: फिल्म में जब यह सीन देख रहा होता हूं तो मुझे याद आता है मेरा स्वयं गोरखपुर में एएसपी के रूप में कार्यकाल. वहां के एक एसएसपी के कार्यकाल को विभागीय लोग पेटीकोट गवर्नमेंट कहते थे क्योंकि पूरे जिले की पुलिस में यह चर्चा थी कि पैसों की वसूली मेमसाहब के हाथों होती है : मुझे अपने ट्रेनिंग के वे दिन याद आते हैं जब मैं एक डीआईजी के पास मिलने गया था और उस डीआईजी ने मुझे कई घंटों अकारण बाहर बैठाए रखा था जबकि इस दौरान मेरे बाद आने वाले तमाम लोग आराम से अंदर आ-जा रहे थे, इतना ही नहीं, मिलने पर भी उस डीआईजी का व्यवहार ऐसा था कि चाह कर भी मुझे दुबारा उससे मिलने की इच्छा नहीं हुई :
वैसे तो हम बहुत कुछ सहने, सुनने और देखने के अभ्यस्त हो गए हैं और अब शायद हमें किसी भी बात से उतना अधिक सदमा या धक्का नहीं लगता और ना ही कोई आश्चर्य होता है. यह हम लोगों की एक बहुत बड़ी कमजोरी हो गयी है क्योंकि हमारी सहनशक्ति बेपनाह हो गयी है. चाहे व्यवस्था हमारे साथ कुछ भी कर ले, हम हैं कि उसे चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं. हम यह मान लेते हैं कि व्यवस्था का यह हक है कि हमारे साथ उसकी जो इच्छा हो वह करे. मैं कुछ दिनों पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के शासन काल से जुड़ी एक घटना के विषय में पढ़ रहा था जिसमें केरल में इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे एक युवक को नक्सल घटनाओं के नाम पर उठा लिया गया, उसे बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया और पुलिस हिरासत में ही उसकी मौत हो गयी.
पुलिस ने इतना भी उचित नहीं समझा कि उस युवक का शव उसके पिता के सुपुर्द करे. पता नहीं कहाँ उस युवक के शव को उस समय के अत्यंत प्रभावशाली एक डीआईजी के प्रभाव में जला दिया गया. यह भी नहीं था कि वह युवा कोई सड़कछाप आदमी हो. वह एक कॉलेज के प्रोफ़ेसर का बेटा था जिसके उस समय के तमाम बड़े लोगों से सम्बन्ध और संपर्क थे. वह प्रोफ़ेसर लगातार अपने गायब हुए बेटे को खोजते रहे, उस डीआईजी से लेकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और गृह मंत्री तक भागते रहे, कई-कई बार मिले लेकिन किसी ने भी उन्हें उनके बेटे का पता नहीं बताया.
अंत में बाध्य हो कर वे कोर्ट की शरण में गए. उन्होंने हेबियस कोर्पस का रिट पेटिशन किया, उस समय के गृह मंत्री करुणाकरण, आईजी और डीआईजी के खिलाफ आपराधिक मुकदमे किये, हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक लगातार भागते रहे और इतना सब कुछ करने के बाद उन्हें यह ज्ञात हुआ कि उनके बेटे की तो बहुत पहले हत्या हो गयी थी. इस मामले में डीआईजी समेत दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ मुकदमे हुए और उन्हें निचली अदालत से साल भर की सजा भी हुई पर वह सजा हाई कोर्ट से समाप्त हो गयी. हाँ, यह जरूर है कि उन्हें उस जमाने में छः लाख रुपये का हर्जाना राज्य सरकार की ओर से दिये जाने के आदेश जरूर हुए थे जो बाद में उन्हें मिले भी.
