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मीडिया को बाजार के इसी एजेंडे को आगे बढ़ाना है…

Samarendra Singh : मीडिया क्या है? व्यवस्था का हिस्सा. जिसे संविधान की मूल भावना का ख्याल रखते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है. मीडिया को नियंत्रित कौन करता है? बाजार. मतलब संविधान की मूल भावना के साथ बाजार के हितों का भी ख्याल रखना है. बाजार का हित किसमें है? यही कि मौजूदा व्यवस्था बनी रहे और बाजार को लेकर उदार होती रहे. मीडिया को बाजार के इसी एजेंडे को आगे बढ़ाना है. अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसे मिलने वाली पूंजी घटेगी और उसका सीधा असर संस्थान की सेहत पर पड़ेगा और पत्रकार सीधे तौर पर प्रभावित होगा.

Samarendra Singh : मीडिया क्या है? व्यवस्था का हिस्सा. जिसे संविधान की मूल भावना का ख्याल रखते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है. मीडिया को नियंत्रित कौन करता है? बाजार. मतलब संविधान की मूल भावना के साथ बाजार के हितों का भी ख्याल रखना है. बाजार का हित किसमें है? यही कि मौजूदा व्यवस्था बनी रहे और बाजार को लेकर उदार होती रहे. मीडिया को बाजार के इसी एजेंडे को आगे बढ़ाना है. अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसे मिलने वाली पूंजी घटेगी और उसका सीधा असर संस्थान की सेहत पर पड़ेगा और पत्रकार सीधे तौर पर प्रभावित होगा.

मतलब आजादी सीमित है. आजादी है भी और नहीं भी. यही स्थिति व्यवस्था के हर हिस्से में है. हर जगह आजादी है लेकिन सीमित. व्यवस्था ऐसे ही चलती है. कोई भी पूरी तरह आजाद नहीं है. खुद केजरीवाल भी आजाद नहीं हैं. उन्हें चुनाव लड़ना है. चाहते हैं कि 400 सीट पर चुनाव लड़ें. विधानसभा चुनाव में उन्होंने प्रति सीट 28 लाख रुपये खर्च किए थे. इस लिहाज से अब उन्हें लोकसभा चुनाव में प्रत्येक सीट औसतन 2-2.5 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. 400 सीट के हिसाब से उन्हें 800-1000 करोड़ रुपये चाहिए. पैसे जुट नहीं रहे हैं. तो चुनाव खुल कर नहीं लड़ सकेंगे. मजबूर हैं. यह समझना होगा.

अब सवाल उठता है कि क्या कोई सेठ मुंजाल उन्हें 1000 करोड़ रुपये चुनाव लड़ने के लिए देगा? अगर देगा तो क्या उसका कोई हिडेन एजेंडा होगा? और अगर हिडेन एजेंडा नहीं हुआ तो भी अगर उनकी सरकार कोई नीतिगत फैसला लेती है और उससे उस मुंजाल को फायदा पहुंचता है तो क्या यह दूसरों को हक मिलना चाहिए कि वह केजरीवाल को बेईमान कहें?

जब तक वह यह नहीं समझेंगे कि व्यवस्था में एक जाल बुना होता है. यहां कोई पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. आप जाल के सभी धागों को एक साथ काट देंगे तो अराजकता होगी. सब खत्म हो जाएगा. हिंसा होगी. सड़कों पर लहू बिखरेगा. इसलिए व्यवस्था के जाल से वही धागा काटिए जिसकी जरूरत नहीं है. या जो धागा कमजोर हो गया है. गल गया है. इससे स्पेस बढ़ेगा और स्थितियां सुधरेंगी. सबकुछ धीमे-धीमे होगा. व्यवस्था को पारदर्शी बनाइये. चीजें बेहतर होंगी. यह नहीं कहना पड़ेगा कि सब बिका हुआ है. तब लगेगा कि व्यवस्था बनाने से बनती है. सुधार करने से होता है. देश जोड़ कर चलता है. बहुत नकारात्मक होने से कुछ नहीं बनता.


Samarendra Singh : बिहार के दौरे पर हूं. अगले दस-पंद्रह दिन इधर ही रहना है. गणतंत्र दिवस की सुबह एक ऐसे गांव से गुजरा हूं जहां गरीबी है. लेकिन यहां भी गणतंत्र दिवस का उत्साह देखने को मिला. आदिवासियों के इस गांव में मैंने बच्चों के हाथ में तिरंगा लहराते देखा. उनके चेहरे पर खुशी नजर आई. यह खुशी भारतीय होने की खुशी है और तिरंगा लहरा कर वह बच्चे अपनी इसी खुशी का इजहार कर रहे हैं. बता रहे हैं कि देश पर गर्व करने के लिए अमीर होना जरूरी नहीं. उनकी जेब में भले ही ज्यादा पैसे नहीं हों मगर भारत पर उनका भी उतना ही हक है जितना दिल्ली में बैठे लोगों का.

देखा जाए तो आजाद हिंदुस्तान में दो-तीन ही राष्ट्रीय पर्व हैं. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस. तीसरा राष्ट्रीय पर्व दो अक्टूबर है. महात्मा गांधी का जन्मदिन. इन राष्ट्रीय त्योहारों पर जमकर जश्न मनाना चाहिए. इससे देश की एकता मजबूत होती है. देश मजबूत होता है. इन तीन राष्ट्रीय पर्वों के अलावा बाकी जो कुछ भी है वह किसी धर्म, किसी जाति और किसी क्षेत्र का पर्व है. हम उन सब मौकों पर एक दूसरे को बधाई देते हैं. लेकिन बावजूद इसके वह है तो एक धर्म, जाति और क्षेत्र विशेष का. इसलिए गणतंत्र दिवस के दिन जो कोई भी मातम मना रहा है, दरअसल उसकी भावनाओं में देश की कभी कोई अहमियत ही नहीं रही. वह लोग बहुत नकारात्मक किस्म के लोग हैं. ऐसे लोग जो सिर्फ दूसरों की आलोचना करना जानते हैं. ऐसे लोगों की वजह से समाज में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आता.

आज भी फेसबुक पर ऐसे बहुत से लोग सक्रिय होंगे. यह दिल्ली के किसी चैनल, किसी अखबार या अन्य कॉरपोरेट हाउस में काम करते हुए सत्ता तंत्र के हितों को पोषित करते हैं. और गणतंत्र दिवस को कोसते हैं. आज के दिन भी यह धर्म, जाति और क्षेत्र का कार्ड खेल रहे होंगे. गरीबों की आड़ में देश की निंदा कर रहे होंगे. इनकी नजर में गणतंत्र दिवस पर होने वाली परेड सैन्य शक्ति की नुमाइश है. अय्याशी का साधन है. इनमें से ज्यादातर लोगों को इल्म ही नहीं कि इस परेड की तैयारी कितने दिन चलती है और यह किस तरह पूरे देश को जोड़ता है. इनका काम निंदा करना है और यह निंदा करेंगे.

यह हर अच्छे काम में नकारात्मक पहलू खोज लेंगे. हर त्योहार से मातम जोड़ लेंगे. इनकी नजर में क्रिकेट गुलामी का प्रतीक है. बॉलीवुड अय्याशी का अड्डा है. स्पेस साइंस अनैतिक महत्वाकांक्षा है. इसलिए आप इन्हें नजरअंदाज कीजिए. और खुले दिल से गणतंत्र दिवस मनाइये और भारतीय होने पर गर्व कीजिए.

एनडीटीवी में कार्यरत रहे पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से.

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