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सुख-दुख...

रवीन्द्र शाह की स्मृति : शाह सर के साथ अपनों का पराये जैसा सलूक उनकी मौत के बाद भी जारी है…

रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड में ऋषि वशिष्ठ और भरत संवाद के माध्यम से तुलसी दास ने कहा है, ‘हानि-लाभ, जीवन मरण यश-अपयश विधि हाथ।’ जिस सन्दर्भ में यह चौपाई लिखी गई है वह शाह सर के जीवन पर भी शब्दशः ठीक उतरती है। कम उम्र में ही 'फ्री प्रेस' का संपादक बन जाना उनके लिए यश का नहीं, अपयश का कारक बन गया। लाभ की स्थिति में रह कर भी हमेशा हानि उनके हिस्से में रही। अखबार हो या कोई न्यूज चैनल वो नियमित काम के साथ-साथ, बहुत कुछ फ्रीलांस भी करते थे। उस फ्रीलांस से जो आमदनी होती उसको वो जरूरतमंद मित्रों और परिचितों की मदद करते रहते। जो वापस कर देता तो ठीक, नहीं करता तो ठीक।

रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड में ऋषि वशिष्ठ और भरत संवाद के माध्यम से तुलसी दास ने कहा है, ‘हानि-लाभ, जीवन मरण यश-अपयश विधि हाथ।’ जिस सन्दर्भ में यह चौपाई लिखी गई है वह शाह सर के जीवन पर भी शब्दशः ठीक उतरती है। कम उम्र में ही 'फ्री प्रेस' का संपादक बन जाना उनके लिए यश का नहीं, अपयश का कारक बन गया। लाभ की स्थिति में रह कर भी हमेशा हानि उनके हिस्से में रही। अखबार हो या कोई न्यूज चैनल वो नियमित काम के साथ-साथ, बहुत कुछ फ्रीलांस भी करते थे। उस फ्रीलांस से जो आमदनी होती उसको वो जरूरतमंद मित्रों और परिचितों की मदद करते रहते। जो वापस कर देता तो ठीक, नहीं करता तो ठीक।

हां, वो समय पर टोकना नहीं भूलते थे। कहने का अभिप्राय यह कि शाह सर अपने घर-परिवार से लेकर मित्र परिचितों के बारे में गंभीरता से सोचते उनकी मदद करते या करने की कोशिश करते। यहां तक कि वो उन लोगों की भी मदद करने में जुट जाते थे, जो पहले कभी उन्हें आर्थिक, सामाजिक और चारित्रिक तौर पर भी नुकसान पहुंचा चुके होते थे। ऐसे एक दो नहीं कई लोगों को मैं और वो मुझे अच्छी तरह जानते हैं। जहां तक मेरी जानकारी है शाह सर का उधार दिया गया अधिकांश पैसा वापस नहीं हुआ। जब वो अमन ग्रीन में फ्लैट बुक करा रहे थे तो तो उन्होंने कुछ लोगों से मदद को कहा भी…फिर उन्होंने एक बैंक से कर्जा लिया। शाह सर के साथ केवल मांगने वालों ने बेईमानी नहीं कि जिन लोगों के चैनलों-अखबारों और पत्रिकाओं के लिए उन्होंने रात दिन एक कर दिया उन लोगों ने भी शाह कर के साथ बेइमानी की। एस वन चैनल पर उनका डेढ़ लाख बकाया है। विजय दीक्षित ने आज तक वो पैसा नहीं दिया।

आजाद चैनल के मालिक वालया साहब अरब पति हैं। उन्होंने भी लगभग एक लाख रुपया नहीं दिया। शाह सर ने दर्जनों मेल लिखे। चक्कर काटे लेकिन बकाया पैसा नहीं मिला। एक पत्रिका 'वाह मध्य प्रदेश' के लिए तो उन्होंने कई महीने कमर तोड़ मेहनत की। खुद लिखा कई और लोगों से लिखवाया। 'वाह मध्य प्रदेश' की साज-सज्जा, अवधारणा से लेकर प्रिंटिंग पब्लिशिंग और विज्ञापन जुटा कर दिए। शाह सर के हिस्से में क्या आया, लोगों की गालियां। आउटलुक ज्वाइन करने के बाद शाह सर में नई रंगत भर गयी थी। स्थायित्व का भाव चेहरे पर चमक बन कर लौट रहा था। कई बड़ी स्टोरियों पर काम कर रहे थे। जीवित होते तो भारतीय पत्रकारिता में उनके नाम का डंका बज रहा होता।

