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दिल्ली

खुलकर मोदी के समर्थन में आईं अन्ना की शिष्या… अब किरण बेदी को पाप नहीं लगेगा?

किरण बेदी ने अपना वोट नरेंद्र मोदी के समर्थन में देने की बात कहकर आज फिर पूरे देश को निराश किया. मुझे लगता है कि इससे उनकी टॉप कॉप और संवेदनशील नागरिक की जो छवि इतने सालों में बनी थी, उसे बहुत बड़ा धक्का लगा है. किरण बेदी अब राजनीति के चक्रव्यूह में हैं और आगे से उनकी बात में वह वजन नहीं रहेगा, जैसा अब तक था क्योंकि उनकी हर बात को उनके मोदी समर्थन से जोड़कर देखा जाएगा.

किरण बेदी ने अपना वोट नरेंद्र मोदी के समर्थन में देने की बात कहकर आज फिर पूरे देश को निराश किया. मुझे लगता है कि इससे उनकी टॉप कॉप और संवेदनशील नागरिक की जो छवि इतने सालों में बनी थी, उसे बहुत बड़ा धक्का लगा है. किरण बेदी अब राजनीति के चक्रव्यूह में हैं और आगे से उनकी बात में वह वजन नहीं रहेगा, जैसा अब तक था क्योंकि उनकी हर बात को उनके मोदी समर्थन से जोड़कर देखा जाएगा.

किरण बेदी शानदार पुलिस अधिकारी रही हैं लेकिन मुझे उस वक्त तब निराशा हुई थी, जब दिल्ली पुलिस कमिश्नर ना बनाए जाने वाले विवाद के बाद उन्होंने वक्त से पहले इस्तीफा दे दिया था (रिटायरमेंट ले लिया था). इस तरह देश-पब्लिक की सेवा से वह वक्त से पहले ही फारिग हो गईं. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि सिस्टम में रहकर ही आप कुछ कर सकते हैं, सिस्टम से बाहर होकर नहीं. हमेशा चीजें आपके अनुकूल-मनमाफिक नहीं होतीं लेकिन उन सीमाओं के बावजूद आप यथासंभव अच्छा काम कर सकते हैं.

फिर किरण बेदी अन्ना के आंदोलन से जुड़ी. अरविंद केजरीवाल भी अन्ना के साथ थे. दोनों ने साथ मिलकर जनलोकपाल की लड़ाई लड़ी और फिर दोनों के रास्ते अलग हो गए. अरविंद का मानना था कि सिस्टम में घुसे बगैर इसे साफ करना संभव नहीं है (मैं खुद इस सोच का बहुत बड़ा हिमायती हूं) और अन्ना की तरह किरण बेदी का मनना था कि राजनीति कीचड़ है, इसमें उतरे तो दाग लग जाएंगे. वह अन्ना की -आज्ञाकारी- शिष्या बनी रहीं. बाद में पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह भी अन्ना-किरण के साथ हो गए और आंदोलन के रास्ते लोकपाल की लड़ाई का दम भरा.

इधर अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी बना ली. किरण बेदी को भी ऑफर किया (ऐसी खबरें आई थीं) कि वह उनके साथ इस लड़ाई में शामिल हो जाएं. अरविंद, किरण को शीला दीक्षित के बरक्स मुख्यमंत्री पद का कैंडिडेट घोषित कर दिल्ली चुनाव में जाना चाहते थे. लेकिन किरण ने मना कर दिया. अरविंद ने मनीष सिसोदिया और अन्य साथियों के साथ यह लड़ाई लड़ी और राजनीति में धमाका करते हुए दिल्ली में सरकार बनाने की स्थिति में आ गए.

यही वो वक्त था जब किरण बेदी अरविंद केजरीवाल की सबसे बड़ी आलोचक बनकर उभरीं. बिन मांगी सलाह दे दी कि अरविंद को फलां पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनानी चाहिए. फिर एक टीवी चैनल पर कहा कि अगर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के मैनडेट का आदर करते हुए सरकार नहीं बनाई तो केजरीवाल को पाप लगेगा. मुझे आश्चर्य हुआ कि सबसे ज्यादा सीटें दिल्ली में बीजेपी को आई थी, संविधान-नियम-कानून (जिसकी दुहाई किरण बेदी सबसे ज्यादा देती हैं) के मुताबिक बीजेपी को सरकार बनानी चाहिए थी, लेकिन बीजेपी पर किरण खामोश थीं. उसे सेफ पैसेज देते हुए वह केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को -पाप लगा- रही थीं. किरण अगर objective थीं, तो वह ये क्यों नहीं कह पाईं कि बीजेपी जनता के मैनडेट को ना मानकर और सरकार ना बनाकर गलती कर रही है और इससे बीजेपी को पाप लगेगा???!!!

