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पार्टी पर दबाव बनाना काम नहीं आया योगी के

बाबू सिंह कुशवाहा के बहाने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोशिश करने वाले भाजपा संसद योगी आदित्यनाथ का तेवर काम नहीं आया। भाजपा की ताजी सूची में उनके विरोधी गोरखपुर सदर के विधायक डा. राधा मोहन दास अग्रवाल और बांसगांव से पूर्व सांसद शुभावती पासवान को टिकट मिलना तो कम से कम यही संकेत करता है। अभी कल ही योगी ने कहा था कि वे इस बार चुनाव प्रचार नहीं करेंगे। यह एक संकेत था कि पार्टी आला कमान ने उनकी बात नहीं मानी। हालाकि योगी ने इसके पीछे गोरखनाथ मेले में व्यस्तता का बहाना किया था। पर बात साफ थी की पूर्वांचल में योगी के चहेतों को पार्टी का टिकट नहीं मिलना ही इस की वजह थी।

बाबू सिंह कुशवाहा के बहाने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोशिश करने वाले भाजपा संसद योगी आदित्यनाथ का तेवर काम नहीं आया। भाजपा की ताजी सूची में उनके विरोधी गोरखपुर सदर के विधायक डा. राधा मोहन दास अग्रवाल और बांसगांव से पूर्व सांसद शुभावती पासवान को टिकट मिलना तो कम से कम यही संकेत करता है। अभी कल ही योगी ने कहा था कि वे इस बार चुनाव प्रचार नहीं करेंगे। यह एक संकेत था कि पार्टी आला कमान ने उनकी बात नहीं मानी। हालाकि योगी ने इसके पीछे गोरखनाथ मेले में व्यस्तता का बहाना किया था। पर बात साफ थी की पूर्वांचल में योगी के चहेतों को पार्टी का टिकट नहीं मिलना ही इस की वजह थी।

दरअसल योगी और राधामोहन दास अग्रवाल के बीच का शीतयुद्ध अब सतह पर आ चुका है और गोरखपुर सदर की सीट को योगी ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। साथ ही साथ बांसगांव की सीट पर भी परोक्ष रूप से योगी शुभावती पासवान को नहीं चाहते थे। साथ ही योगी पूर्वांचल की पन्द्रह सीटों पर भी अपना दावा जता रहे थे। इसी कारण भाजपा इन सीटों पर अपने उम्मीदवारों का फैसला नहीं कर पा रही थी। दबाव बनाने के लिए योगी को बाबू सिंह के रूप में बहाना भी मिल गया। पर योगी द्वारा इस मुद्दे पर पार्टी छोड़ने की धमकी भी काम नहीं आई। इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने ऐलान कर दिया कि वह विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रचार नहीं करेंगे। योगी ने कहा कि वह पार्टी के चरित्र और चिंतन में आ रही गिरावट पर पहले ही नाखुशी और चिंता जता चुके हैं। ऐसे हालात में पार्टी का प्रचार करना उनके लिये मुमकिन नहीं है। बकौल आदित्यनाथ, महीने भर चलने वाले खिचड़ी मेले में उनकी व्यस्तता भी प्रचार ना कर पाने की एक वजह है। योगी से जब यह पूछा गया कि प्रचार के लिये पार्टी ने आपसे आग्रह किया तो उन्होंने कहा कि प्रदेश में प्रचार के लिए पार्टी नेतृत्व ने 40 लोगों की जो सूची बनाई है उसमें मेरा भी नाम है, पर मैंने प्रचार न करने का निर्णय लिया है।

सांप्रदायिक राजनीती के लिए जाने जाने वाले भाजपा संसद योगी आदित्य नाथ अपनी हिंदू युवा वाहिनी के जरिये पूर्वांचल की तराई में खासे सक्रिय रहे हैं। इस संगठन के जरिये योगी पार्टी पर दबाव बनाते रहे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के गोरखपुर दौरे के समय भी हिंदू युवा वाहिनी के लोगों ने उत्पात मचाया था। पार्टी नेतृत्व भी इस बार योगी के पर कतरने का मन बना चुका था। परन्तु योगी के प्रभाव को देखते हुए पार्टी ने पहली सूची में उनके नजदीकी विजय बहादुर यादव को टिकट भी दिया था। योगी ने इसे पार्टी की कमजोरी समझी और गोरखपुर सदर और बांसगांव सहित पन्द्रह सीटों के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि योगी की इस पराजय के तार कहीं न कहीं उत्तर प्रदेश की राजनीती में अपनी जगह खोज रहे राजनाथ सिंह से भी जुडे हैं। योगी और राजनाथ का आपसी तालमेल किसी से छुपा नहीं है। राजनाथ सिंह की भी इस बार टिकट बंटवारे में नहीं चली। हालांकि वे समय समय पर अपने बयानों के जरिये अपनी भूमिका बनाने की कोशिश जरूर करते रहे। देखने वाली बात यह होगी कि क्या योगी अपनी हिंदू युवा वाहिनी के लोगों को किसी नए मंच से चुनाव मैदान में उतारते हैं या नहीं। अपनी उपेक्षा से क्रोधित योगी आदित्यनाथ भी भाजपा नेतृत्व को अपनी ताकत दिखाना जरूर चाहेंगे। नतीजतन पूर्वांचल की कई सीटों पर भाजपा की संभावनाओं पर ग्रहण लग सकता है। गोरखपुर सदर में योगी के प्रभाव को देखते हुए वहाँ भी राधामोहन के लिए चुनाव किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होगा।

लेखक उत्कर्ष कुमार सिन्हा लोकमत, लखनऊ के स्थानीय संपादक हैं.

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