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केदारनाथ मंदिर के रावल कहां हैं!

केदारनाथ मंदिर के रावल भीमाशंकर लिंग एक बार फिर से लोगों के निशाने पर हैं। जून माह में आई आपदा के बाद संतो व धर्माचार्यों के विरोध को किसी तरह शांत करने में कामयाब रहे थे, लेकिन केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने की तिथि तय होने के अवसर पर उनकी गैरमौजूदगी के बाद एक बार फिर से उनकी कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। शिवरात्रि के दिन भगवान केदारनाथ के शीतकालीन पूजा स्थल ओंकारेश्वर मंदिर में विधि विधान के अनुसार मंदिर के कपाट खुलने की तिथि का निर्धारण होता है। लेकिन इस महत्वपूर्ण अवसर पर रावल मौजूद नहीं थे।

केदारनाथ मंदिर के रावल भीमाशंकर लिंग एक बार फिर से लोगों के निशाने पर हैं। जून माह में आई आपदा के बाद संतो व धर्माचार्यों के विरोध को किसी तरह शांत करने में कामयाब रहे थे, लेकिन केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने की तिथि तय होने के अवसर पर उनकी गैरमौजूदगी के बाद एक बार फिर से उनकी कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। शिवरात्रि के दिन भगवान केदारनाथ के शीतकालीन पूजा स्थल ओंकारेश्वर मंदिर में विधि विधान के अनुसार मंदिर के कपाट खुलने की तिथि का निर्धारण होता है। लेकिन इस महत्वपूर्ण अवसर पर रावल मौजूद नहीं थे।

जून माह में आई आपदा के दौरान भी रावल भीमाशंकर लिंग कई दिनों के बाद प्रकट हुए थे। उस समय शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती व कई अन्य संतों ने उनको पद से हटाने की मुहिम छेड़ दी थी। केदारनाथ मंदिर के कपाट आगामी ४ मई को श्रद्धालुओं के दशर्नाथ खोले जायेंगे। इसका निर्णय परम्परानुसार शिवरात्रि के दिन शीतकालीन पूजा स्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में हुआ। लेकिन केदारनाथ मंदिर के रावल भीमा शंकर लिंग इस कार्य के लिए समय नहीं निकाल पाये। उनकी अनुपस्थिति ऐसे वक्त पर है जब बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति रावलों पर नियमावली के अनुसार काम करने की अपनी योजना को आकार देने की कवायद में जुटी है।

ज्ञात हो कि फरवरी माह के शुरूआत में बदरीनाथ के रावल केशवन नम्बूदरी दिल्ली में एक महिला के साथ छेड़छाड़ के आरोप के चलते समिति द्वारा निलंबित कर दिये गये। मामले की गंभीरता को देखते हुए समिति ने मंदिरों से जुडे हक हकूक धारियों, तीर्थ पुरोहितों व पंडा समाज के लोगों से रायसुमारी कर बदरीनाथ व केदारनाथ के मंदिरों के रावलों के लिए एक नई नियमावली बनाने की पहल की। इस संदर्भ में समिति ऋषिकेश व देहरादून में दो बैठकें कर चुकी है। ऐसी स्थिति में जब बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति रावलों के आचरण के लिए नियमावली बना रही हो और केदारनाथ मंदिर के रावल मंदिर से जुडे अहम धार्मिक आयोजन में न हों तो, समझना मुश्किल नहीं है कि रावल उनके लिए बनाई जा रही नियमावली जैसे विषय को कितना महत्व दे रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि केदारनाथ के रावल पूर्व में शीतकालीन पूजा स्थल ऊखीमठ में ही स्थायी रूप से निवास करते थे। जानकार यहां तक बताते हैं कि केदारनाथ मंदिर के रावल खुले में नहीं घूमते थे। धूप सेकने के लिए उनके आवास में एक छोटी खिडकी हुआ करती थी, वो उसी का प्रयोग करते थे। लेकिन अब यहां स्थिति पूरी बदल चुकी है। रावल यहां बहुत कम रहते हैं। केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने के समय कुछ समय यहां रहने के बाद वो कहां रहते हैं क्या करते हैं, इस बारे में बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति ही बेहतर बता सकती है।

यह केदारनाथ के रावल की जिम्मेदारी बनती है, केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने की जब तिथि निर्धारिण हो रही हो तो उन्हें न केवल वहां मौजूद रहना चाहिए था बल्कि आगामी यात्राकाल के लिए मंदिर में पूजा संबधी तैयारियों की जानकारी लेनी चाहिए थी। लेकिन अफसोस इस बात का है कि रावल शीतकालीन पूजा स्थल में हैं ही नहीं। रावल की अनुपस्थिति यह भी दर्शाती है कि बदरीनाथ केदरनाथ मंदिर समिति चाहे जो भी नियमावली या कानून बना ले लेकिन वो अपनी मनमानी से वाज नहीं आयेंगे।

बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि केदारनाथ के रावल भीमाशंकर लिंग आज ऊखीमठ में मौजूद नहीं थे। उन्होंने कहा कि समिति इस विषय को  गंभीरता से ले रही है। हालांकि मंदिर समिति नियमावली बनाने की बात कह रही है लेकिन समिति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती है। यह पहला मौका नहीं है, जब केदारनाथ के रावल वहां नहीं थे, पिछले साल भी वो ऊखीमठ से नदारद थे। सवाल समिति के काम करने के तरीके पर भी उठता है। यदि समिति पहले ही कड़े कदम उठाती तो शायद यह नौबत नहीं आती। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि समिति की नई नियमावली रावलों की कार्य संस्कृति में बदलाव लाती है या फिर रावल अपनी ही मनमानी करते रहेंगे।

देहरादून से बृजेश सती की रिपोर्ट.

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