फिर एक और ड्रामा हुआ. दिल्ली चुनाव के नतीजों को देखकर सरकार ने दबाव में जनलोकपाल बिल पास कर दिया. लेकिन अरविंद केजरीवाल इससे सहमत नहीं थे क्योंकि सीबीआई को स्वतंत्र करने और बहुत सी बातों की सरकार ने नहीं माना था. अरविंद ने इसे जोकपाल कहा लेकिन किरण बेदी फिर अड़ गईं. कहा कि जो जोकपाल बता रहे हैं, उन्होंने बिल को पढ़ा ही नहीं है. हैरत तो तब हुई जब अन्ना हजारे ने भी उस -सरकारी बिल- को अपना समर्थन देकर फटाफट अनशन खत्म कर दिया. अरविंद ने कहा कि अन्ना को बिल की बारीकियां कोई नहीं बता रहा और उन्हें मिसगाइड किया जा रहा है. अरविंद का इशारा साधे तौर पर किरण बेदी-जनरल सिंह और पत्रकार संतोष भारतीय की तरफ था.

उस वक्त मीडिया में इस बात की भी खबर आई कि किरण बेदी और जनरल सिंह बीजेपी के हाथों में खेल रहे हैं. बीजेपी से इनकी sympathy है और देर-सबेर ये बीजेपी में शामिल होंगे. किरण बेदी और जनरल सिंह ने मिलकर अन्ना हजारे के मंच की पवित्रता खराब की है (अन्ना हजारे किसी भी पार्टी-पक्ष के लोगों को अपना मंच साझा नहीं करने देते). लेकिन किरण बेदी ने इन सब बातों का खंडन किया और कहा कि उनका किसी राजनीतिक पार्टी से कोई लेना-देना नहीं हैं.

पर आज सुबह-सुबह जब ये खबर आई कि किरण बेदी ने सार्वजनिक घोषणा कर दी है कि उनका वोट नरेंद्र मोदी को जाएगा, तो उनके चेहरे पर पड़ा नकाब हट गया. ये खबर सच निकली कि वह बीजेपी से sympathy रखती हैं. जनरल वीके सिंह के बारे में भी कल Times Now के News Hour डिबेट में अर्णव गोस्वामी ने कहा कि उन्हें पक्की खबर है (unofficially) कि जनरल वीके सिंह बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं और बस ये तय होना है कि वह कहां से चुनाव लड़ेंगे, हालांकि अभी इस खबर को वह अपने चैनल पर नहीं दिखा रहे हैं. अर्णव ने ये बात एक बीजेपी प्रवक्त को बातचीत के लहजे में कही.

तो किरण बेदी के बयान (टि्वटर पर) और जनरल सिंह के बारे में अर्णव के खुलासे से सबकुछ पानी की तरह साफ-साफ दिख रहा है. इस आशंका से अब एकदम इनकार नहीं किया जा सकता कि रालेगन सिद्धि में अन्ना के पिछले अनशन के दौरान किरण-जनरल सिंह ने अन्ना के मंच का -अपने हित- में इस्तेमाल किया. वे बार-बार ये बात कहते रहे कि वो ना किसी पार्टी में शामिल होंगे और ना ही उनकी किसी राजनीतिक पार्टी से sympathy है. वे बस अन्ना के साथ गैर-राजनीतिक आंदोलन कर रहे हैं. लेकिन वे झूठ बोलते रहे. किरण ने तो ऐलान कर दिया. अब इंतजार है कि जनरल वीके सिंह आगे क्या करते हैं, बीजेपी में शामिल होते हैं या नहीं. और इस पूरे प्रकरण में पूरी तरह से ठगे गए अन्ना हजारे. उन्हें क्या पता नहीं था कि किरण बेदी और जनरल सिंह आगे क्या करने वाले हैं, एक राजनीतिक पार्टी से उनकी sympathy है. अब अन्ना क्या कहेंगे, क्या करेंगे?? क्या नरेंद्र मोदी के पाले में जाने पर किरण बेदी पर कोई सार्वजनिक बयान देंगे. देखते हैं.