एसवन मृत प्रायः था। इसलिए अपने कुछ  प्रोजेक्ट्स में उन्होंने मुझे शामिल कर रखा था। धीरेंद्र पुण्डीर से भी वो अपनी स्टोरीज साझा करते या परामर्श करते थे। टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी को भी उन्होंने कुछ अच्छी स्टोरीज दी…..।

मेरी बातें कुछ लोगों को बुरी लग सकती हैं मगर शाह सर के साथ पराये लोग तो परायों जैसा सलूक करते ही थे, उनके कुछ अपने भी परायों जैसा सलूक करते रहे… शाह सर के साथ अपनों का पराये जैसा सलूक उनकी मौत के बाद भी जारी है…

बहरहाल, शाह सर से मेरा परिचय दिल्ली के ग्रीन पार्क में हुआ था। यहां किसी गेस्ट हाउस में उनका अस्थाई डेरा था। यह परिचय नितांत औपचारिक और सीमित रहा। समय की लहरों ने मुझे उठाकर हिमाचल की वादियों में फैंक दिया। निरंतरता के अभाव में विस्मृति की धूल सम्बंधों पर जमती चली गयी। सोलह दिसम्बर 2006 को पॉप्स (मेरे पिताश्री) कैंसर से जीवन का संघर्ष हार गये। मुझे हिमाचल की वादियों से ऊब होने लगी। उस समय दैनिक जागरण के मुख्य कर्ता-धर्ता निशिकांत ठाकुर से भेंट हुई। उनके मृदुल बात-व्यवहार और ‘कथित पक्के आश्वासन’ की डोर ने कुछ ऐसा उलझाया कि कई महीने उलझा रह गया। मेरे पास दिल्ली में रह कर संघर्ष करने के अलावा कोई उपाय न था। अतुल दयाल से निरंतर सम्पर्क में था।

नौकरी की खोज में अतुल दयाल एक बार फिर मेरे सारथी बने। वो मुझे रवीन्द्र शाह के पास ले गये। रवीन्द्र शाह के सामने आते ही मैं कुछ ठिठका। कुछ याद आया, मगर अपरिचित बने रहने में भलाई समझी। यह किस्सा एस वन न्यूज चैनल में नौकरी हासिल करने का है। एस वन में उस वक्त भी काम कम और राजनीति ज्यादा थी। रवीन्द्र शाह को ऐसे लोगो की आवश्यकता थी जो आंख-नाक-कान खोल कर काम कर सकें। रवीन्द्र शाह का उद्देश्य एस वन को न्यूज चैनल के इतिहास का एक उदाहरण बनाना था। कुछ भीतरी लोगों को यह सब बर्दाश्त न था। एस वन में उस समय तक किसी की नियुक्ति आसान बात नहीं थी।

मेरा साक्षात्कार हुआ। वेतन बताया गया और कहा गया कि दो-तीन दिन बाद नियुक्ति पत्र तैयार हो जायेगा। आपको फोन पर सूचना दी जायेगी। इसलिए दिल्ली छोड़ कर कहीं मत जाइएगा। फोन की घंटी बजी तो जरूर लेकिन तीस दिन बाद। बुझे हुए मन से हैलो बोला- उधर से आवाज आयी- एस वन चैनल से रवीन्द्र शाह बोल रहा हूं। आप का एक महीने पहले इंटरव्यू हुआ था। आपने कहीं और ज्वाइन कर लिया या आप एस वन चैनल में काम करना चाहेंगे?

अंधा क्या चाहे, दो आंखे। रवीन्द्र शाह की आवाज सुन कर ऐसी ही अनुभूति हुई, फिर दिमाग में कौंधा, पहली बार बुलाकर तो एक महीने बाद याद आयी है। दोबारा बुलाकर कब याद आयेगी पता नहीं। यही सब कुछ सोचते हुए मैंने कहा, जी शाम तक आपको पक्का बता दूंगा। मैंने राय साहब (श्री राम बहादुर राय) और मौलाना (श्री इक़वाल रिज़्वी) को फोन पर दोनों से परामर्श किया। दोनों का परामर्श लगभग एक जैसा था। मैंने कुछ देर बाद ही रवीन्द्र शाह को फोन किया और एस वन चैनल पहुंचने का समय मांगा…कुछ घर्षण-अपघर्षण के साथ एस वन में सेवा शुरू कर दी।

