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एसडीएम बंदर और माफ़िया मदारी, असहाय ज़िलाधिकारी

गोरखपुर ज़िले में एक तहसील है बांसगांव। यहां एक एसडीएम हैं अमरनाथ राय। एक तो प्रमोटी हैं, दूसरे इनकी खासियत है कि यह ज़िलाधिकारी के आदेश या कानून से प्रशासन नहीं चलाते हैं। बल्कि कह सकते हैं कि एक अंबिका सिंह नामधारी माफ़िया इनका मदारी है और यह उसके बंदर। तो माफ़िया जैसे नचाता है यह एसडीएम रूपी बंदर वैसे ही नाचता है। अब प्रशासन कैसे चलता होगा, इसका अंदाज़ा आप सहज ही लगा सकते हैं। एसडीएम माफ़िया की छाया में इतना अकड़ा रहता है कि मरकहवा सांड़ भी बन कर सब को टालता और गुरेरता रहता है। सनक भरी बातें भी करता है।

गोरखपुर ज़िले में एक तहसील है बांसगांव। यहां एक एसडीएम हैं अमरनाथ राय। एक तो प्रमोटी हैं, दूसरे इनकी खासियत है कि यह ज़िलाधिकारी के आदेश या कानून से प्रशासन नहीं चलाते हैं। बल्कि कह सकते हैं कि एक अंबिका सिंह नामधारी माफ़िया इनका मदारी है और यह उसके बंदर। तो माफ़िया जैसे नचाता है यह एसडीएम रूपी बंदर वैसे ही नाचता है। अब प्रशासन कैसे चलता होगा, इसका अंदाज़ा आप सहज ही लगा सकते हैं। एसडीएम माफ़िया की छाया में इतना अकड़ा रहता है कि मरकहवा सांड़ भी बन कर सब को टालता और गुरेरता रहता है। सनक भरी बातें भी करता है।

यह माफ़िया भी कोई ऐसा वैसा नहीं है। दर्जनों हत्या, अपहरण और डकैती के मामलों से लैस है। एक साथ चार चार मर्डर करने का अभ्यस्त। तिस पर तुर्रा यह कि बसपाई भी है और पूर्व विधायक भी। इन्हीं सब कौशल के चलते अबकी बहन जी ने टिकट काट दिया है। लेकिन एसडीएम के साथ इनकी जुगलबंदी जारी है। इन दिनों चुनाव का मौसम है। लोग चुनाव में व्यस्त हैं पर यह मदारी और उसका बंदर लोगों की ज़मीनों पर जबरिया कब्ज़ा जैसे धंधों और ज़मीनों के झगड़े में बंदरबांट करने में व्यस्त है।

कोई फ़रियाद ले कर जाता है तो चुनाव ड्यूटी के नाम पर फ़ंसे होने का बहाना बना टाल जाते हैं। और फिर एक बंदरिया भी है इनकी टोली में। तहसीलदार, नाम है इसका जगदंबा प्रसाद। जा कर उगाही कर आती है। सीओ के मार्फ़त संबधित थानों की पुलिस भी इस बंदरबाट में मिल लेती है। आप पूछेंगे कि फिर ज़िलाधिकारी और डीआइजी क्या कर रहे हैं? चुनाव ड्यूटी में लगे हैं भैय्या। और फिर माफ़िया की बात ठहरी। बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन?

फेसबुक पर Rachit Pankaj नामक शख्स की वॉल से साभार.
 

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