नोट : आदरणीय संपादक महोदय, कृपया करके मेरा नाम न प्रकाशित करें, आपकी अति कृपा होगी। धन्यवाद। सेवा में, संपादक, भड़ास फॉर मीडिया, नई दिल्ली। श्रीमान जी, नमस्कार। मैं आपको बताना चाहता हूं कि पत्रकारिता के क्षेत्र से पिछले दो दशकों से जुड़ा हुआ हूं, लेकिन आज जो पत्रकारिता एवं पत्रकार का स्तर गिर रहा है, उसको लेकर काफी चिंतित हूं और भड़ास फॉर मीडिया के माध्यम से देश के पत्रकारों को बताना चाहता हूं कि हम पत्रकारों की औकात कहां तक सीमित है।
गत 7 जनवरी को कुरुक्षेत्र के एनआईटी में एक पत्रकार वार्ता का आयोजन किया गया, जिसको एनआईटी के निदेशक ए.के. मोहन को संबोधित करना था। वैसे तो आनंद मोहन को पत्रकारों की जमात से बदबू आती है लेकिन पता नहीं किस दबाव में उन्होंने पत्रकारों से मिलने की ठानी। जिन पत्रकारों के अंदर जमीर थी, वह तो अपनी आत्मा की आवाज पर इस पत्रकार वार्ता में गए ही नहीं क्योंकि निमंत्रण पत्र में आखिर में लिखा था कि पत्रकार बंधु, लंच के लिए अवश्य रुकें।
इस लाइन का मतलब जानने के लिए एनआईटी के एक प्रोफेसर से जब बात की गई तो उसने कहा कि वैसे तो पत्रकार की औकात चाय और ब्रेड पकौड़े की होती है लेकिन एनआईटी ने तो लंच के लिए लिख दिया है तो कौन सी आफत आ गई। उन्होंने कहा कि आप चिंता मत कीजिए, यह आपके लिए नहीं लिखा। आप तो काफी सीनियर पत्रकार हैं। पत्रकार वार्ता में मुट्ठी भर लोग पहुंचे और सुबह उन्होंने अखबार एनआईटी के नाम गिरवी रख दिया और अपनी सारी कलम तोड़ रखी थी क्योंकि एनआईटी के निदेशक को यह संदेश था कि अगर पत्रकारों को लंच के साथ कोई गिफ्ट भी दिया गया तो सभी पत्रकार अपनी कलम तोड़ देंगे।
एक तरफ तो दैनिक भास्कर एवं दैनिक जागरण समाचार पत्र देश का सबसे बड़ा समाचार पत्र होने का दावा करते हैं और इनके मालिकान कहते हैं कि हम पत्रकारिता को स्वच्छ करने आए हैं लेकिन ऐसे-ऐसे बड़े समाचार पत्रों के लोग तो ऐसी वार्ता में अपने अगल-बगल के लोगों को भी ले आते हैं ताकि कोई मोटा गिफ्ट मिले तो हथियाया जा सके। एनआईटी के निदेशक ने जब गिफ्ट में एक चमड़े का बैग दिया तो पत्रकार वार्ता में मौजूद पत्रकारों ने अपने कार्यालयों में फोन घुमाने शुरू कर दिए और अपने अधीन अन्य पत्रकारों को बुलाना शुरू कर दिया। पत्रकार वार्ता में ऐसे-ऐसे पत्रकार भी पहुंचे जिनका पत्रकारिता से कोई दूर या नजदीक का रिश्ता भी नहीं है।
ऐसे में गिरती हुई पत्रकारिता का स्तर हम कैसे रोक पाएंगे, नजर नहीं आता। एक तरफ तो मालिकों का शोषण, दूसरी तरफ आम जनता का प्रकोप, पत्रकार कैसे झेल पाएंगे, यह कहना मुश्किल है। आज पत्रकार की हालत उस कुत्ते की तरह हो गई है जो हड्डी चूस रहा होता है और हड्डी चूसते-चूसते उसका अपना ही खून निकल रहा होता है और उसे उसी में मजा आ रहा होता है। ऐसे में हमारी बिरादरी पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है कि पत्रकारिता हमारे लिए उस कुत्ते की हड्डी की तरह है जिसे हम चूस रहे हैं और अपना ही खून पी रहे हैं।
धन्यवाद सहित
भवदीय
दिनांक : 13 जनवरी, 2012
रेलवे रोड,
कुरुक्षेत्र
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





