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लखनऊ

मुजफ्फरनगर-मातम, सैफई-डांस… हमें तो जाना है, उत्सव मनाना है…

मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों में रह रहे लोग जब सर्दियों में ठिठुर रहे थे तो समाजवादी पार्टी के पुरोधा मुलायम सिंह यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व सत्ताधारी दल के तमाम नेता सैफई में डांस क्यों देख रहे थे? यह सवाल चारों तरफ गूंज रहा है। मीडिया के लोग इसे और तूल दे रहे हैं। साफ लग रहा है कि किसी लेन-देन में कोई बात रह गई है, इसीलिए अखिलेश के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं।

मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों में रह रहे लोग जब सर्दियों में ठिठुर रहे थे तो समाजवादी पार्टी के पुरोधा मुलायम सिंह यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व सत्ताधारी दल के तमाम नेता सैफई में डांस क्यों देख रहे थे? यह सवाल चारों तरफ गूंज रहा है। मीडिया के लोग इसे और तूल दे रहे हैं। साफ लग रहा है कि किसी लेन-देन में कोई बात रह गई है, इसीलिए अखिलेश के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं।

मीडिया के यही संवेदनशील लोग किश्तवाड़ की हिंसा पर चुप रहते हैं, जहां हाल ही में हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया था। चलिए हम बांग्लादेश में हिंदुओं के मारे जाने की ताजा घटनाओं की बात छोड़ भी दें और पाकिस्तान में लगातार हिंदुओं के मारे जाने की बात पर मौन रह लें, लेकिन किश्तवाड़ की घटना तो भारतवर्ष की है, अभी हाल ही की घटना है। वहां के हिंदुओं को इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने मारा, घर फूंके, सम्पत्तियां लूटीं और यहां तक कि सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें दौड़ा दौड़ा कर मारा गया। जिन्हें मारा गया उनके लिए या जिन्हें बर्बाद किया गया उनके लिए वो मीडिया वाले कहां थे जो आज सैफई पर गाना गा रहे हैं?

देश के सारे नेता और सारा मीडिया एक ही दुश्चरित्रता का शिकार है। मारे जाने वाले लोग किसी भी समुदाय के हों, उनके साथ संवेदनशीलता के साथ पेश आना चाहिए। लेकिन यह कौन सी मानवीयता है कि मुसलमान मारा जाए तो समवेत रुदालियां हों और हिंदू या सिख या अन्य समुदाय के लोग मारे जाएं तो मीडिया भी और नेता भी मिल कर चुप रहने का उत्सव मनाएं! मुजफ्फरनगर और गुजरात पर बोलियों के गुच्छे और किश्तवाड़ और गोधरा पर मौन साध लेते हैं लुच्चे! ऐसी भ्रष्ट और दो कौड़ी की मानवीय समझ और संवेदना वाले मीडिया के खिलाफ सड़कछाप पिटाई आंदोलन चलाए जाने की अनिवार्यता है। वह समय अब आ गया है।

खैर, मीडिया द्वारा देश-समाज में बनाए जा रहे बेजा माहौल के कारण शब्द-भाव तीखे होते जाएं उससे फिलहाल बचने के लिए कविता की शैली में शब्दों का सहारा लेते हैं… किसी भी दिन सब देखेंगे तुम्हारा चेहरा, जिस पर उत्सव के दिन वाली उदासी का विवरण लिखा मिलेगा / उत्सव के आतंक में गांव का गांव पतझड़ के पेड़ जैसा दरिद्र और निस्पृह हो गया है / दिल्ली कहां है, वहां है जहां उत्सव है / वहीं राष्ट्रपति है पर राष्ट्र कहां है? वहीं संसद है पर संविधान कहां है? लखनऊ कहां है? सैफई जहां है, उत्सव वहीं है, सत्ता वहीं हैं / खेतों पर पड़ी है दुख की लम्बी छाया, अमानुषिक सत्ता व्यवस्था के कुत्सित आकार में सिमटा जा रहा है राष्ट्र / अब बस बची-खुची इच्छाओं-आकांक्षाओं का उत्सव है / कौन से उत्सव की बातें करते हो तुम सब? कौन सा उत्सव है इन दिनों? इस स्याह अंधेरे देश और प्रदेश की राजधानी में? खुली आंखों और खुले हृदय से देखो मित्र! तभी नजर आएगा हिंसा के बरक्स उत्सव का वीरान दृश्य और मुजफ्फरनगर और किश्तवाड़ की चीखों पर किश्तों में मनाए जा रहे मनोरंजन का हृदयहीन समय / तभी महसूस करोगे हास विलास और उत्सव उल्लास के चकाचौंधी मंच के ठीक पीछे बिखरा हुआ जन-विश्वास…

धूमिल ने भी क्या खूब लिखा है। जैसे आज के लिए ही लिखा हो। पर उस आत्मा से क्षमायाचना के साथ कुछ पंक्तियां जोड़ देता हूं… हर तरफ धुआं है, हर तरफ कुहासा है, जो दांतों और दलदलों का दलाल है, वही देशभक्त बचा है / अंधकार में सुरक्षित दुबकने का नाम तटस्थता और धर्मनिरपेक्षता है / यहां इस नाम पर जो भोला चेहरा दिखता है उसका चेहरा सबसे ज्यादा लहू से सना है / जिसके पास थाली है वह भी खाली है, हर भूखा आदमी उस तटस्थता के लिए सबसे भद्दी गाली है / हर तरफ कुआं है, हर तरफ खाई है / यहां सिर्फ वही आदमी देश के करीब है जो या तो मूर्ख है या फिर गरीब है…

तो दोस्तो! सवाल बहुत ज्यादा हैं। जवाब बहुत कम हैं। हम उडऩा तो चाहते हैं लेकिन हमारे पंख नुचे हुए हैं। …और जो उड़ रहे हैं उनके पंख खून के कीचड़ में सने हुए हैं। वे अभी अभी हुए खून-खच्चर के बाद पड़े सुनसान में भी मंच से भाषण दे रहे हैं। जैसा कि उनका काम ही है परम्परा से भाषण देना। लेकिन फिर भी उन्हें अपनी ही आवाज अजनबी नहीं लगती। आंखें हों तो चेहरा दिखाई दे। कान हो तो चीखें सुनाई दे। सवाल बहुत ज्यादा हैं। जवाब बहुत कम हैं। जिंदा सवालों पर बात करने वाला कोई नहीं मिलता जिंदा। मिलता भी है तो कोई-कोई ही आखिरी सांसें लेता हुआ। इम्तहान बड़ा है मनुष्य होने का। लेकिन हमें इससे क्या लेना-देना। हमें तो जाना है, उत्सव मनाना है…

लेखक प्रभात रंजन दीन वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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