Om Thanvi : अरविन्द केजरीवाल ने CII में कहा कि उन्हें पूंजीवाद से गुरेज नहीं है, सरकार से सांठ-गांठ वाले पूंजीवाद से जरूर है। पूंजीवाद से भी क्यों नहीं भाई? हम तो 'आप' को समाजवादी समझते थे! … स्वस्थ अर्थतंत्र में व्यापार-कारोबार वाजिबी हैं, लेकिन पूंजीवाद कतई ऐसा मूल्य नहीं जिसकी वकालत की जाय।
Om Thanvi : पूंजीवाद उद्योगों का पर्याय नहीं है। एक विचार-पद्धति है, जो मुनाफे के बरक्स मानव को मानव के आलावा कुछ भी समझ सकती है: जिंस, उपभोक्ता, संसाधन। आदि। इसलिए वह प्रत्यक्षतः मानव-विरोधी है, गैर-समाजवादी है। इस खयाल से पूंजीवाद के समर्थन पर परसों मैंने केजरीवाल की आलोचना की। जानते हैं तब क्या सुनने को मिला: ''लाल झंडी दिखा दी क्या 'आप' पार्टी ने? राज्यसभा नहीं मिली? या यह भी कि चलो अब सही रास्ते पर आए।'' … मगर कल जब राष्ट्रपति शासन की सिफारिश पर दिल्ली के उपराज्यपाल की आलोचना की तब भी कुछ ने लिखा: ''कब जॉइन कर रहे हैं 'आप' पार्टी? आशुतोष के रास्ते पर हैं क्या? पत्रकारिता छोड़ क्यों नहीं देते'' … यानी चित भी उनकी, पट भी उनकी। कुछ लोग कितने जल्द निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। और कुछ जैसे जेब में हरदम फ़तवे ठूंसे बैठे हों। ऐसे लोगों को धीरज और विवेक दरकार हैं। पर मिलेंगे कहाँ? फेसबुक पर तो नहीं मिल सकते!
जनसत्ता के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.





