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यूपी में पांचवा मोर्चा किंग मेकर?

: क्या यूपी में सत्ता की कुंजी ‘खुदरा पार्टियों’ के हाथ में होगी? एक दर्जन से ज्यादा रिटेल पार्टियों ने मिलकर इत्तेहाद फ्रंट का गठन किया है। यह मंच सूबे की राजनीतिक लड़ाई में पांचवां मोर्चा बन कर उभरा है, लेकिन इसी गठबंधन में कौमी एकता दल के जो लोग शामिल हैं, उनमें कई लोग संगीन मामलों में जेल के भीतर हैं। देखें, क्या गुल खिलाता है यह मोर्चा…? अखिलेश अखिल की रिपोर्ट… :

: क्या यूपी में सत्ता की कुंजी ‘खुदरा पार्टियों’ के हाथ में होगी? एक दर्जन से ज्यादा रिटेल पार्टियों ने मिलकर इत्तेहाद फ्रंट का गठन किया है। यह मंच सूबे की राजनीतिक लड़ाई में पांचवां मोर्चा बन कर उभरा है, लेकिन इसी गठबंधन में कौमी एकता दल के जो लोग शामिल हैं, उनमें कई लोग संगीन मामलों में जेल के भीतर हैं। देखें, क्या गुल खिलाता है यह मोर्चा…? अखिलेश अखिल की रिपोर्ट… :

यूपी की चुनावी फिजा में कांग्रेस, भाजपा, बसपा और सपा के बाद लगभग दो दर्जन दलों का साझा मंच चुनाव में कुछ अनहोनी कर गया, तो न सिर्फ राजनीति की तस्वीर बदलेगी, बल्कि किंग मेकर की भूमिका में भी इत्तेहाद फ्रंट कारगर साबित होगा। नदवा कॉलेज के मौलाना सैयद सलमान नदवी ने बताया- ''आगे क्या होगा, अभी कुछ नहीं कह सकता। पहले 13 पार्टियां इस बैनर के नीचे आर्इं और अब 20 से ज्यादा पार्टियां इसके नीचे आ गई हैं। हम एक बेहतर विकल्प देने का प्रयास कर रहे हैं। अगर यह गठबंधन अपने मिशन में कामयाब रहा, तो प्रदेश की तस्वीर बदल जाएगी। हमारी सबसे बड़ी कोशिश सभी धर्मों के बीच मजबूत एकता कायम करने की है और जिस दिन हम सभी के बीच एकता कायम हो गई, राजनीति बदल जाएगी। गंदी हो चली राजनीति को साफ करने करने के लिए इस तरह की एकता बहुत पहले बननी चाहिए थी। अगर हम अपने जज्बे के साथ आगे बढ़ते हैं, तो हम एक नया इतिहास बना सकते हैं। आप जान लीजिए, हम भले ही सरकार नहीं बना सकें लेकिन किंग मेकर की भूमिका में तो आ ही सकते हैं।’'

तो ये थे मौलाना नदवी साहब के बयान। जोश और जज्बे से भरे नदवी साहब राजनीति को साफ करने की बात कर रहे हैं। लेकिन इसी गठबंधन में कौमी एकता दल के जो लोग शामिल हैं, उनमें कई लोग संगीन मामलों में जेल के भीतर हैं। आगे बढें, इससे पहले आपको बता दें कि बड़े दलों से परहेज किए जाने के बाद इस इत्तेहाद फ्रंट के बैनर पर कई बाहुबली भी चुनाव लड़ने जा रहे हैं। विधायक मुख्तार अंसारी, पूर्व सांसद अतीक अहमद और विधायक जितेंद्र सिंह बबलू सूबे के इस चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं। ये तीनों इस समय जेल में हैं। राजनीति को डराने वाले ये तीनों लोग जब चुनाव लड़ेंगे, तो किस तरह से राजनीति ‘साफ’ होगी, आप खुद सोच सकते हैं?

आपको बता दें कि इस इत्तेहाद फ्रंट एकता मंच की बुनियाद सबसे पहले पीस पार्टी के डॉ. अयूब, बुंदेलखंड कांग्रेस के राजा बुंदेला और अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने तैयार की थी। इन तीनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा भी हो गया था। बाद में मौलाना नदवी के नेतृत्व में कई और दलों को भी इस फ्रंट के नीचे लाने का प्रयास किया गया। पिछले दिनों इस फ्रंट के नीचे जो दल सामने आए हैं उनमें शामिल हैं डॉ. अयूब की पीस पार्टी, अनुप्रिया का अपना दल, राजा बुंदेला की बुंदेलखंड कांग्रेस, ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी, मुख्तार अंसारी का कौमी एकता दल, ताकीर रजा खान की इत्तेहाद मिल्लत कौंसिल, देवेंद्र गौड़ की गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, एमए सिद्दकी की भारतीय युवा कल्याण पार्टी, मोहम्मद सुलेमान की इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, भारतीय लोकहित पार्टी, राष्ट्रीय परिवर्तन पार्टी, अरशद खान की नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी, भगवान सिंह की राष्ट्रीय परिवर्तन मोर्चा, उदित राज की इंडियन जस्टिस पार्टी और स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य की भारतीय जनसेवा पार्टी।

