Nadim S. Akhter : भारतीय स्वयंसेवक संघ ने संगठन में तीसरे नंबर पर आने वाले अपने एक प्रचारक को कुंवारा नहीं रहने की सजा दी है. एक स्त्री से संबंध रखने के 'अपराध' में 52 वर्षीय प्रचारक केसी कन्नन को जॉइंट जेनलर सेक्रेट्री के पद से हटा दिया गया. संघ का कहना है कि ऊंचे ओहदे तक पहुंचे प्रचारकों को घर बसाने की इजाजत नहीं. भारतीय सभ्यता-संस्कृति की दुहाई देने वाले संघ का यह नियम मुझे अटपटा लगता है. क्यों भाई. क्या घर बसाने वाले-विवाह करने वाले लोग अपने दायित्वों का दृढ़ता से निर्वाह नहीं करते?
भारतीय शास्त्रों के अनुसार तो वे कुंवारों की अपेक्षा ज्यादा अच्छे तरीके से करते हैं. फिर भी संघ के अंदर यह अजीबोगरीब कानून मुझे किसी तुगलकी और सनकी फरमान जैसा लगता है. लगता है कि संघ को भारतीय शास्त्रों का ज्ञान नहीं. लगभग तीन हजार ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश की रचना की थी। इस ग्रंथ में चौदह समुल्लास हैं। इसके पांचवें समुल्लास में कहा गया है
ब्रह्मचर्याश्रमं समाप्य गृही भवेत् गृही
भूत्वा वनी भवेद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत्।।
अर्थात् मनुष्यों को योग्य है कि ब्रह्मचर्याश्रम को समाप्त करके गृहस्थ होकर वानप्रस्थ और वानप्रस्थ होके संन्यासी होवें | यह अनुक्रम से आश्रम विधान है। गृहस्थाश्रम के पश्चात् पचासवें वर्ष की अवस्था में जब देखें कि सिर के केश श्वेत हो गये हैं, त्वचा ढीली हो गई है और लड़के के लड़का भी हो गया है तब वानप्रस्थ में प्रवेश करके वन में जाकर बसे।
चलिए नए जमाने में जंगल ही नहीं बचे हैं तो वानप्रस्थ मत करिए, जंगल में मत बसिए लेकिन घर तो बसा ही सकते हैं. यह इतना बड़ा अपराध कैसे हो गया कि इसके लिए किसी व्यक्ति की निष्ठा पर सवाल उठाते हुए उसे काम करने से रोक दिया जाए?! यह तो जंगल के किसी कबीले का कानून लगता है.
हिंदू धर्म में विवाह को सात जन्मों का बंधन, मोक्ष का रास्ता और अत्यंत पवित्र कर्म करार दिया गया है. इसे अंजाम दिए बिना आपका जन्म सार्थक ही नहीं. यही कारण है कि भगवान ने जब-जब अवतार लिए, राम के रूप में, कृष्ण के रूप में, उन्होंने विवाह जरूर किया और मनुष्यों को विवाह धर्म की श्रेष्ठता का एहसास कराया. संहारकर्ता भगवान शिव और पालनकर्ता भगवान विष्णु ने भी विवाह किया और गृहस्थाश्रम की प्रतिष्ठा को स्थापित किया. फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को विवाह करने वालों से इतना ऐतराज, इतनी एलर्जी क्यों????
हिंदू धर्म में तीन आश्रमों का उल्लेख है. बह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम. मुझे समझ नहीं आता कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने प्रचारकों को सिर्फ और सिर्फ ब्रह्मचर्याश्रम तक रोककर और उन्हें गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने से मना करके किस सभ्यता व संस्कृति की रक्षा की दुहाई देता है. ये पाखंड नहीं तो और क्या है??? और ये तो प्रचारकों का शारीरिक-मानसिक शोषण भी है.
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.