मैं जब वाईपी सिंह की फिल्म “क्या यही सच है” देख रहा था तो मुझे लगातार केरल की आपातकाल की यह घटना याद आ जा रही थी. मैं सोच रहा था कि कैसे रघु कुमार को उतनी ही बेबसी का सामना करना पड़ रहा था जितनी बेबसी की स्थिति में उस युवा इंजीनियर के पिता लगातार कई साल तक बने रहे. पर शायद रघु कुमार उतना भी भाग्यशाली नहीं था जितना उस लड़के के प्रोफेसर पिता क्योंकि जहाँ अंत आते-आते उन्हें अपने मामले में किसी हद तक न्याय मिला लेकिन रघु कुमार को तो सिवाय अन्याय के कुछ नहीं मिला, वह भी तब जब उसने पूरी शिद्दत और ईमानदारी से अपनी नौकरी की थी और अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे. अतः यदि कोई मुझसे पूछता है कि क्या यही सच है, क्या वास्तव में यह सच है, क्या ऐसा भी होता है तो मैं तो अब यही मानता हूँ कि हाँ, ऐसा बिलकुल होता है, यह पूरी तरह सच है.
लोग कहते हैं कि बिना आग के धुंआ नहीं होता पर अपने स्वयं के अनुभव से मैं भलीभांति जानता हूँ कि बिना किसी भी दोष के कैसे मैं लगभग कारागार के मुहाने तक पहुँच गया था. यदि मेरा भाग्य मेरे साथ नहीं होता तो मैं आज अपराधियों को हथियार के लाइसेंस बेचने वाले एक गिरोह के सरगना के रूप में कुख्यात हो गया होता क्योंकि कुछ लोगों ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ में मुझे ऐसे ही फंसाने की कोशिश की थी. वे लोग कहीं बाहर के नहीं हैं, मेरे अपने विभाग के हैं, मेरे वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारी हैं. मैं सोचता हूँ कि जब मैंने अपनी वास्तविक जिंदगी में अपने साथ ऐसा होते देखा है तो पता नहीं औरों के साथ क्या-क्या नहीं हुआ होगा, हमारी इस व्यवस्था में.
ये ऐसे प्रश्न हैं जो अक्सर लोग आपस में पूछ रहे हैं, जब भी वे महाराष्ट्र कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी वाईपी सिंह की पुलिस पर आधारित “क्या यही सच है” फिल्म देख रहे हैं. वाईपी सिंह आज देश के आईपीएस अफसरों में एक बहुत चर्चित नाम हैं. उत्तर प्रदेश के मूल निवासी योगेश प्रताप सिंह वर्ष 1985 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे जिन्हें महाराष्ट्र कैडर मिला था. वे अन्य तमाम आईपीएस अधिकारियों से सर्वथा अलग हैं और उनके लिए अपने व्यक्तिगत हितसिद्धि से कहीं बहुत आगे बढ़ कर उनका कर्तव्य है.
वे मानते हैं कि एक आईपीएस अधिकारी के रूप में उनका उद्देश्य केवल गाडी, बंगला, नौकर-चाकर और बड़े-बड़े ओहदे नहीं हैं बल्कि इसका प्रथम और एकमात्र उद्देश्य जनता की सच्चे हृदय से सेवा करना है. उन्होंने पूरी ईमानदारी और निष्ठा से नौकरी करने को शुरू से ही अपना ध्येय बना लिया जिसमें सौभाग्य से उनकी पत्नी आभा सिंह की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही. लखनऊ की रहने वाली आभा स्वयं भारतीय पोस्टल सर्विस की अधिकारी हैं और अच्छे परिवार में पैदा हुईं.
योगेश और आभा की जोड़ी ने शुरू से ही आईपीएस की नौकरी अपने बल पर, अपने ऊँचे आदर्शों के तहत करने का दृढ निश्चय किया और योगेश ने अंत तक अपनी इस प्रतिज्ञा को कायम रखा. लेकिन कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता. जिस प्रकार से व्यवस्था में गड़बड़ियां आती जा रही हैं उसके कारण उन्हें अपनी नौकरी में लगातार दिक्कतें आती रहीं. जब उन्हें यह महसूस होने लगा कि वे इस सेवा में इज्जत और प्रतिष्ठा से नौकरी नहीं कर पायेंगे तो उन्होंने अपने आप को किसी अन्य क्षेत्र में शिफ्ट कर लेने का निश्चय कर लिया. नतीजतन उन्होंने महाराष्ट्र विश्वविद्यालय में एलएलबी में दाखिला लिया और वहाँ से एलएलबी में सबसे अधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए. बीस साल की नौकरी पूरी होते ही उन्होंने आईपीएस की सेवा से वोलंटरी रिटायरमेंट ले लिया और अब वे मुंबई के जाने-माने सोशल एक्टिविस्ट और अधिवक्ता हैं.
