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सुख-दुख...

अखिलेश जी बताएं कि अखबार मालिकों को दो बार राज्यसभा क्यों भिजवाया और अब क्या खटपट हो गई

सीएम साहब की घुड़की के बाद सबको (अखबारनवीसों) मानो सांप सूंघ गया है। कोई इतना पूछने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहा है कि आखिर खबरों पर विरोध जताने का यही तरीका अब बाकी रह गया है क्या? खबर लिखने वाले को बुलाओ और भरे बाजार जमकर गरियाओ, अरे कम से कम तथ्यों को तो मांग लिया जाता। अगर न संतुष्ट होते तो ऐसा करके मन भर लेते लेकिन अब तो सरकार के मुखिया ही ‘‘ऑन द स्पॉट’’ फैसला सुनाने लगे हैं।

सीएम साहब की घुड़की के बाद सबको (अखबारनवीसों) मानो सांप सूंघ गया है। कोई इतना पूछने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहा है कि आखिर खबरों पर विरोध जताने का यही तरीका अब बाकी रह गया है क्या? खबर लिखने वाले को बुलाओ और भरे बाजार जमकर गरियाओ, अरे कम से कम तथ्यों को तो मांग लिया जाता। अगर न संतुष्ट होते तो ऐसा करके मन भर लेते लेकिन अब तो सरकार के मुखिया ही ‘‘ऑन द स्पॉट’’ फैसला सुनाने लगे हैं।

वैसे काम सराहनीय है। हिम्मत दिखायी है अखिलेश जी ने। पर एक हिम्मत और दिखानी चाहिए कि कौन-कौन से अखबारनवीसों को अपनी साइकिल पर घुमा रहे हैं और क्यों भला! अखबारनवीसों को सूचना आयुक्त तक बनाया। आखिर अखबारनवीसों ने साइकिल कहां तक और क्यों दौड़ाई है। इसका भी खुलासा करें। खैर बड़े अखबारनवीसों को अखिलेश के इस रुख से सदमा जरूर लगा होगा क्योंकि लॉलीपॉप चूसने की कतार में उनका नम्बर जल्द ही आने वाला था।

आज देश के नम्बर वन अखबार होने का दावा करने वालों पर सरे आम सरकारी भड़ास निकाली गयी है। कल को नम्बर किसी का भी आ सकता है। इसमें दोष भी अखबारनवीसों का ही है। लेकिन सीएम साहब ये भी तो बताइयें कि क्या वाकई इन खबरों में सच्चाई है कि साइकिल पर सवार अपराधियों को मान्यता प्राप्त अखबारनवीस होने का दर्जा दिलाया जा रहा है, या फिर कमल में लगे कीचड़ को साफ कर रहे या हाथी की सवारी कर रहे अखबारनवीसों की ही आप की सरकार को बदनाम करने की साजिश मात्र है।

आप सिर्फ सैफई महोत्सव में 300 करोड़ खर्च होने की खबरों पर इतना भड़के कि मालिकों तक पहुंच गये। आपने उन्हें दो बार राज्यसभा क्यों भिजवाया था, इस मेहरबानी का खुलासा भी उसी प्रेस कांफ्रेस में कर देते तो बेहतर रहता। साथ ही इस बार टिकट कटने के पीछे कौन सी खटपट ने असर दिखाया। इसको बताने से हम लोगों का भी ज्ञानवर्धन होगा। आपके सुशासन भरे राज्य में कितने अफसरों पर कितने गहरे कलंक लगे हैं। और कितने दागी माननीयों को आपने लालबत्ती से नवाज कर उपकृत किया, इसका भी खुलासा अगर करते तो शायद आप की साफगोई के कायल हम सब भी होते। पर कसूर सीएम साहब का नहीं, हम अखबारनवीसों का ही है जो कि हम सरकार के ऐसे गहरे ‘‘दागों’’ पर अखिलेश जी को गुस्सा नहीं दिला पा रहे हैं।

खैर ये सब न होता तो ये कहावत भी न बनती कि खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे। वैसे व्यक्तिगत रूप में हम खुद मुख्यमंत्री अखिलेश की नम्रता और उनके कोमल स्वभाव के खासे कायल हैं। पर उनके इस गुस्से ने हमारी भी आंखे खोल दी है। भई मंथन का समय है। खास तौर पर अखबारनवीसों के लिए, वरना अबकी हमारा या आपका नम्बर जरूर होगा और अखिलेश जी से विनम्र निवेदन है कि जरा ‘‘निष्पक्ष प्रतिदिन’’ की बेबाक खबरों का भी गहराई से अवलोकन कर लिया करें तो इस तरह की भड़ास हम पर भी रोजाना गिरे क्योंकि हम तो सरकार को रोजाना ही खबरों का ऐसा काढ़ा पिलाते हैं जो दिखने में भले खराब लगता है लेकिन सरकार की सेहत के लिए खासा फायदेंमद है।

आप हमारी भी खबरों को देखें ताकि हम धन्य तो हो ही जाये और आप की आलोचनाओं के बाद और हिम्मत से मेहनत करने का अवसर प्राप्त हो। इसलिए आप की भड़ास सुनने का बड़ा मन है। पर हां आप हमारे ऊपर जुए या दारू सरीखा या फिर पिटाई जैसा आरोप नहीं लगा पायेंगे। क्योंकि इन सब व्यसनों से हम जरा दूर ही रहते हैं। पर छोटा होने के नाते आप से सिर्फ एक गुजरिश है कि इतना गुस्सा अपनी सरकार के गलत कार्यों पर भी दिखाया करें और उनके जिम्मेदारों को इसी तरह कुर्सियां सजा कर भरी प्रेस कांफ्रेस में बुलाकर भरे बाजार।

लेखक मनीष श्रीवास्तव लखनऊ से प्रकाशित निष्पक्ष प्रतिदिन के ब्यूरो चीफ हैं.

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