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माया कल्याण में गुप्त समझौता!

अपने राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे कल्याण सिंह को अब मायावती का सहारा है. इधर मायावती भी अपनी राजनैतिक  जंग लड़ रही है. ऐसे में  राजनैतिक सूत्रों का मानना है की माया और कल्याण में गुप्त समझौता हो चुका है जिसकी वजह से माया ने कल्याण सिंह के बेटे राजवीर और बहु सहित लोध बहुल कम से कम ६ सीटों पर ऐसे प्रत्याशी खड़े किये हैं जिससे कल्याण सिंह की पार्टी के उम्मीदवारों को सीधा लाभ पहुंच रहा है. बदले में मायावती को कल्याण सिंह के प्रभाव वाले लोध बहुल सीटों पर लाभ पहुंचेगा.

अपने राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे कल्याण सिंह को अब मायावती का सहारा है. इधर मायावती भी अपनी राजनैतिक  जंग लड़ रही है. ऐसे में  राजनैतिक सूत्रों का मानना है की माया और कल्याण में गुप्त समझौता हो चुका है जिसकी वजह से माया ने कल्याण सिंह के बेटे राजवीर और बहु सहित लोध बहुल कम से कम ६ सीटों पर ऐसे प्रत्याशी खड़े किये हैं जिससे कल्याण सिंह की पार्टी के उम्मीदवारों को सीधा लाभ पहुंच रहा है. बदले में मायावती को कल्याण सिंह के प्रभाव वाले लोध बहुल सीटों पर लाभ पहुंचेगा.

दरअसल अपने पुत्र राजवीर सिंह को सत्ता में स्थापित करना कल्याण सिंह की बहुत पुरानी इच्छा है. इसीलिए वे समाजवादी पार्टी में गए भी थे. सपा सरकार में राजवीर मंत्री भी रहे पर लोकसभा चुनावों में सपा की हार ने इस रिश्ते को तोड़ दिया था. भाजपा से कल्याण का बैर बहुत पुराना है इसलिए राजवीर की राजनैतिक नाव को किनारे लगाने के लिए उन्होंने मायावती का दमन पकड़ा है. इस समझौते को करने में सूबे के चर्चित और रसूखदार नौकरशाह ने प्रमुख भूमिका निभाई है. इसका इशारा कल्याण सिंह ने अपनी बुंदेलखंड यात्रा में कर दिया था जब उन्होंने कहा था कि बसपा भाजपा से बेहतर पार्टी है.

उत्तर प्रदेश में लगभग ८० सीटें लोध बहुल हैं और कल्याण सिंह का इस जाति के वोटों पर पहले प्रभाव भी था. मुलायम सिंह  और कल्याण का साथ होने में भी इसी वोट बैंक की भूमिका थी. कल्याण की काट के लिए मायावती ने लोधों के दूसरे कद्दवर नेता गंगा चरण राजपूत को साथ लिया और उन्हें राज्यसभा भी भेजा. गंगा चरण राजपूत ने बसपा का आधार भी बढ़ाया पर कल्याण सिंह के ताज़ा समीकरणों ने इस बार उनकी भूमिका कम कर दी है.

दरअसल  कल्याण सिंह राजवीर की राह में सबसे बड़ा कांटा गंगाचरण राजपूत को मानते हैं. इसीलिए जब वे सपा में गए थे तो उन्होंने राजपूत को वहाँ से निकलवा भी दिया था. हालांकि कल्याण सिंह के सपा में जाने से लोध वोटों का लाभ नहीं मिल पाया था पर अपने नजदीकी नौकरशाहों के जरिये उन्होंने यह स्थापित करा दिया. दूसरी तरफ मायावती ने गंगा चरण राजपूत को बुंदेलखंड में प्रचार करने से मन कर दिया.  

बसपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है की पार्टी  इस समय पिछड़े वोटों के लिए चिंतित है. बसपा के अधिकांश पिछड़े नेताओं ने उसका साथ छोड़ दिया है. ऐसे में यदि कल्याण सिंह बसपा के पक्ष में जाते हैं तो इसका फायदा हो सकता है.                               

लेखक उत्कर्ष कुमार सिन्हा लोकमत, लखनऊ के स्थानीय सम्पादक हैं.

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