वैसे तो पत्रकार खुद को तीसमारखां, फन्ने खां, तोपची आदि जाने क्या क्या समझते हैं लेकिन जब खुद अपने हक की लड़ाई की बात आती है तो ज्यादातर चुप्पी साध लेते हैं. लेकिन बनारस नगरी ऐसी है जहां कुछ वीर बसते हैं. योगेश गुप्त पप्पू और दादा अजय मुखर्जी पत्रकारों के मसले सवालों को उठाते रहते हैं और इनकी शिकायतों पर संबंधित सरकारी विभाग सक्रिय भी हो जाते हैं.
मजीठिया वेतनबोर्ड की सिफारिशों को अखबारों द्वारा न लागू किए जाने की शिकायत इन दोनों ने की तो श्रम कार्यालय ने अखबारों को तलब कर लिया है. पूरी कहानी इन दो पत्रों की जुबानी समझा जा सकता है….







