Om Thanvi : देश की सर्वोच्च अदालत से लुकाछिपी का बचपना जाहिर करने वाले सुब्रत राय और किसी से नहीं, मीडिया से परेशान हैं। पूरे पन्ने का इश्तहार दे करोड़ों रुपये उछाल दिए, पर मनचाही न्यूज कहीं हासिल हुई, कहीं नहीं। वकील और डाक्टरों के घर जाने लेकिन अदालत न जा पाने वाले राय बहादुर ने पहले अदालत को ही नायाब सुझाव दिया कि वह उन्हें 'हाउस अरेस्ट' कर ले।
दाल न गलने पर अंततः गिरफ्तारी देने की दरियादिली दिखाते (और उत्तर प्रदेश वन विभाग के शानदार अतिथि गृह में जा ठहरते) सहाराश्री ने जो बयान दिया है कि उसमें उन्होंने सीधे-सीधे मीडिया को हड़काया है: "अगर मेरी माँ को कुछ हो जाता है तो मैं ऐसे (माँ के प्रति इस 'कर्त्तव्य निर्वाह' को न समझने वाले) लोगों को जिंदगी भर नहीं भूलूँगा।"
नहीं भूलूंगा से नहीं छोडूंगा जैसी ध्वनि नहीं आती? इस बंदे को हुआ क्या है? आखिर इस (धन-पगलाए) मर्ज की दवा क्या है?
जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.





