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सहारा का संकट और मीडिया की नैतिकता… अखबार व चैनल क्यों कर रहे पूरे मामले को अंडरप्ले?

सुब्रत राय मीडिया की बोलती बंद करने का फंडा खूब जानते हैं. वे बड़े-बड़े अखबारों को बड़े-बड़े विज्ञापन देकर उनकी आर्थिक भलाई करते हैं तो बड़े-बड़े अखबार भी सुब्रत राय व सहारा के बड़े-बड़े मुद्दों-संकटों को छोटा-मोटा मान कर इसे अंडरप्ले करते रहते हैं. न्यूज चैनल वाले भी सहारा के खरबों के साम्राज्य के आगे सलामी बजाने की मुद्रा में रहते हैं क्योंकि सहारा के मैनेजर सबको बढिया ढंग से साधते रहने के लिए कुख्यात हैं.

सुब्रत राय मीडिया की बोलती बंद करने का फंडा खूब जानते हैं. वे बड़े-बड़े अखबारों को बड़े-बड़े विज्ञापन देकर उनकी आर्थिक भलाई करते हैं तो बड़े-बड़े अखबार भी सुब्रत राय व सहारा के बड़े-बड़े मुद्दों-संकटों को छोटा-मोटा मान कर इसे अंडरप्ले करते रहते हैं. न्यूज चैनल वाले भी सहारा के खरबों के साम्राज्य के आगे सलामी बजाने की मुद्रा में रहते हैं क्योंकि सहारा के मैनेजर सबको बढिया ढंग से साधते रहने के लिए कुख्यात हैं.

जनता का पैसा, सहारा की धंधेबाजी, सेबी की सख्ती, सुप्रीम कोर्ट का न्याय और सुब्रत राय की गिरफ्तारी… ये सब मिलाकर इतना बड़ा मामला बनता है कि इस पर गंभीर और बड़ी बहस होनी चाहिए. लेकिन न्यूज चैनल वाले चुप्पी साधे हुए हैं. अल्ल बल्ल सल्ल टाइप की बातें दूसरे मुद्दों पर हो रही है लेकिन सहारा और सुब्रत राय का प्रकरण हाशिए पर है. केवल टाइम्स नाऊ पर अरनब गोस्वामी सहारा के फ्राड और सुब्रत राय की गिरफ्तारी के मामले को लेकर लाइव डिबेट करा रहे हैं.

बताया जाता है कि इस मसले पर सूचनात्मक खबरें एबीपी न्यूज, न्यूज24, इंडिया टीवी, सीएनएन-आईबीएन और पी7न्यूज पर चली लेकिन सहारा को लेकर बड़ी डिबेट किसी अन्य न्यूज चैनल पर नहीं हुई. माना जा रहा है कि अखबार वाले भी इस मुद्दे को अंडरप्ले करेंगे क्योंकि सहारा की तरफ से लगातार बड़े बड़े विज्ञापन अखबारों में छपवाए जा रहे हैं और अखबारों के मालिकों-संपादकों-मैनेजरों को तरह-तरह से मैनेज किया जा रहा है. कार्पोरेट की गुलामी खुशी-खुशी करने वाले मीडिया हाउसेज ऐसे जनहित के मुद्दों पर क्यों चुप्पी साध जाते हैं, इसके कारणों को हर कोई समझदार आदमी समझ सकता है. दुर्भाग्य है कि जनता के पैसे को लूटकर खरबों रुपये इकट्टा करने वाली फ्राड कंपनियां पैसे के बल पर शासन, प्रशासन के साथ-साथ मीडिया को भी मैनेज करने में कामयाब हो जाती हैं.

सोशल मीडिया और न्यू मीडिया के लोगों को चाहिए कि वे सहारा प्रकरण को लगातार फ्लैश करें ताकि आम जन जान सके कि अब सहारा में पैसा लगाना सुरक्षित निवेश नहीं है क्योंकि सुब्रत राय की गिरफ्तारी के बाद इस ग्रुप के भरभराकर गिरने की आशंका प्रबल हो उठी है. सहारा के पतन के बाद इसी माडल पर फल-फूल रहीं दूसरी चिटफंड कंपनियों के पतन की भी शुरुआत होगी.

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. उनसे संपर्क [email protected] या +91 9999330099 के जरिए किया जा सकता है.

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