मुझे तो लगता है कि इस पूरे प्रकरण में अन्ना के असली चेले अरविंद केजरीवाल ही निकले. जमी-जमाई राजनीतिक पार्टियों में जाने की बजाय -अलग राजनीति- की शुरुआत के लिए उन्होंन नई पार्टी भी बनाई और जनता में उसकी पैठ स्थापित करके ईमानदारी से राजनीति करने-चुनाव लड़ने की परंपरा भी शुरु की. लेकिन किरण बेदी ने उस पार्टी, बीजेपी, से अपनी हमदर्दी दिखाई जिसके खिलाफ कभी वह रामलीला मैदान में अन्ना के साथ खड़ी थीं. आज किरण उस बीजेपी के साथ खड़ी हैं, जिस पर देश में साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगता है.

मैं ये नहीं समझ पाया कि बीजेपी और नरेंद्र मोदी को वोट देने की बात करने से पहले क्या किरण बेदी को जाकिया जाफरी और दंगों में मारे गए हजारों मासूमों (हिंदू और मुसलमान दोनों) की याद नहीं आई??!! किरण तो खुद आला पुलिस अफसर रही हैं तो क्या वे नहीं जानतीं कि किसी राज्य सरकार के मुखिया के संरक्षण के बिना उनके राज्य में इतने बड़े दंगो इतने समय तक हो सकते हैं, चल सकते हैं???!! फिर वो गुजरात के दंगे हों, दिल्ली के सिख विरोधी दंगे या फिर मुजफ्फरनगर के दंगे. क्या वो ये नहीं जानतीं कि अगर पुलिस और राज्य सरकार चाह ले तो किसी भी तरह की साम्प्रदायिक हिंसा पर महज चंद घंटों में काबू पाया जा सकता है???!!! मुझे घोर निराशा और दुख है कि किरण बेदी जैसी साहसी, निर्भीक और बेदाग पूर्व पुलिस अफसर ने अपना वोट नरेंद्र मोदी को दिया है. आज फिर एक तस्वीर उसी तरह टूटी है, जैसी उस दिन टूटी थी, जिस दिन लता मंगेश्कर ने नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने की बात कही थी. लता ताई को तो फिर भी benefit of doubt दिया जा सकता है क्योंकि वह कलाकार हैं, शायद राजनीति-तिकड़मबाजी-प्रशासन को ज्यादा ना समझती हों. लेकिन किरण जी, आप तो सब जानती है, पूरे कैरियर में इन सब चीजों को फेस करती आई हैं. इन चीजों को करीब से देखा है. फिर कैसे आपने ये फैसला लिया??!!!

ये ठीक है कि नरेंद्र मोदी के हजारों समर्थकों की तरह और भारत का नागरिक होने के नाते आपको किसी भी पार्टी को वोट देने और उनके पक्ष में खड़े होने की आजादी है. सबको है. लेकिन यहां बात नैतिकता की हो रही है. हमें नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की उस बात का मर्म समझना होगा, जब उन्होंने ये कहा था कि बात नरेंद्र मोदी के समर्थन या उनके विरोध की नहीं है. बात इंसाफ की है. एक majority community का होने के नाते ये मेरा दायित्व और कर्तव्य है कि मैं minority community के हक-हुकूक और उन्हें दिए जाने वाले इंसाफ की बात करें. किरण बेदी महाभारत के धृतराष्ट्र की तरह नेत्रहीन भी नहीं हैं और ना ही किसी भीष्म प्रतिज्ञा से बंधी हैं. फिर भी ये नहीं समझ पाया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया??!! अब वह बेशक नरेंद्र मोदी के गुण गाएं लेकिन मेरी राय में इस घटना से उनकी सार्वजनिक छवि और क्रेडिबिलिटी को जबरदस्त धक्का लगा है और कोई भी संवेदनशील नागरिक अब उनकी बात को सीरियसली नहीं लेगा. आइरन लेडी पिघल चुकी हैं. वैसी भी नरेंद्र मोदी को सरदार पटेल की मूर्ति बनाने के लिए बहुत बड़ी तादाद में लोहा चाहिए होगा. इतिहास में ये वाकया भी दर्ज हुआ. फैसला हमारी भावी पीढ़ी करेगी. जय हो.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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