अभी कुछ दिनों पहले ही समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह और युवराज अखिलेश यादव ने कहा था की अपराधियों और गुंडों की अब समाजवादी पार्टी में कोई जगह नहीं है परन्तु राजनेताओं की कथनी और करनी में फर्क करने के लिए महोबा की चरखारी सीट ही पर्याप्त है. स्वछ छवि के उमीदवारों के लिए सिविल सोसाईटी चाहे जितना भी आन्दोलन चला दे और पार्टियों के नेता चाहे जितनी बयानबाजी कर लें लेकिन चुनावी बिसात पर अपराधियों से परहेज करना बहुत मुश्किल है.
जहाँ एक तरफ नेशनल इलेक्शन वाच जैसे संगठन लगातार अपराधियों के चुनाव लड़ने के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं वहीँ ज्यादातर पार्टियां अपराधियों को टिकट देने से पीछे नहीं हट रही हैं. जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं उन्हें तो यह कहकर टिकट दिया जा रहा है कि इस मामले में अभी सजा नहीं हुयी है परन्तु बुंदेलखंड के चरखारी सीट से समाजवादी पार्टी का झंडा उठाये कप्तान सिंह राजपूत दो दो मामलों में सजायाफ्ता हैं.
आपराधिक इतिहास वाले कप्तान सिंह राजपूत को मुकदमा संख्या ७७/९६ और ६३९/९८ में सजा हो चुकी है. कप्तान सिंह पर वैसे तो १५ मामले दर्ज हैं पर उनके मुकदमों में राजीनामा भी हो जाता है. अवैध हथियार रखने के दो मामलों में से एक में उन्हें न्यायालय द्वारा दोषी भी ठहराया जा चुका है. इनके भाई बृजनंदन सिंह पुलिस के रिकार्ड में माफिया के तौर पर दर्ज हैं और उन पर भी गैंगेस्टर और एनएसए सरीखे मुकदमे हैं.
बृजनंदन सिंह को अदालत में रामजी नामक एक शख्स को गोली मारने के मामले में १० वर्ष की सजा भी हुयी जिसमें भी कप्तान सिंह मुलजिम हैं. राम जी के भाई श्याम जी की उरई में पुलिस अभिरक्षा में हत्या कर दी गयी थी. मृत्य पूर्व अपने बयान में श्याम जी ने कप्तान सिंह द्वारा गोली चलाने की बात कही थी.
भारतीय जनता पार्टी ने भी बादशाह सिंह को टिकट दिया तो बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी राज नारायण बुधौलिया का भी अपराधिक इतिहास बहुत मजबूत है. उत्तर प्रदेश इलेक्शन वाच के सक्रिय सदस्य राघवेन्द्र प्रताप शाही इस प्रकरण को दुखद मानते हैं. शाही का कहना है कि हमारी मांग यह है, यदि किसी भी अपराधी को सजा सुनाई जा चुकी हो तो उसे चुनाव नहीं लड़ने देना चाहिए परन्तु उपरी अदालतों में अपील के बहाने इस तरह के अपराधी टिकट पाने में कामयाब हो जाते हैं. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी से जब इस
बारे में बात की गयी तो उन्होंने इस बाबत पता करने के बाद ही कुछ बताने को कहा.
लेखक उत्कर्ष कुमार सिन्हा लोकमत, लखनऊ के स्थानीय संपादक हैं.