अपनी सेवा में रहते हुए ही वाईपी सिंह ने अपने जीवन को आधार बना कर एक पुस्तक लिखी, जो काफी चर्चित रही. वैसे तो यह नाम के लिए उपन्यास है लेकिन कुल मिला कर यह उनके स्वयं के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती हुई कहानी है जिसमें एक बहुत ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ युवा आईपीएस अफसर के जीवन और उसकी नौकरी में आने वाली कठिनाइयों को बहुत गहराई के साथ दर्शाया गया है. उस समय भी पुलिस विभाग के अंदर की पोल खोलने के नाते इस पुस्तक की बहुत चर्चा हुई. ज्ञातव्य हो कि उस समय वाईपी सिंह पुलिस फ़ोर्स में ही थे, आईपीएस अफसर थे, अभी उन्होंने त्यागपत्र नहीं दिया था. अब वाईपी सिंह और उनकी पत्नी आभा ने मिल कर इसी उपन्यास को आधारित करते हुए यह हिंदी फिल्म भी बनाई है. नाम दिया है- “क्या यही सच है.”
मैंने जब इस फिल्म के रिव्यू पढ़े थे तो ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने यही कहा था कि फिल्म की कहानी तो बहुत अच्छी है लेकिन फिल्म तकनीकी दृष्टि से बहुत सामान्य है. यह बात भी आई थी कि इस फिल्म के ज्यादातर पात्रों का अभिनय बहुत ही निम्नस्तरीय है. कैमरा वर्क, एडिटिंग आदि की भी निंदा की गयी. इन सबों के बाद भी सभी फिल्म समीक्षकों ने यह माना था कि इस फिल्म की कहानी में बहुत दम है. यह कहानी इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह फिल्म किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं बल्कि उस व्यक्ति ने बनाई जो स्वयं इस व्यवस्था का हिस्सा रहा, जो स्वयं एक आईपीएस अफसर रहा, जिसने स्वयं अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के कारण भारी मुसीबतें झेली.

फिल्म का एक दृश्य
वैसे तो वाईपी सिंह मुझसे सेवा में कुछ साल सीनियर हैं लेकिन मिजाज और हावभाव में साम्य होने के नाते कहीं ना कहीं एक दोस्ती और गहरे अपनेपन का भाव हमेशा से रहा है. लिहाजा मैंने यह फिल्म उसी निगाह और उसी अपनेपन से देखी. फिल्म में एक्टिंग कैसी है, कैमरा वर्क कैसा है, एडिटिंग कैसी है, यह सब अपनी जगह महत्वपूर्ण प्रश्न होते हैं लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद मैंने यह महसूस किया कि कई बार ऐसा होता है कि फिल्म की कहानी इतनी सशक्त और ईमानदार हो जाती है जिसके कारण शेष सभी बातें बिलकुल गौण हो जाती हैं.
इस कहानी का हीरो (या मुख्य पात्र) रघु कुमार एक युवा आईपीएस अफसर है. वह बहुत से आदर्श, बहुत से सपने लेकर पुलिस की सर्वोच्च सेवा का अंग बनता है, लेकिन यहाँ आ कर वह क्या देखता है? वह देखता है कि आईपीएस अफसरों की बीवियां थानों के दरोगाओं से जबरदस्ती धन-उगाही कर रही हैं, मौज मस्ती कर रही हैं और थानों के इंचार्ज अपनी कुर्सी बचाने के लिए मरे हुए लोगों के गहने नोच के इन मेमसाहबों को भेंट दे रहे हैं.
