: गलियों में नही दिखते हैं हाथ के लिखे बैनर : देहात और शहर की गलियो में पहले बैनर और दीवारों पर नारे लिखे देख कर ही लोगों को पता चल जाता था कि चुनाव ने दस्तक दे दी है पर अब ऐसा नहीं है। चुनाव आयोग की सख्ती के चलते अब दीवारों पर नारे और बैनर दिखाई नहीं देते हैं। नारे-बैनर लिखने वाले पेंटरों के पास चुनाव के समय सर उठाकर बात करने का भी समय नहीं होता था। आज चुनाव के समय उनके पास काम करने को नहीं है। इलेक्ट्रानिक मशीनों के आ जाने से असर पड़ा है, वहीं चुनाव आयोग के डंडे के कारण दीवारों पर नारे लिखने पर प्रतिबंध लगाने से भी इस काम को करने वाले पेंटर को बेरोजगार कर दिया है। रोज कुंआ खोद कर पानी पीने वाले इन पेंटरों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
पहले चुनाव की आहट से ही पेंटरो के चेहरों पर रौनक देखते ही बनती थी। रौनक हो भी क्यों ना, चुनाव उनके लिये रोजी रोटी का प्रबंध लेकर जो आता था। चुनाव सांसद का हो या फिर विधानसभा, नगरपालिका, नगरपंचायत, इससे उन्हें क्या, उनके लिये तो चुनाव किसी भी सौगात से कम नहीं होता था। चुनाव में दीवार पर नारे लिखने से लेकर बैनर बनाने का इनको इतना काम मिल जाता था कि यह रात दिन एक करके काम को पूरा करने में लग जाते थे। इनके पास बात करने का भी टाईम नहीं होता था। चुनाव के समय काम करके यह इतनी बचत कर लेते थे कि जिससे वह लम्बे समय तक अपने परिवार का भरण पोषण करते रहते थे। पेंटरों के पास कभी भी काम की कमी नहीं रहती थी। संसद का चुनाव फिर विधायक, नगर पालिका और फिर गांव पंचायत के चुनाव समय समय पर होते रहते हैं। जिससे पेंटरों के पास कभी भी काम की कमी नहीं होती थी।
समय ने ऐसा करवट बदला और इलेक्ट्रानिक मशीनों का दौर शुरू हुआ और बैनर की जगह फ्लेक्स ने ले ली जिससे हाथ से लिखे बैनरों की मांग कम होती चली गई। हाथ से बने एक बैनर की लागत 80 रुपये आती है, वहीं फ्लेक्स मात्र 70 रुपये में ही कम समय में तैयार हो जाते हैं। इस चुनाव में तो हाथ से लिखे बैनर दिखाई ही नहीं पड़ते हैं। चुनाव आचार संहिता का ऐसा डंडा चला कि दीवारों पर नारे लिखने पर प्रतिबंध लग गया जिससे पेंटरो के काम पर इसका सीधा असर पड़ा। शाहजहांपुर में किसी समय में 45 पेंटर हुआ करते थे पर आज मात्र 10 पेंटर ही काम कर रहे हैं। जो लोग पेंटर का काम छोड़ चुके हैं वह दिल्ली में मजदूरी करते हैं, या सब्जी बेच रहे हैं। कई लोग तो अब गाड़ियों की नम्बर प्लेटें बनाकर अपनी रोजी रोटी का प्रबंध कर रहे हैं।
लेखक सौरभ दीक्षित शाहजहांपुर में इलेक्ट्रनिक मीडिया से जुड़े हुए हैं.





