Vikas Mishra : मेरठ और उसके आसपास पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक बिहार विरोधी लहर चलती है। वैसे लहर तो पूरब विरोधी है, लेकिन बिहार खास तौर पर निशाने पर रहता है। मैं पांच साल वहां रहा, बिहार और पूरब विरोध के तमाम रोचक, आश्चर्यजनक पहलुओं से दो चार होता रहा। दैनिक जागरण में एक सीनियर क्राइम रिपोर्टर हुआ करते थे। उन्होंने एक खबर लिखी थी, जिसमें मालिक के घर चोरी करने वाले नौकर का जिक्र था। रिपोर्टर ने लिखा था- वो नौकर शक्ल से ही बिहारी दिखाई देता था।
मैंने पूछा- प्रभु शक्ल से बिहारी आपने कैसे पहचाना। बड़ी मासूमियत से बोले- अरे भाई साहब बिहारी को देखकर ऐसे ही पता लग जाता है, साला गमछा लिए था, मुंह भी बिहारी जैसा था..। खैर मैं क्या कहता। नेताओं की विज्ञप्ति आती थी, या हरित प्रदेश बनाने के संदर्भ में कोई विज्ञप्ति, बयान, प्रेस कान्फ्रेंस की अनिवार्य लाइन होती थी- पश्चिम वाले कमाते हैं, पूरब वाले खा जाते हैं। बाकायदा इसके तर्क-वितर्क भी होते थे। मैंने पांच साल लगातार हर बार ये लाइन हर रिपोर्टर की कॉपी से उड़ा दी। इतना क्षेत्रवाद मैं भी कर आया वहां।
दैनिक जागरण मेरठ में एक बाबा होते थे, पहले सिटी चीफ थे, बाद में संपादकीय प्रभारी बने। वो पूरब से आए हुए लोगों के बारे में डायरेक्टर तक से कहते थे- भइया जी, ये अटैची वाले हैं, अटैची लेकर आए हैं, अटैची लेकर चले जाएंगे, इन पर ज्यादा भरोसा करना ठीक नहीं है। एक वक्त आया जब श्रीकांत अस्थाना (मूल निवासी-वाराणसी) संपादकीय प्रभारी बने, मैं गोरखपुरिया सिटी चीफ बना, जेपी त्रिपाठी (जिला-आजमगढ़) प्रादेशिक प्रभारी बने, मनोज झा (जिला भागलपुर) सिटी डेस्क के प्रभारी और यशवंत सिंह (अब भड़ासी, जिला-गाजीपुर) जनरल डेस्क के इंचार्ज बने। यानी सभी प्रमुख पदों पर पूरबियों का कब्जा हो गया। बड़ा घमासान हुआ।
संस्थान में कौन आया, कौन गया, इस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती थी, लेकिन जैसे ही किसी बिहारी के आने की बात होती, सौ शिकायत पहले से डायरेक्टर तक पहुंच जाती। ऐसे ही मुकेश सिंह (अब संपादकीय प्रभारी अलीगढ़ दैनिक जागरण) के साथ हुआ। हमारे बैचमेट रहे हैं मुकेश जी आईआईएमसी में। अमर उजाला देहरादून में थे, शशि शेखर जी ने अचानक इस्तीफा मांग लिया, बेचारे पैदल हो गए। मैंने जागरण के डायरेक्टर से बात की। लेकिन मेरे बात करने से पहले तीन लोग जाकर उनसे मिल लिए थे कि मुकेश कुमार नाम के इस शख्स को मत रखिएगा, बहुत राजनीति करता है।
खैर मैंने दृढ़ता से पैरवी की, उनके हुनर की तारीफ की। विरोधी दल लग गए, मुकेश जी की नियुक्ति हो गई, लेकिन डायरेक्टर ने मुझसे कहा कि कोई गड़बड़ इन्होंने की तो जिम्मेदारी आपकी होगी। खैर मुकेश जी अब उनके सबसे प्रिय लोगों में हैं। ऐसे ही मनोज झा अमर उजाला में थे, मन उखड़ा, मैं जागरण ले आया, अब वो वहां के संपादकीय प्रभारी हैं। मेरी पिछली पोस्ट में मेरी अमर उजाला की पुरानी साथी मोनिका आर्या Monika Arya ने भी गंगेश गुंजन का जिक्र किया था, जिनकी मैं मदद नहीं कर पाया था। गंगेश का नाम मैंने डायरेक्टर के सामने लिया। विरोध में पांच लोग पहुंच गए। इनमें से दो तो ऐसे थे जो एक दूसरे के जानी दुश्मन थे, लेकिन बिहारी को आने से रोकने के लिए एकजुट हो गए।
बिहार से ये परहेज ऊपर से नीचे तक हैं। मेरठ का रिक्शावाला भी मोलभाव नहीं करता। कितना लोगे, बोलेगा-चालीस रुपये..। कुछ कम कर लो– बोलेगा- बिहारी समझे हो क्या। कोई बिहारी पकड़ लो।
पूरब-पश्चिम के इस विरोध की जड़ें कहीं गहरे हैं, वरना पश्चिम के लोग हैं बड़े जानदार। मेरठ छूटे करीब नौ साल हो रहे हैं, लेकिन बहुतों से रिश्ते शानदार हैं। मैं क्या, मेरे तमाम हित-दोस्त रिश्तेदारों का इलाज मेरे परिचय से मेरठ में होता है। तमाम नेता हैं, जो दिल्ली में आकर मिलते हैं, अपने उसी प्रोफाइल में,जिसमें वो पहले थे। मेरठ से गुड़ और गन्ना भेजने वाले साथियों की भी कमी नहीं है और अखबारों में तो करीब तीन दर्जन साथी ऐसे हैं, जो हमेशा मुहब्बत की बारिश करते हैं। तभी तो होली का त्योहार हर साल मेरा मेरठ में ही बीतता है।
आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.
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