आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रहे आशुतोष ने अपना पाप धो लिया है. अंबानी को ऐसा तगड़ा सबक सिखाया कि वो जीवन भर भूले नहीं भूलेगा. सैकड़ों लोगों की आईबीएन7 से छंटनी कराने के बाद नेटवर्क18 के कर्ताधर्ता अंबानी गिरोह के राघव बहल ने अपने बॉस के निर्देश पर आशुतोष को भी अल्टीमेटम दे दिया. टीआरपी में चैनल के लगातार मार-मात खाने के कारण प्रबंधन बड़ा फैसला ले चुका था और आशुतोष का कह दिया था कि अब आप जा सकते हैं.
इसी वक्त आशुतोष ने एक बड़ा फैसला लिया. कहीं इधर उधर दूसरी नौकरी तलाशने की जगह उन्होंने राजनीति में भाग्य आजमाने का फैसला किया. नई नवेली आम आदमी पार्टी तब तक दिल्ली विधानसभा में सफलता की इबारत लिख चुकी थी और भविष्य सौ फीसदी इसी पार्टी का लगने लगा था. पहले अन्ना हजारे आंदोलन फिर केजरीवाल मुहिम को जमकर सपोर्ट करने वाले और बदलाव की आवाज के पक्ष में खड़े होने वाले आशुतोष ने पत्रकारिता से राजनीति में छलांग लगा दी. केजरीवाल से गोपनीय वार्ता के बाद उन्होंने आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर लिया.
केजरीवाल को भी पूरे देश में ऐसे लोकप्रिय लोगों को तलाश थी जो राजनीति के कुख्यात चेहरों के सामने खड़ा होकर उन्हें चुनौती दे सकें और हरा सकें. दिल्ली की चांदनी चौक सीट से कपिल सिब्बल चुनाव लड़ते और जीतते हैं. कांग्रेस में सिब्बल की हैसियत काफी बड़ी है और वे कांग्रेस के चाणक्यों में से एक माने जाते हैं. चांदनी चौक सीट बनिया-व्यापारी बहुल है. आशुतोष भी इसी जाति से आते हैं. टीवी के लोकप्रिय चेहरे हैं. बस, आशुतोष को आम आदमी पार्टी की जरूरत महसूस हुई और आम आदमी पार्टी को आशुतोष जैसे चेहरे की. दोनों ने एक दूसरे को गले लगाया.
लेकिन आशुतोष के गले में अंबानी वाली फांस कहीं अंटकी पड़ी थी. भ्रष्टाचारियों को निशाने पर लेने के अभियान के तहत अंबानी को निशाने पर लिए जाने की तैयारी आशुतोष मन ही मन करने लगे. कई बड़े नामों के जरिए अंबानी की गैस मूल्य वृद्धि के पीछे खेल को लेकर लिखित शिकायत कराई गई. इस पत्र को संज्ञान लेकर और आशुतोष की सलाह मानकर दूरदर्शी केजरीवाल ने बम फोड़ दिया. अंबानी पर निशाना साधकर न सिर्फ महंगाई का असली कारण जनता को बताया बल्कि कांग्रेस व भाजपा की अंबानी से मिलीभगत का पर्दाफाश किया.
अंबानी जैसे बड़े कार्पोरेट चेहरे के खिलाफ हल्ला बोलकर केजरीवाल ने राजनीति में नए ट्रेंड की शुरुआत की. पहले बड़ी पार्टियां कार्पोरेट घरानों के खिलाफ कुछ नहीं बोलती थीं, क्योंकि उन्हें वहां से अरबों-खरबों के चंदे, ब्लैक मनी, रिश्वत आदि मिलते थे. ये बड़ी पार्टियां कार्पोरेट घरानों के पक्ष में खड़ी होकर उन्हें लूटने की छूट देती थीं और अपना हिस्सा शेयर लिया करती थीं. इस तरह जनता को लूटने और मिल-जुलकर इस देश, इस धरती को लूटने राज करने की कहानी चलती रहती थी. पर आशुतोष के अंबानी से निजी खुन्नस ने इतना बड़ा रुप अख्तियार कर लिया कि इस देश की न सिर्फ राजनीति बदलने लगी बल्कि बड़े व प्रमुख सवाल एजेंडे में आने लगे. अब हम आप कह सकते हैं कि आशुतोष ने भले ही सैकड़ों मीडियाकर्मियों की छंटनी पर चुप्पी साधे रखी हो और एक तरह से छंटनी के पक्ष में मौन समर्थन दिया हो, लेकिन अपनी खुद की छंटनी को लेकर उन्होंने इतना बड़ा दांव खेल दिया है कि इसी बहाने उनके सारे पुराने पत्रकारीय पाप धुलते दिखते हैं.
लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनसे संपर्क [email protected] या फिर 09999330099 के जरिए किया जा सकता है. अगर आप उपरोक्त एनालिसिस से सहमत-असहमत हैं तो अपनी बात भड़ास तक [email protected] के जरिए पहुंचा सकते हैं.
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