: मीडिया के अजब-गजब : पत्रकारिता का हाल बेहद बुरा है। ऐसा लगता है कि वह भंग की तरंग में है। देहरादून में एक अजीब वाकया हुआ है जिसने प्रिंट मीडिया की पोल खोल दी है। प्रेस नोट पत्रकारिता के चलते अखबार इतने विकलांग हो गए हैं कि उन्हे आन दी स्पाट खबर को कवर करने की फुरसत ही नहीं है। अखबारों के प्रबंधन ने रिपोर्टरों को मुंशी बना दिया है। इसका प्रमाण आज छपी एक खबर है। 'जौनसार भाबर भूतपूर्व कर्मचारी मंडल' ने बीते दिन एक प्रेस नोट बांटा जिसमें छठे जौनसार भाबर महोत्सव और माघ मेले के आयोजन किए जाने की खबर थी।
प्रेस नोट में कार्यक्रम ओएनजीसी के अंबेडकर स्टेडियम में होना बताया गया था। प्रेस नोट के साथ फोटोग्राफ भी संलग्न था। प्रेस नोट पत्रकारिता की आदतें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि आई नेक्स्ट को छोड़कर बाकी सारे अखबारों ने न केवल तीन-चार कालम की खबर छापी बल्कि फोटो भी छाप डाला। केवल आई नेक्स्ट को इस पर संदेह हुआ और उसने फोटोग्राफ को जूम किया और आयोजकों की पोल खुल गई। दरअसल फोटो डे लाइट की थी और आयोजक इसे आडिटोरियम में बता रहे थे। इसके अलावा फोटो में पिछले साल दिसंबर की तारीख भी दर्ज थी।
अमर उजाला ने हैडिंग लगाई, ‘‘छुमका और झैता पर थिरके कलाकार’’। अमर उजाला ने लिखा, ‘‘छुमका नृत्य के माध्यम से पुरुषों ने माघ मेले का संदेश दिया तो झैंता नृत्य से महिलाओं ने पारंपरिक त्योहारों की झलक पेश की।'' अखबार ने एक कदम और आगे जाकर यह भी कह डाला कि कार्यक्रम में सौ से ज्यादा कलाकार भाग ले रहे हैं। किसी अखबार को पता नहीं कि वह अपने पाठकों तक एक झूठी खबर पहुंचा रहे हैं। हालांकि अखबार भी आदमी ही चलाते हैं, उनमें चूक होती रहती है और यह अस्वाभाविक भी नहीं है। पर पाठक अखबार में छपी खबर को सच मानते हैं, यही समस्या है। इसलिए मीडिया में काम करने वाले लोगों पर बड़ी जिम्मेदारी होती है। एक कर्मचारी संघ वाले तीन बड़े अखबारों को बेवकूफ बना दें, यह शर्मिंदा करने वाली घटना है।
वरिष्ठ पत्रकार एस. राजन टोडरिया की रिपोर्ट.





