श्री सुधीर अग्रवाल जी/ श्री पवन अग्रवाल जी,
मैनेजिंग डायरेक्टर दैनिक भास्कर,
कॉरपोरेट ऑफिस, भोपाल
रिस्पेक्टिड सर,
मैं लगभग तीन साल से अम्बाला भास्कर में सब-एडीटर के पद पर कार्य करता रहा। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि भास्कर नंबर वन है, और इसके मुकाबले कोई भी अखबार नहीं है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि ऑफिस में कंपनी के नियम धड़ल्ले से टूट रहे हैं।
कोई भी रूल फॉलो नहीं किए जाते हैं। कर्मचारियों के हित की बात करना सिर्फ दिखावा साबित हो रहा है। इसके कारण पूरा ऑफिस परेशान है। ईमानदार सीनियरों की अनदेखी हो रही है। एचओडी और कर्मचारियों के बीच ट्रांसपेरेंसी बिल्कुल भी नहीं है। काम करने वाले और ईमानदार कर्मियों को परेशान करके मजे लिए जाते हैं। दैनिक भास्कर मेरा सबसे पसंदीदा अखबार है।
मैं इसमें काम करना चाहता था, इसीलिए यह ग्रुप ज्वाइन किया था। भविष्य में भी मौका मिलने पर मैं इस अखबार में आना चाहता हूं। मैं कंपनी के फायदे के लिए कुछ बातें शेयर कर रहा हूं। मेरा इससे कोई स्वार्थ नहीं, अगर मेरी बात सही लगे तो ठीक, अन्यथा इसे अनदेखा कर दिया जाए। एक निवेदन यह है कि आप मेरा नाम डिस्क्लोज़ न करें और आवश्यक समझें तो नीचे लिखी बातों की जांच कराएं।
१. कंपनी सभी कर्मचारियों को वीकली ऑफ देती है। कुछ ‘खास’ लोगों के कहने पर ऑफ हजम कर लिए जाते हैं। कारण कुछ भी हो लेकिन नियम तो कंपनी के टूट रहे हैं।
२. कंपनी की ओर से साल की १२ छुट्टियां मिलती है, किसी को भी यह छुट्टियां नहीं दी जाती हैं। कंपनी ऐसे नुमाइंदों को बर्दाश्त कर रही है जो नियमों की लगातार धज्जियां उड़ा रहे हैं, इस कारण बहुमूल्य कर्मचारी जॉब छोड़ रहे हैं। आखिर कर्मचारियों की भी अपनी फैमिली है। जिनके लिए उन्हें समय चाहिए।
३. कंपनी ने गैलेप सर्वे के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए। एक चाटूकार ने अपने नंबर बनाने के लिए ईई को ऐसी सलाह दी कि सभी कर्मचारियों के पासवर्ड लेकर गैलेप सर्वे एक ही कंप्यूटर पर बैठकर पूरे अम्बाला जोन के कर्मचारियों का भर दिया गया। इतना बड़ा धोखा कंपनी से, जिसका नमक खा रहे हैं। बड़े पद पर बैठे नुमाइंदे, धूल झोंक रहे हैं। कंपनी को खबर ही नहीं है। कोई जुबान नहीं खोलता, यहां भी स्वार्थ है। नौकरी से हाथ धोने का। एक्शन नहीं हुआ तो, गंदी राजनीति का शिकार होकर जॉब छोडऩी पड़ सकती है।
४. पिछले साल दिवाली से पहले एक कर्मचारी रामचंद्र यादव को पुत्र प्राप्ति हुई। लाख मिन्नतों के बाद भी उसे छुट्टी नहीं दी गई। हलांकि उसके बिना भी ऑफिस का काम आसानी से चल जाता। मैं आपको बताना चाहूंगा कि उस दौरान तीन लोगों को छुट्टी देने के बाद भी एडीशन लेट नहीं होते थे। कोई छुट्टी पर भी नहीं था। मजबूरी में वह घर चला गया तो उसकी सेलरी काट दी गई। बाद में एचआर हेड, चंडीगढ़ से बात करने पर उसकी सेलरी मिली। लेकिन कंपनी के नुमाइंदों ने सीख नहीं ली। आज अम्बाला स्टेशन से कई कर्मचारी नौकरी छोड़ चुकें हैं, सिर्फ इसी बर्ताव से। चाहे कारण कुछ भी हो।
५. यमुनानगर में एक सीनियर रिपोर्टर की जगह खाली थी। वहां नियुक्ति तो की लेकिन काम अम्बाला में लिया जा रहा है। एचआरडी की ओर से ट्रांसफर लेटर जारी किए बिना अम्बाला में कैसे नियुक्ति कर दी गई। कोई रूल नहीं, कोई प्रोसेस नहीं, बस ‘लिंक’ से सभी काम हो रहे हैं।
६. एक उदाहरण (सबूत के तौर पर आपको मेल फॉरवर्ड कर रहा हूं), मैंने बार-बार अपने ऑफ एडजेस्ट करने के लिए प्रार्थना की तो इस पर खूब राजनीति हुई और मजे लेने के लिए लगातार लीव लगाई गई। दुखी होकर मैंने नौकरी छोडऩे का फैसला कर लिया। मैंने यह बात मेल के जरिए एचआर और स्टेट एडीटर शिव कुमार विवेक जी के समाने भी रखी लेकिन फिर भी कोई ऑफ एडजेस्ट नहीं किए गए। एचआर से बात की तो संतोषजनक जवाब नहीं मिला। आज भी मेरे ९ वीकली आफ के पैसे नहीं दिए गए हैं। अगर मुझे पॉजीटिव रिस्पोंस मिलता तो मैं जॉब छोडऩे का निर्णय वापस ले सकता था। क्या कंपनी मुफ्त में काम लेकर कर्मचारियों का शोषण कर रही है। इसके लिए कंपनी के नुमाइंदो को छूट क्यों है। ‘कर्मचारी विरोधी नीतियां’ तो हम खूब प्रकाशित करते हैं आज सब सामने है।
७.ग्रुप के लिए बेशक इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता हो लेकिन किसी भी एंगल से यह सही नही हैं। भास्कर ग्रुप से कर्मचारियों को काफी उम्मीदें हैं और किसी भी ग्रुप के कर्मचारी उसकी अमूल्य संपत्ति होते हैं। बड़ा और सराहा जाने वाला ग्रुप बनने के लिए इस पर विचार करना होगा, जो कंपनी का विज़न है।
आपका पूर्व कर्मचारी
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उपरोक्त पत्र दैनिक भास्कर, अंबाला में कार्यरत रहे एक सब एडिटर ने अपने इस्तीफे के बाद मैनेजमेंट को भेजा है.






