यादा कमाई कर ली तो उसे सत्ता की हवस जागी। उसे लगा कि जैसे उसने व्यापार में अप्रत्याशित कमाई कर ली वैसे ही वह सत्ता के गलियारों को लांघकर शीर्ष पद पर पहुंच सकता है। इसी लालसा में उन्होंने अपनी अधकचरी समझ के बावजूद राजनीतिक मुद्दे उठाने का प्रयास किया, हालांकि इसकी शुरूआत देशभक्ति के साथ हुई। देशभक्ति का भी अपने देश में बहुत बड़ा बाजार है और लोगों में भावनाएं जागृत कर स्वदेशी या हर्बल बताकर किसी भी माल को आसानी से टिकाया जा सकता है।
बाबा के इस काम में राजीव दीक्षित ने मदद की जो उन दिनों हिंद स्वराज आंदोलन से निकाले जाने के बाद बेरोजगार चल रहे थे। आंदोलन के कार्यकर्ता उन्हें पथभ्रष्ट नेता मानने लगे थे और वर्धा की एक सभा में उन्हें आंदोलन से निकाले जाने का निर्णय ले लिया गया। यह आंदोलन खुद राजीव दीक्षित ने खड़ा किया था और अपने आपको बनवारी लाल शर्मा वाले आजादी बचाओ आंदोलन से अलग करके किया था। वर्धा की इस मीटिंग ने रामदेव ने बीच-बचाव किया था और आंदोलन के कार्यकर्ताओं को कुछ आश्वासन दिये थे जो आज तक पूरे नहीं हो सके।
यह पूरी कहानी प्रथम प्रवक्ता में छप चुकी है, जब उसका संपादन रामबहादुर राय के जिम्मे था। अब आंदोलन के कुछ कार्यकर्ता अलग हो चुके हैं, कुछ "आप" में शामिल है, कुछ रामदेव के साथ भी है। इन्हीं में कुछ लोग बताते हैं कि प्रखर मेधा के बावजूद राजीव दीक्षित की हैसियत रामदेव के वेतनभोगी की ही थी। उनके नजदीकियों का मानना है कि इतनी कम उम्र में उनके दिल के दौरे के पीछे एक तरह की घुटन ही थी। यह सब यहां बताने का मकसद केवल इतना है कि जिस काले धन के मुद्दे को रामदेव ने जोर-शोर से उठाया और जिस मुद्दे के सहारे वे राजनीति के गलियारे में प्रवेश करना चाहते थे वह मुद्दा दरअसल राजीव दीक्षित ने जोर-शोर से उठाया था, जिसका श्रेय रामदेव ने उन्हें कभी नहीं दिया।
यह एक तरह का पायेटिक जस्टिस था क्योंकि खुद राजीव दीक्षित कभी अपने मुद्दों के संदर्भ में उन साथियों की चर्चा कभी भी नहीं करते थे जो इन कामों के लिये शोध हेतु कड़ी मेहनत करते थे। इनमें से एक नाम वर्धा के शिवदत्त भाई का है जो गांधीवादी कार्यकर्ता हैं। बहरहाल इससे पहले कि रामदेव सत्ता के गलियारे में प्रवेश के लिये आंदोलन के जरिये थोड़ी बहुत जगह बना पाते, उनकी चालाकी ने उनका खेल बिगाड़ दिया और सलवार-कुर्ता पहनकर मैदान से भागने की उनकी कहानी सबको पता है।
तो कांग्रेस से रामदेव के रिश्ते इतने खराब हुए कि भाजपा की गोद में जाकर बैठने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं रह गया था। वरना एक समय था कि बड़े-बड़े कांग्रेसी मंत्री भी उनके चरण स्पर्श करते थे। अब भाजपा का साथ बाबा की मजबूरी है पर हाल की रैली में उन्होंने एक बार फिर चालाकी दिखाते हुए संकेत यह दिया कि उन्हें समर्थन वे कुछ "शर्तों" पर देंगे। ये शर्तें क्या थीं? एक तो वही कालेधन वाली, जिसका कापीराइट आजादी बचाओ आंदोलन के पास था। कुछ अन्य शर्तें कर प्रणाली में सुधार वाली हैं, जो दरअसल अर्थक्रांति आंदोलन की हैं, जिनका खुलासा भड़ास4मीडिया में कोई साल भर पहले हो चुका है।
कल एनडीटीवी में रविश ने इस पर प्रोग्राम किया। बाबा इस तरह बोल रहे थे जैसे ये सारे प्रस्ताव उनके अपने हों और वे अर्थशास्त्र के बहुत बड़े विद्वान हों। हकीकतन सुनी-सुनाई बात को भुनाने में वे बेहद माहिर हैं और सारी चीजों का क्रेडिट अपने पास रखना चाहते हैं। इसी चालाकी में पिटते हैं और सलवार-कुर्ते का सहारा लेते हैं। मुझे कहना केवल इतना है कि कम से कम जिनके मुद्दे उठायें, उन्हें थोड़ा-सा श्रेय तो दें।
देंखें :
http://old.bhadas4media.com/lifestyle/12522-2011-08-15-13-58-24.html
http://old.bhadas4media.com/lifestyle/12523-2011-08-15-14-11-43.html
लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. इप्टा, डोगरगढ़ के अध्यक्ष हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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