अतुल दयाल उस समय एस वन के प्रोग्रामिंग में अच्छे पद पर थे। चैनल में उनकी बात का प्रभाव था। पहले दिन ही मुझे एस वन की कैंटीन ले जाकर उन्होंने मुझे बताया कि रवीन्द्र जी पिछले एक महीने से मेरी नियुक्ति के लिए चैनल प्रबंधन से संघर्ष कर रहे थे। प्रबंधन के कुछ वरिष्ठों को मेरी नियुक्ति पर बिना कोई ठोस कारण आपत्ति थी। अतुल दयाल ने बताया कि चैनल के चेयरमैन के सामने रवीन्द्र जी ने मेरी नियुक्ति पर आपत्ति करने वाले वरिष्ठों से कारण पूछा। परिणाम, चेयरमैन को मेरी नियुक्ति पर सहमति देनी पड़ी।

उस दिन से रवीन्द्र शाह मेरे लिए ‘शाह सर’ थे। एस वन में हमारी तिकड़ी बन गयी। रवीन्द्र सर, अतुल दयाल और मैं दोपहर को साथ ही भोजन करते। रवीन्द्र सर को जिस दिन मालूम हुआ कि मैं लहसुन-प्याज नहीं खाता हूं, उस के अगले ही दिन से उनके टिफिन बॉक्स से लहसुन-प्याज गायब हो गया। अतुल एस वन छोड़ कर स्वप्न दा के साथ चले गये तो अरुण तिवारी ने प्रोग्रामिंग में ज्वाइन किया। अब तिकड़ी में अतुल की जगह अरुण तिवारी ने ले ली। घनिष्टता और घनिष्ट हुई तो एक दिन मौका देख कर शाह सर को ग्रीन पार्क की याद ताजा करवाई। उस दिन के बाद से हम लोग चैनल की चर्चा के साथ-साथ घर परिवार की चर्चाएं भी करने लगे। एक दूसरे के सुख-दुख और सलाह-मश्विरा में शामिल होने लगे।

ऐसी ही चर्चाओं के बीच कुछ बातें ऐसी होती जिनसे अहसास होता था कि शाह सर के चेहरे की मुस्कराहट के पीछे कुछ खास गम छुपे हैं। उनसे पूछा कैसे जाये, बस इसी मौके की तलाश रहती थी। ऑफिस में सम्भव ही नहीं था…और घर जाने की फुर्सत नहीं मिलती थी।

किराये के एक छोटे से कमरे की साज-सज्जा, किताबो का सलीके से रखा होना। दरवाजे और खिड़कियों के पर्दे…रसोयी का सामान और तो और कपड़े पहनने का उनका ढंग कुछ चुगली करता था। नोएडा के सेक्टर 24 से घर बदल कर सेक्टर 31 पहुंचे तो मुझे लगा अब कुछ सुराग मिलेगा। नहीं मिला। सेक्टर 31 से इंदिरापुरम के पत्रकार विहार पहुंचे तो वहां भी मेरा जासूसी दिमाग घर के भीतर और बाहर कुछ न कुछ खोजने की कोशिश करता रहता… और सभी कोशिशें नाकाम रहतीं। उनसे मिलने वाले सभी लोगों पर निगाह रखी मगर, जो मैं खोज रहा था कभी नहीं मिला। हालांकि अब तक हम लोग अपने पेशे के अलावा निजी-पारिवारिक जीवन की सभी बातें साझा करते थे। शाह जी के पिता श्री गंगजी शाह, बहन श्रीमति भावना भी कई बार आये। सब सामान्य, लेकिन उस सामान्य में भी आसामान्य दिखायी देता।

एस वन के हालात निरंतर गिरते जा रहे थे। शाह सर आजाद के बाद आउट लुक पहुंच गये। मैं उसी एस वन को ढो रहा था। इंदिरापुरम के पत्रकार विहार का घर बड़ा और अच्छा था। इस घर की देखभाल, शाह सर की खुद की देखभाल कौन कर रहा था। हर हफ्ते-पखबाड़े के बाद सभी चीजें नयी सी लगती थीं। मुझे काफी देर बाद समझ में आया। मैं अक्सर सुराग के नज़दीक होता था, मगर शाह सर ऐसा चकमा देते थे कि मेरा खुद से विश्वास उठ जाता था। यह सब कुछ मैं इसलिए बता पा रहा हूं कि हम लोग अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए भी एक दूसरे से लगातार मिलते रहते थे।

