Dear Yashwant ji, मैं आपके माध्यम से अपनी बात मेंहदी हसन के उन प्रशंसकों तक पहुंचाना चाहूंगा जो पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. आपका मीडिया साइट काफी लोकप्रिय है और आपका सामाजिक और नैतिक सरोकार मुझ जैसे कलाप्रेमी पत्रकार को आपसे जुड़ने का एक बेहतर बहाना बना है. उस्ताद मेंहदी हसन उस अज़ीमोशान शहंशाह ए ग़ज़ल का नाम है जो पूरी दुनिया में अकेले ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने ग़म, जज़्बात और लय (ग़ज़ल) का मतलब समझाया। पुराना राजस्थान के लूना में जन्मे इस फ़नकार को आज की नयी पीढ़ी शायद कम जानती हो लेकिन साठ-सत्तर और अस्सी के दशक में लोग शायद गजल को अगर जानने लगे तो इसका श्रेय हसन साहब को ही जाता है।
मैं उनका बड़ा प्रशंसक हूँ। मुझे उनकी एक नज़्म याद है जिसमें उन्होंने जिन सुरों का प्रयोग किया है वो बिरले ही मिलते हैं। सरगम के सात सुरों मसलन सा रे ग म प ध नि सा के तहत…म दो तरह के होते हैं एक कोमल और दूसरा तीव्र लेकिन इन दो सुरों के अलावा उन्होंने एक नये सुर के बारे में बताया जिसे उन्होंने आंदोलन का नाम दिया जो हारमोनियम की पटरियों में नहीं मिलते। इसके बोल थे खूबखू फैल गयी बात सनासाइ की….उसने
खुशबू की तरह मेरी फ़जीराइ की….। वास्तव में भारत रत्न लता मंगेशकर जी उनके बारे में अगर कहती हैं कि उनके गले में भगवान बसते हैं तो आश्चर्य कैसा।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनकी दो ग़ज़लों के तो फैन हैं…एक अहमद फराज की ग़ज़ल..रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आओ…आ फिर से छोड़ के मुझे जाने के लिए आओ…ग़ज़ल की ऐसी बानगी है जिसे सुनकर आज भी रोम-रोम खिल उठता है…उनकी एक और ग़ज़ल….जिसे कतिल शिफई ने लिखा है…जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं…मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा…बेहतरीन ही नहीं रूमानियत की ऐसी मिल्कियत है जिसे सुनकर कोई अपने मुकद्दर से लड़ने को भी तैयार होगा।
उनकी किसी भी ग़ज़ल को ले लें…आपको लगेगा कि उनका उस ग़ज़ल से नज़दीक का नाता हो। रफ्ता-रफ्ता वो मेरे हस्ती का शामा हो गए, वो दिलनवाज़ है लेकिन नज़र सनाज नहीं, ये धुआं कहां से उठता है, शोला था जल बुझा हूं हवाएं मुझे ना दो, अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले, तन्हा-तन्हा मत सोचा कर मर जाएगा, अपनों ने गम दिए तो मुझे याद आ गया एक अजनबी जो गैर था और ग़मगुज़ार था, केसरिया बालम आओ रे पधारो म्हारो देश जैसे कई नगमें आज भी जुबान पर हैं…
मैं कोई शायर नहीं हूं और ना ही कोई रिकार्डिंग इंजीनियर लेकिन चार साल की उम्र में मेरे पिताजी ने मुझे ऐसे ही महान शख्सियत की मौशुकी की ऐसी घूंट पिलाई कि मैं आज तक उनकी ग़ज़लों को इंज्वाय कर रहा हूं। मेरी ऊर्दू की जुबां ठीक-ठाक होने के पीछे भी उस्ताद मेंहदी हसन साहब ही रहे…मैं अगर एक बात कहूं कि पूरी दुनिया में हसन साहब से बड़ा कोई ग़ज़लकार नहीं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मैं ईश्वर से दुआ करता हूं कि उस्ताद मेंहदी हसन साहब को जिंदगी नसीब दे और उनके सभी चाहनेवाले भी इस परिस्थिति में उनके बेहतर स्वास्थ्य की कामना करें।
मैं भड़ास4मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया में फैले उनके प्रशंसकों तक यह अपील करना चाहूंगा कि वो उनके इलाज के लिए हरसंभव मदद दें…चंद लाइनें यहां जरूर लिखना चाहूंगा कि… मेरा घर काश तेरे घर के बराबर होता…तू ना आता, तेरी आवाज़ तो आती रहती…। और एक अपनी लाइन कि….मेरी रुह देगी दस्तकें जब तेरे आस्तां पे कौशल…याद आएगी शहर-ए-यार तेरी ज़िंदगी किन मरहलों से गुजरी थी….
आनंद कौशल
ब्यूरो चीफ
पॉजिटीव मीडिया ग्रुप
हमार टीवी, पटना
मेहंदी हसन साहब के गाए कुछ ग़ज़ल-गीत यहां सुनें- रोज कहता हूं…





