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‘पंचायतनामा’ के साथ दो खुशगवार साल

'प्रभात खबर' समूह के 'पंचायतनामा' को छपते हुए आज दो साल पूरे हो गये. आज के ही दिन 14 फरवरी, 2012 को पंचायतनामा का पहला अंक प्रकाशित हुआ था और इसका विमोचन हुआ था. पंचायतनामा की छोटी सी टीम के लिए यह एक अनूठा अनुभव है. खास तौर पर जब हम दो साल पुरानी अपनी दुनिया की तरफ झांकते हैं, जब यह पत्र शुरू हो रहा था. कई साथी और पत्रकारिता को गहरायी से जानने समझने वाले लोग तब हमें सलाह दे रहे थे कि मेन स्ट्रीम अखबार को छोड़ कर गांव की पत्रिका के लिए काम करना अपने कैरियर को भट्ठी में झोंक देने जैसा है. मगर पता नहीं हमें क्यों ऐसा लग रहा था कि यह हमें नुकसान के बदले लाभ ही देगा. संजय भैया (हमारे संपादक संजय मिश्र) के लिए तो जैसे यह जीवन मरण का प्रश्न था. उन्हें डेढ़ सौ फीसदी भरोसा था कि यह प्रयोग सफल होकर रहेगा.

'प्रभात खबर' समूह के 'पंचायतनामा' को छपते हुए आज दो साल पूरे हो गये. आज के ही दिन 14 फरवरी, 2012 को पंचायतनामा का पहला अंक प्रकाशित हुआ था और इसका विमोचन हुआ था. पंचायतनामा की छोटी सी टीम के लिए यह एक अनूठा अनुभव है. खास तौर पर जब हम दो साल पुरानी अपनी दुनिया की तरफ झांकते हैं, जब यह पत्र शुरू हो रहा था. कई साथी और पत्रकारिता को गहरायी से जानने समझने वाले लोग तब हमें सलाह दे रहे थे कि मेन स्ट्रीम अखबार को छोड़ कर गांव की पत्रिका के लिए काम करना अपने कैरियर को भट्ठी में झोंक देने जैसा है. मगर पता नहीं हमें क्यों ऐसा लग रहा था कि यह हमें नुकसान के बदले लाभ ही देगा. संजय भैया (हमारे संपादक संजय मिश्र) के लिए तो जैसे यह जीवन मरण का प्रश्न था. उन्हें डेढ़ सौ फीसदी भरोसा था कि यह प्रयोग सफल होकर रहेगा.

यह कहना गलत होगा कि हमारे मन में कोई भय नहीं था. हमें कभी-कभी लगता था कि छह महीने या साल भर के प्रयोग के बाद इस पर ताला लग जायेगा. जिस वक्त तमाम प्रकाशन समूह यूथ सेंट्रिक और अर्बन सेंट्रिक अखबार प्लान कर रहे थे. हमारे प्रकाशन समूह ने गांवों के लिए एक अखबार निकालने का फैसला किया था, वह भी 12 रुपये कीमत के साथ. इसे कौन खरीदेगा और कितना पसंद किया जायेगा यह हम नहीं जानते थे. हमें तो यह भी नहीं पता था कि इसमें कंटेंट क्या होगा? यह 12 रुपये में भी खरीदा गया और जब हम इसे पांच रुपये में बेचने लगे तब भी खरीदा गया. इसे आम ग्रामीण ने और पंचायत प्रतिनिधियों ने तो पसंद किया ही, सचिवालयों में बैठे अधिकारी भी इसके प्रशंसक बन गये.

