शंभूनाथ शुक्ल : पत्रकार होने का मतलब किसी से कुछ भी पूछ लेना नहीं होता है। जगदगुरु शंकराचार्य ने मोदी के बारे में पूछे जाने पर पत्रकार को थप्पड़ जड़ दिया। लोगबाग खामखाँ में इसे तिल का ताड़ बनाए हैं। आखिर कांशीराम ने भी एक पत्रकार को थप्पड़ मारा था और सपा नेता मुलायम ने आज तक न्यूज चैनल के एक संवाददाता द्वारा कुछ ऊटपटांग पूछे जाने पर उसकी ठोड़ी पर हाथ रखकर कहा था कि बच्चा पहले जाव अरुण पुरी से पूछ लेना।
इसी तरह मुझे याद है कि १९८९ में अरुण नेहरू कानपुर के करीब बिल्हौर से चुनाव लड़ रहे थे। एक स्थानीय दैनिक के चीफ रिपोर्टर ने उनसे कहा कि मेरे पास वहां दस हजार वोट हैं अगर आप इतने रुपयों का इंतजाम कर सकें तो मैं मैनेज कर दूं। अरुण नेहरू बोले- बेटा जितनी तुम्हारी उम्र है उतने साल तो मैने मार्केंटिंग के जाब में निकाल दिए। जाओ अपना काम करो। अब यही हाल यहां है। जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद आपके गैर आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के शमन के लिए बाध्य नहीं हैं।
Samar Anarya : बहुत कम मामलों में धर्मगुरुओं से सहमत हो पाता हूँ. पर फिर आप ही बताइए कि बाढ़ में डूब रहे लोगों से 'आप को कैसा लग रहा है' टाइप सवाल पूछ सकने वाले इलेक्ट्रोनिक चैनल पत्रकारों से और कैसा व्यवहार न्यायोचित है? [तुलनात्मक रूप से फिर भी काफी संतुलित प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रोनिक चैनलों के भी अपने तमाम शानदार प्रतिबद्ध और मेहनती दोस्तों से माफ़ी के साथ]
Mohammad Anas : जब पत्रकार सब लोग काजू और बादाम खाते हैं तब शिकायत नहीं करते और जब झापड़ खा लेते हैं तो नोट बुक भर देते हैं. संत-महात्मा के मठों में जाते जाते कई मोहल्ला छाप पत्रकार 'ब्यूरो प्रमुख' बन जाते हैं. आज झापड़ पड़ गया तो बवाल काट रहे हैं. संत महात्मा किस्म के लोग धार्मिक चाहरदीवारी के भीतर ही अच्छे लगते हैं. उनसे राजनीति और व्यवस्था पर बतिया कर भाव मीडिया वालों ने ही दिया है. पारिवारिक मामला है. सब निपट जाएगा.
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला, अविनाश पांडेय समर और मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.
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