मीडिया से जुड़े कुछ प्रोजेक्ट अपनी जिम्मेदारी और नाम पर लेकर वो मुझ जैसे लोगों में बांट दिया करते थे। मुझ जैसे एक दो नहीं कई लोग बेकारी और बेरोजगारी के समय में शाह सर की ओर ताकते रहते थे। शाह सर ने कुछ लोगों को तो अपने खाते से तो कुछ कुछ लोगों की शादी ब्याह तक का सामान अपने क्रेडिट कार्ड से जुटाया। यह बात अलग है कि वो सबके सब तोता चश्म निकले।

शाह सर इंदौर से जब भी वापस आते तो कुछ पुरुष साथी जो उनको अपना सबसे नज़दीकी होने का दावा करते थे, अपने लिए भेंट उपहार की अपेक्षा रखते थे। ठीक वैसे ही महिला साथियों की चाहत रहती थी। बिना किसी भेद-भाव के शाह सर के पिटारे से हर किसी को कुछ न कुछ मिलता ही था। मुझे लौंगिया सेव बहुत पसंद थे।

शाह सर, एक-दो दिन के लिए इंदौर जाते हैं। घर-परिवार, माता-पिता से मिलते होंगे। दोस्तों से बतियाते भी होंगे… फिर उन्हें हर किसी के बारे में इतना सोचने और हर किसी की पसंद-नापसंद का ध्यान कैसे रहता है। पसंद-नापसंद का ध्यान रहना माना जा सकता है, लेकिन वो सारा सामान खरीदना और इंदौर से दिल्ली तक लाना…यह मुझे खटकता रहता था। इस कबायद में क्या शाह सर का आशी (बेटा) या बेटू (बेटी कनुप्रिया) मदद करते हैं या मीना भाभी (उनकी पत्नी) करती हैं ? आशी और बेटू के लिए तो वो खुद ही परेशान रहते थे। आशी और बेटू को क्या पसंद है, क्या लाना है, क्या ले जाना है, ये सारे जोड़-घटाओ लगाते हुए मैं खुद देखा करता था।

आशी और बेटू से फोन पर बात करते हुए भी सुना था। मां से बात होती थी। भावना दी से और पिता जी से भी बात-चीत सुनी थी। मगर, मीना भाभी किसी दृश्य में कभी न देखी न सुनी। फिर वो कौन है जिसका फोन आते ही शाह सर के चेहरे पर चमक आ जाती थी। जिससे वो आधी रात को भी अधिकारात्मक और आदेशात्मक लहजे में बात करते और सुनते थे। ये और ऐसे न जाने कितने प्रश्न मेरे मस्तिष्क पटल पर घूमते रहते थे।

आशी-बेटू, पिता जी और भावना दी से कई बार मिलना हुआ। मीना भाभी से पहली मुलाकात तब हुई जब शाह सर को डेंगू हुआ। सेक्टर 11 के मेट्रो हॉस्पीटल में भर्ती थे वो। आउटलुक में उनकी मीटिंग हो चुकी थी। ज्वाइनिंग के ऐन दिन डेंगू हो गया। नीलाभ जी ने स्थिति को समझा और जब वो ठीक हो गए, तब ज्वाइनिंग करवा ली। मीना भाभी आयीं चार दिन ठहरीं और चली गयीं। उनके बाद कौन आया था। जिसने उनकी सेवा-सुश्रा की।

अस्पताल में तो शाह सर का ध्यान रखने वाले ढेरों थे। वो कौन था जिसकी सोच शाह सर के इरादे तय करती थी। वो कौन था जो शाह सर के निर्णयों पर प्रभाव डालता था ? वो कौन था जिसके साथ शाह कर अपने अन्तर्मन की व्यथा-कथा साझा करते थे ? वो कौन था जो शाह सर के तरीके और सलीके में झलकता था ? उस शख्स को आकांक्षा जानती थी। बारास्ता आकांक्षा, वंदना को भी मालूम था उस शख्स का नाम वर्षा सुरवे !!! अपनी जानकारी में नाम आने के बाद, मैं  जब भी मौका मिलता तहकीकात शुरू कर देता। शाह सर से सीधे सवल-जवाब।