आप यह भी कह सकते हैं कि इस एकता मंच को कहीं का र्इंट और कहीं का रोड़ा से सजाया गया है। ये वही पार्टियां हैं जो पहले अपने अपने स्वार्थों को लेकर बनाई गई थी और एक दूसरे का घोर विरोधी थी। यही पार्टियां ‘वोटकटवा’ कहलाती थीं और कई दफा भारतीय राजनीति को कलंकित भी करती थीं। यही वह बटमार या रिटेल पार्टियां हैं जो हर चुनाव में दाखिल होती रही हैं और जनता को क्षेत्रवाद, जातिवाद पर बांटती रही हैं। इन दलों को आज तक कितनी सीटें मिलीं और कितने वोट पाए, खुद इन्हें भी नहीं मालूम।

कुछ उदाहरण आपके सामने पेश हैं। देवेंद्र गौड़ गोंडवाना गणतंत्र पार्टी चलाते हैं। 2002 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इसके आठ उम्मीदवार मैदान में थे। आठ उम्मीदवारों में इन्हें कुल 11,262 वोट मिले थे। 2003 के मध्य प्रदेश चुनाव में इस पार्टी के 61 उम्मीदवार मैदान में खड़े हुए। तीन की जीत हुई और पार्टी को कुल 5,12102 वोट मिले थे। छत्तीसगढ़ 2003 के चुनाव में इस पार्टी के 41 उम्मीदवार खड़े थे, जिनमें किसी की भी जीत नहीं हुई और कुल 156916 वोट मिले। इसी तरह की दर्जनों पार्टियां हैं, जो हर चुनाव में लड़ती तो हैं, लेकिन न तो उन्हें वोट मिलते हैं और न ही उनकी जीत होती है।

ऐसी ही पार्टियों को देखते हुए संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों के बनाने पर रोक नहीं है। लेकिन पार्टी बनाने वालों को तो यह देखना ही चाहिए कि उन्हें वोट मिलते भी हैं या नहीं? चुनाव आयोग को इस पर ध्यान देना चाहिए। जो पार्टियां एक सीमा तक वोट नहीं लातीं, उन्हें रिजेक्ट कर देना चाहिए।प्रदेश में अपना दल का कुछ इलाकों में प्रभाव रहा है और उसने कई दफा कुछ सीटें भी जीती हैं। हालांकि सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद पार्टी से कई नेता विदा हो चुके हैं, लेकिन इस चुनाव में उनकी लड़की अनुप्रिया पटेल ने पार्टी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी लेकर प्रदेश की राजनीति में एक नई सनसनी पैदा कर दी है।

अपना दल पहले पीस पार्टी और राजा बुंदेला के साथ गठबंधन कर 150 सीटों पर लड़ने की बात कही थी, लेकिन अब अपना दल एकता मंच के निर्णय के अनुसार उम्मीदवार खड़ा करेगा। अनुप्रिया पटेल ने बताया, ‘जिस पार्टी की ताकत जैसी होगी, उसके अनुसार ही उन्हें टिकट दिया जाएगा। एकता मंच के बैनर तले कई सहयोगी दल हैं और हम आपस में मिलकर ही चुनाव लड़ेंगे। पहले हम अलग-अलग लड़ रहे थे, जिसका फायदा दूसरी पार्टियों को मिलता था। अब ऐसा नहीं होगा। पहले हम कमजोर थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। आने वाले दिनों में यह मंच कितना सार्थक होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन इतना तय है कि इस चुनाव में हमारी भी एक ताकत होगी और सरकार बनाने में हमारी भी भूमिका होगी।’

उधर, एकता मंच में शामिल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान का इरादा साफ है। सुलेमान कहते हैं कि हम दक्षिण भारत में मजबूत हैं। इस बार हम यहां पांच सीटों पर ही चुनाव लड़ना चाहते हैं। इसके अलावा नदवी साहब जैसा कहेंगे, वैसा किया जाएगा। चूंकि राजनीति में संख्या का गणित प्रमुख होता है, इसलिए अभी हम यह नहीं कह सकते कि हम कितनी सीटों पर बाजी मारेंगे, लेकिन पहले की तुलना में इस बार यह मंच पांचवें फ्रंट के रूप में खड़ा है। अगर मंच को लक्ष्य के अनुरूप सीटें आ गर्इं, तो हम प्रदेश में एक नई राजनीति की शुरुआत करेंगे।’ पीस पार्टी के डॉ. अयूब इस गठबंधन से सबसे ज्यादा खुश नजर आ रहे हैं। जात- पात और धर्म की राजनीति के विरोधी रहे अयूब कहते हैं, ‘हम इस गठबंधन के लिए पिछले 6 माह से प्रयासरत थे। नदवी जी के प्रयासों से यह मंच हमें मिल गया है। हम सब आपस में मिलकर एक नया विकल्प खड़ा करने की तैयारी में हैं। पहले हमारे बीच एक समझौता था, अब हम एक-दूसरे के हो गए हैं और इसका लाभ आपको देखने को भी मिलेगा।’

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल की रिपोर्ट.

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