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लखनऊ

सेबी और उसके अहंकारी चेयरमैन को इस सबसे क्या!

: सहाराश्री की गिरफ़्तारी के बहाने दयानंद पांडेय के कुछ सवाल :  तो क्या सहाराश्री भाग जाते? कि वह भगोड़े हैं। अगर वह श्रवण कुमार की तरह अपनी मां की सेवा सारा रिस्क ले कर कर रहे थे तो क्या उन की निंदा की जानी चाहिए? फिर उन्हें ४ मार्च को सुप्रीम कोर्ट में पेश होना है तो अभी से उन की गिरफ़्तारी के क्या मायने हैं? क्या न्याय सचमुच अंधा होता है? और कि यह सारा सिस्टम भी अंधा हो गया है? तो क्या यह सिस्टम अब बदल नहीं दिया जाना चाहिए। इस सिस्टम में आग नहीं लगा दी जानी चाहिए? और फिर सेबी की इस ज़िद का भी क्या करें?

: सहाराश्री की गिरफ़्तारी के बहाने दयानंद पांडेय के कुछ सवाल :  तो क्या सहाराश्री भाग जाते? कि वह भगोड़े हैं। अगर वह श्रवण कुमार की तरह अपनी मां की सेवा सारा रिस्क ले कर कर रहे थे तो क्या उन की निंदा की जानी चाहिए? फिर उन्हें ४ मार्च को सुप्रीम कोर्ट में पेश होना है तो अभी से उन की गिरफ़्तारी के क्या मायने हैं? क्या न्याय सचमुच अंधा होता है? और कि यह सारा सिस्टम भी अंधा हो गया है? तो क्या यह सिस्टम अब बदल नहीं दिया जाना चाहिए। इस सिस्टम में आग नहीं लगा दी जानी चाहिए? और फिर सेबी की इस ज़िद का भी क्या करें?

एक तरफ नरेंद्र मोदी जैसे राजनीतिज्ञ मान रहे हैं कि कारोबारी जितना रिस्क लेता है, जितना जोखिम लेता है, कोई नहीं लेता। सेना भी नहीं। दूसरी तरफ हमारा सिस्टम, हमारी सेबी किसी कारोबारी को खुल कर कारोबार करने की स्वतंत्रता भी छीन लेना चाहती है। अब अगर सहारा प्रबंधन यह बात इतने दिनों से चीख-चीख कर कह रहा है कि उस ने अपने सारे निवेशकों को उन का पैसा वापस कर चुका है और कि कोई निवेशक इस बात की शिकायत भी नहीं कर रहा कि मुझे पैसा नहीं मिल रहा तो सेबी को आखिर यह दु:स्वप्न कहां से और क्यों आ रहा है कि सहारा निवेशकों को दुबारा भुगतान करे?

स्पष्ट है कि सहारा को व्यवसाय करने से न सिर्फ़ रोका जा रहा है बल्कि उस की छवि भी ऐसी पेंट की जा रही है गोया सहारा या सहाराश्री देश के सब से बड़े अपराधी हों। क्या देश में विकास और व्यापार की उलटी गंगा बहाने पर आमादा है सेबी? आखिर कारोबारियों के बीच सेबी क्या संदेश देना चाहती है? टेलीविजन पत्रकारिता ने इस प्रसंग में जो रंग भरा है वह तो और तकलीफ़देह है। एंकरों के कच्चेपन और लफ़्फ़ाज़ों की लफ़्फ़ाज़ी का जो कैनवस उपस्थित किया है और इस तरह से किया है गोया देश पर कितनी बड़ी आफ़त आ गई हो। उन्हें कितना बड़ा ब्रेकिंग न्यूज मिल गया हो ! अजब परिृश्य है यह भी दिन-ब-दिन साक्षरता की खोह में समाती जाती इस टेलीविजन पत्रकारिता का भी। कि कौव्वा कान ले गया सुनते ही कौव्वे के पीछे भाग लेते हैं। यह भी पलट कर नहीं देख पाते कि कान तो उन के पास ही है। पेड न्यूज़ की मारी इस पत्रकारिता के सरोकार इस कदर डगमग हैं कि कुछ भी कहना बेमानी है।

कहा जाता है कि पुराने समय में जब कोई राजा युद्ध हारने लगता था तो वह एक रणनीति के तहत गाय आगे कर देता था ताकि उस की जान बच जाए। लगता है कि सेबी के चीफ़ ने उसी रणनीति पर अमल कर लिया है। फ़र्क बस यही है कि अब गाय की जगह सेबी चीफ़ ने अपनी हारी हुई लड़ाई को जीतने के लिए सुप्रीम कोर्ट को उसी गाय की भूमिका में आगे खड़ा कर दिया है। यह सब देख कर नीरज का शेर याद आता है :