शाह सर और वर्षा सुरवे के सम्बंध कैसे और किस सीमा तक हैं, सम्बंधों में स्वार्थ किसका है, सम्बंधों पर पारिवारिक सहमति है भी या नहीं, बिना सहमति के सम्बंधों की वैधानिकता क्या है और क्या सम्बंधों को सामाजिक स्वीकारोक्ति मिलेगी और बच्चे इन सम्बंधों पर क्या सोचते हैं? कई महीनों में जाकर इन सारे सवालों का जवाब मिला।

लब्बो-लुवाब यह कि मीना जी से प्रेम विवाह के बावजूद शाह सर के जीवन में जो रिक्तता और अभाव था उस रिक्तता और अभाव को वर्षा सुरवे ही दूर करती थीं। तो फिर, वर्षा सुरवे का भी अपना कोई स्वार्थ रहा होगा ? वर्षा सुरवे का स्वार्थ शाह सर की खुशी थी। इंदौर के स्थानीय अखबारों से व्यवसायगत जीवन शुरू करने वाली वर्षा शिक्षिका बन गयीं। वर्षा सुरवे का शाह सर के जीवन पर इतना प्रभाव था कि वो चाहती तो नोएडा दिल्ली के उन फ्लैट-प्लाट में नॉमिनी बन जाती जिनके बारे में मीना भाभी को कुछ भी पता न था। वो चाहती तो इंदौर की किसी भी सम्पत्ति की हिस्सेदार बन जाती। सारे कागजातों की फाइल वर्षा सुरवे ही तैयार करती और उन्हें संभाल-संजो कर रखती थीं।

यहां तक कि शाह सर की किताबें, पेन-पेंसिल और पर्सनल नोटबुक भी वर्षा संभाल संजो कर रखती थी। वर्षा प्रायः हर पखबाड़े और छुट्टियों में तो अक्सर इंदौर से दिल्ली ऐसे चली आती थीं। अकाल, काल का ग्रास बनने से कोई दस-बारह दिन पहले शाह सर के कई अभिन्न मित्र सपरिवार मिले थे। शाह सर के साथ उस पारिवारिक सम्मिलन में वर्षा सुरवे ही थी। मित्रों के परिवारिक समारोह में वर्षा ही शाह सर के साथ जाती थी। उन समरोहों के फोटो ग्राफ्स कभी किसी को दिखा कर वर्षा सुरवे ने अपना अधिकार शाह सर पर जताने की कोशिश की ? कभी नहीं। वर्षा सुरवे ने तो शायद ही किसी को वो फोटोग्राफ्स दिखाये हों…लेकिन मुझे दिखाये थे… शाह सर ने अटठारह फऱवरी दो हजार बारह दिल्ली से आखिरी बार विदा होते हुए।

यूं तो इंदौर को मध्य प्रदेश की संस्कारिक और सांस्कृतिक राजधानी कहलाने का गौरव हासिल है…लेकिन वर्षा सुरवे और शाह सर के सम्बंधों पर सांस्कृतिक राजधानी के सुसंस्कृत जन मान्यता देने के बजाय जाने कसते रहे। मेरी तहकीकात जारी रही। माता-पिता, बहन और भाई की सहमति थी। वर्षा जब चाहती अधिकार कर सकती थी। शाह सर को विवश कर सकती थी अधिकार देने के लिए। पारिवारिक, समाजिक और आर्थिक अधिकार के लिए विवश कर सकती थी। चल-अचल सम्पत्ति में अधिकांश भी मांग सकती थी। जब वो ऐसा कर सकती थी तो क्यों नहीं किया ? प्रश्न यह कल भी था और आज भी है…!

उत्तर तो शाह सर के शब्दों में ही अच्छा होता…या वर्षा खुद देना चाहें… वर्षा किसे उत्तर दे, जो उससे पूछने का साहस करे…लोग उत्तर नहीं मांगते, सिर्फ ताने मार सकते हैं। शाह सर के साथ सम्बंधों के नामित नाम के अभाव में वर्षा सुरवे को कोई सिर्फ वर्षादी, वर्षाजी या कोई वर्षा मैम कहकर पुकारता है…और वर्षा सुरवे है कि अपना नाम ही भूल गयी है। वो नहीं भूली है तो तर्पण करना नहीं भूली है। वो नहीं भूली है तो शाह सर के सरोकारों को जीवित रखना।

लेखक राजीव शर्मा कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. राजीव से संपर्क 09968329365 के जरिए किया जा सकता है. रवींद्र शाह पर राजीव शर्मा का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं… 

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