और इसकी वजह रही कि हमने इसके लिए दो विषय चुने. पहला सरकारी योजनाओं की सरल भाषा में जानकारी, इनके लाभ लेने के तरीके और दूसरा इन योजनाओं के साथ या दूसरे तरीके से अपने या अपने इलाके में बड़ा बदलाव लाने वाले लोगों की कहानियां. सफलता की कहानियों और योजनाओं की जानकारी के इस मिक्ंिसग को लोगों ने न सिर्फ पसंद किया, बल्कि इस्तेमाल किया. हमसे फोन करके सलाह ली और खुद लाभान्वित हुए और अपने गांव को बदला. यही वजह है कि जब हमने काम शुरू किया था तो देश में पांच-सात सफल गांवों की कहानियां थीं. आज झारखंड में ही ऐसी दर्जनों कहानियां हैं. हमने बख्तावरपुरा की साफ-सफाई की कहानी छापी तो एक साल बाद पाया कि झारखंड में कई गांव खुले में शौच से मुक्त हो गये हैं. हमने गिरिडीह के एक गांव की कथा छापी कि कैसे वहां कोई मामला कोर्ट-कचहरी नहीं जाता तो आज ऐसे कई गांवों की कहानियां सामने आ रही हैं. हमने ललगढ़ी पंचायत की कहानी छापी कि कैसे लोगों ने खुद नाला खोदकर गांव को सिंचित करने का प्रबंध किया तो आज ऐसी कई कहानियां सामने आ रही हैं जब लोग खुद आगे आकर हालात बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि यह सब पंचायतनामा की वजह से ही हुआ. मगर हमने माहौल बदलने में थोड़ी सी भूमिका जरूर निभायी. दो साल पहले झारखंड में पंचायत प्रतिनिधि अधिकार की मांग करने के अलावा कोई काम नहीं करते थे. आज यह सुखद बदलाव दिखता है कि बिना फंड के तेजी किस्पोट्टा जैसी मुखिया अपने पंचायत में बड़े बदलाव ला रही हैं. उन्होंने अपने क्षेत्र के स्कूलों में पढ़ी लिखी रसोइया भरती करने की प्रथा शुरू की ताकि वे मौका आने पर बच्चों को पढ़ा भी सके. कलावती देवी ने इंदिरा आवास में भ्रष्टाचार पर अपने तरीके से प्रतिबंध लगाया. अर्चना महतो ने पंचायतनामा में पेयजल एवं स्वच्छता विभाग से संबंधित जानकारियां देखकर विभाग से संपर्क किया और कई योजनाएं अपने क्षेत्र में लागू कराया. उन्होंने विभाग के अवर मुख्य सचिव से नेट पर संपर्क करने के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल करना सीखा, वो भी टय़ूटर रखकर. पानो सरदार जो मुखिया चुने जाने से पहले स्वास्थ्य कार्यकर्ता थीं. आज दोनों काम बखूबी निभा रही हैं.

इसके पीछे कहीं न कहीं इस बात का असर जरूर है कि अगर हम अच्छा काम करेंगे तो हमारी तारीफ होगी. और हमने इन दो सालों में अच्छा काम करने वालों की जमकर तारीफ की और खूब तालियां बजायी ताकि इन तालियों से खुश होकर लोग और सकारात्मक काम करें. इस प्रयास में झारखंड महिला पंचायत रिसोर्स सेंटर, पेयजल और स्वच्छता विभाग, झारखंड ग्रामीण आजीविका मिशन, यूनीसेफ और दूसरी कई संस्थाओं के साथ मिलकर हमने कई प्रयोग किये. मगर अखबारी दुनिया का एक अर्थशास्त्र होता है, लागत और लाभ का आकलन किया जाता है और यह भी देखा जाता है कि आपकी बढ़त कितनी है. हमने कभी उस दिशा में ठीक से सोचा नहीं.