हम को उस वैद्य की विद्या पर तरस आता है
जो भूखे नंगों को सेहत की दवा देता है।
चील कौवों की अदालत में है मुजरिम कोयल
देखिए वक्त भला क्या फ़ैसला देता है।

देश को प्राथमिकता देने वाला सहारा इंडिया परिवार का बुनियादी वसूल है कि व्यवसाय नहीं देश बड़ा है। भावना बड़ी है। मानवता और समाज बड़ा है। सहारा ने अपनी इसी सोच के तहत सर्वदा ही अपनी आय का चालीस प्रतिशत समाज कल्याण के कामों में खर्च किया है। यह उस का बुनियादी उसूल है। देश की तरक्की में न सिर्फ़ बेशुमार रोजगार सृजित किए हैं सहारा ने बल्कि सुदूर गांवों में सब को बचत का पाठ पढ़ाया है। जहां अभी तक बैंकिंग की किरन भी नहीं पहुंच पाई है। इतना ही नहीं देश में जब भी कभी कोई विपदा आई है तो सहारा के कार्यकर्ता बिना मौका गंवाए अपने श्रमबल और धनबल के साथ मदद में कूद पड़े हैं। ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। जिन से अखबारों और चैनलों की सुर्खियां भरी पड़ी हैं। वह चाहे कहीं बाढ आई हो, भूकंप आया हो, बादल फटा हो या कुछ और। कारगिल शहीदों की चिता ठंडी भी नहीं हुई थी कि सहारा परिवार उन के परिजनों के दुख और सहयोग में सब से आगे न सिर्फ़ खड़ा था बल्कि आज भी उन के दुख सुख का साझीदार है। लोग एक बेटी की शादी करने में टूट जाते हैं पर सहारा प्रति वर्ष एक सौ एक लड़कियों के विवाह हर साल करवाता है। अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब एक साथ राष्ट्र्गान गाने का रिकार्ड बनाया था सहारा के लाखों कार्यकर्ताओं ने एक साथ भावना दिवस के रुप में। यह और ऐसे कामों की फ़ेहरिश्त बहुत लंबी है।
तो यह सब कैसे?

सहाराश्री की ही सोच का नतीज़ा है यह सब। और उन सहाराश्री को सेबी सुप्रीम कोर्ट की आड़ ले कर भगोड़ा बताने पर तुली है। शायद इसी को कहते हैं कि जबरा मारे और रोने न दे ! कि जो कदम- कदम पर कानून और उस की मर्यादा की हिफ़ाज़त करे, व्यवसाय से पहले, व्यवसाय से ज़्यादा देश और समाज के बारे में सोचे, आप उसे उस के स्वाभिमान को अपने मनमानेपन और ज़िद की भेंट चढ़ा दें? सिर्फ़ इस लिए कि वह अपनी वृद्ध और बीमार मां के चरणों में नत था, इस लिए? सिर्फ़ इस लिए?
या कि सिर्फ़ इस लिए कि इस आदमी ने सेबी के चेयरमैन का ईगो-मसाज नहीं किया इस लिए?

जमील खैराबादी का एक शेर याद आता है इस समय:

इक-इक सांस अपनी चहे नज़्र कर दीजे
मां के दूध का हक फिर भी अदा नहीं होता।

मां तो छोड़िए सहाराश्री तो वो व्यक्ति हैं जो अपने दिवंगत पिता को भी सर्वदा अपने दिल में रखते हैं। प्रति वर्ष उन का जन्म-दिन न सिर्फ़ मनाते हैं बल्कि खूब धूम-धाम से समारोहपूर्वक मनाते हैं। बिलकुल किसी महापुरुष के मानिंद। माता-पिता से प्यार करना और उन्हें भगवान की तरह पूजना अगर किसी को सीखना हो तो सहाराश्री से सीखे। लेकिन सेबी और उस के अहंकारी चेयरमैन को इस सब से क्या! वह तो अपने मनमानेपन और अहंकार में चूर हैं। और मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों ! पर किसी बच्चे की मानिंद आमादा हैं। आमीन !

लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. वे लंबे समय से राष्ट्रीय सहारा अखबार के लखनऊ संस्करण में सेवारत हैं.

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