हमारे पाठक सुदूर ग्रामीण इलाकों में थे, जहां हॉकर नहीं जाते थे. हर अंक के प्रकाशन के बाद हमारे दफ्तर में लोग फोन करते हैं कि हमें अंक नहीं मिल रहा है, कहां से खरीदें. फेसबुक पर भी ऐसी मांग की जाती है. कई लोग एक साथ सारा अंक खरीदना चाहते हैं. देश के कई इलाकों में लोग पंचायतनामा पढ़ना चाहते हैं. मगर हमारी छोटी सी टीम अब तक कोई ऐसा मैकेनिज्म विकसित नहीं कर पायी जिससे हम उन पाठकों तक पंचायतनामा को पहुंचा सकें. हर बार अंक छपने के बाद कई संस्थाएं फोन करती हैं कि हमें इसे बांटने के लिए सौ-पांच सौ या हजार प्रतियां चाहिये, मगर हमें कहना पड़ता है कि अब हमारे पास प्रतियां नहीं बचीं. कई संस्थाओं ने पहले से तय कर लिया है कि वे हमसे पांच सौ या हजार प्रतियां हर बार लेंगे. उन्हें हम उपलब्ध करा देते हैं. उनकी वजह से हमारी पहुंच उन इलाकों तक हो पाती हैं, जहां हमारे असली पाठक हैं. यानी सुदूर देहातों में, जहां तसवीर बदलने की सबसे अधिक जरूरत है. मगर हमारे अखबार उद्योग की विडंबना है कि हमारी पहुंच कस्बों से आगे नहीं है. गांव के लोग आज भी अखबार शहरों और कस्बों से ही खरीदते हैं. ऐसे में गांव का यह अखबार गांव तक कैसे पहुंचे यह आज भी एक बड़े सवाल की तरह हमारे सामने खड़ा है. फिर भी हम डटे हैं, उम्मीद कायम है.

जहां तक व्यक्तिगत लाभ का सवाल है, उसमें भी हम जबरदस्त फायदे में रहे. मैं और राहुल जी (हमारे दूसरे साथी जो शुरुआत से पंचायतनामा से जुड़े हैं) कई बार सोचते हैं कि पंचायतनामा नहीं होता तो हमारी पत्रकार के तौर पर इतनी ग्रूमिंग नहीं होती. आज हम ग्रामीण विकास के छोटे-मोटे एक्सपर्ट हो गये हैं. गांव के लोग तो हमसे राय लेते ही हैं, कई संस्थाएं अपने कार्यक्रमों में हमें विशेषज्ञ के तौर पर बुलाने लगी हैं. हमने दो साल में न सिर्फ गांवों के चक्कर लगाये बल्कि सचिवालयों की भी भरपूर खाक छानी और इंटरनेट के सहारे देश और दुनिया के अलग-अलग इलाकों में ग्रामीण विकास के मसले पर क्या हो रहा है यह जानने की कोशिश की ताकि हम अपने पाठकों को बेहतर जानकारी दे सकें. हमें अक्सर लगता है कि अगर खुदा न खास्ता हमें यह काम छोड़ना पड़ा तो हम एक ही काम करेंगे. अपने गांव जाकर वहां स्वरोजगार करेंगे और पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने में सहयोग करेंगे. यह आत्मविश्वास हमें यहां काम करते हुए आया. हम आज सरकारी योजनाओं की एनसाइक्लोपीडिया में बदलने लगे हैं. हमें पता है कि किसी ग्रामीण समस्या के लिए सरकारी इलाज क्या है. यहां काम करते हुए मुङो सीएसडीएस के मीडिया फेलोशिप के लिए चुना गया और झारखंड सरकार ने जब पिछले साल मीडिया फेलोशिप का वितरण किया तो इस छोटी सी पत्रिका जिसके संपादकीय विभाग में संपादक को छोड़ कर तीन लोग ही काम करते हैं के नाम से पांच लोगों को फैलोशिप दिया गया.

आज हम इन दो सालों के बारे में सोचते हैं तो खुशी से भर उठते हैं. कम से कम मैं अपने बारे में तो कह ही सकता हूं कि मैंने अपने पत्रकारिता के कैरियर में इससे बेहतर काम नहीं किया है. इस मौके पर 17 फरवरी को हम प्रभात खबर सभागार में एक छोटा सा कार्यक्रम कर रहे हैं, जिसमें इन दो सालों के काम काज पर कुछ सरकारी अधिकारियों, कुछ संस्थाओं के प्रमुख और पंचायत प्रतिनिधियों के साथ बैठकर बातचीत करेंगे. आगे क्या हो सकता है यह विचार भी करेंगे. अगर आप 17 फरवरी को रांची में हैं और 3 से 6 बजे के बीच फुरसत में हैं तो आपका स्वागत है.

पत्रकार पुष्यमित्र के ब्लाग 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' से साभार.

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