मैं जब यह सीन देख रहा होता हूँ तो मुझे याद आ जाता है मेरा स्वयं गोरखपुर में एएसपी के रूप में कार्यकाल. हाँ के एक एसएसपी के कार्यकाल को लोग पेटीकोट गवर्नमेंट कहते थे क्योंकि पूरे जिले की पुलिस में यह चर्चा थी कि पैसों की वसूली मेमसाहब के हाथों होती है. इसी तरह से जब मैं देखता हूँ कि डीआईजी त्रिपाठी रघु कुमार से तो पहली बार मिलने पर बहुत ही बदतमीजी से पेश आता है पर जमाने भर की सारी बदनाम औरतों और दलालों के साथ घंटों बड़ा भला बन कर समय बिताता है तो मुझे अपने ट्रेनिंग के वे दिन याद आते हैं जब मैं एक डीआईजी के पास मिलने गया था और उस डीआईजी ने मुझे कई घंटों अकारण बाहर बैठाए रखा था जबकि इस दौरान मेरे बाद आने वाले तमाम लोग आराम से अंदर आ-जा रहे थे.
इतना ही नहीं, मिलने पर भी उस डीआईजी का व्यवहार ऐसा था कि चाह कर भी मुझे दुबारा उससे मिलने की इच्छा नहीं हुई. जब मैं देखता हूँ कि रघु कुमार बेचारा एक फर्जी जांच में बुरी तरह फंसा दिया जाता है तो जैसा मैंने ऊपर बताया मुझे स्वयं का पुलिस अधीक्षक गोंडा का कार्यकाल याद आ जाता है जब मैं फर्जी ढंग से अपराधियों को “आर्म्स लाइसेंस” देने वाले गिरोह का लगभग सदस्य बना ही दिया गया था और यदि मेरी किस्मत खराब रहती तो शायद मैं भी रघु कुमार की तरह अपनी नौकरी के बाहर कहीं और अपना समय गुज़ार रहा होता.
कुल मिला कर मतलब यह कि भले ही कुछ बाहरी लोगों को ऐसा महसूस हो कि “क्या यही सच है” की कहानी में बहुत अतिरेक है और यह सत्यता से परे है पर लगभग बीस साल इस नौकरी में गुज़ार लेने के बाद जहाँ तक मैं देख पाता हूँ मुझे इसमें कुछ भी ज्यादा नहीं दिखता. मैं स्वयं इनमें से कई स्थितियों का भुक्तभोगी रहा हूँ, जब मैं चालाक और लालची लोगों के षडयंत्र का शिकार हुआ हूँ. यह बात भी मैं जानता हूँ कि मैं ऐसा अकेला व्यक्ति नहीं हूँ, यह अलग बात है कि व्यवस्था के कथित डर के शिकार कई लोग अपना मुंह नहीं खोलते और चुपचाप यह सब सहन करते रहते हैं.
व्यवस्था में यह सब कुछ हो रहा है लेकिन हम सब चुप रहने को मजबूर हैं क्योंकि हममें से हर आदमी के कुछ छोटे-छोटे व्यक्तिगत स्वार्थ हैं. हम आईएएस और आईपीएस अफसरों को बंगला चाहिए, गाड़ी चाहिए, अनुचर चाहिए, आगे-पीछे आदमी चाहिए. हमें अच्छी पोस्टिंग चाहिए. जाहिर है यह सब चाहने की कीमत भी होती है. इसका सीधा मतलब है हम चुप रहें. यदि हम कुछ बोलेंगे तो इसे अनुशासनहीनता माना जायेगा. हमें इसके लिए सीधे नहीं तो घुमा कर दण्डित किया जाएगा. लेकिन यह भी सही है कि यदि हममे से कोई भी आदमी सामने आ कर सच्चाई नहीं बयान करेगा तो इन स्थितियों में सुधार कब होगा? यह सही है कि हमारे स्वार्थ बहुत जरूरी हैं पर क्या इससे बहुत अधिक जरूरी देश, समाज और व्यवस्था में आवश्यक सुधार नहीं है. यही वह प्रश्न है जो मुझे भी सालता है, परेशान करता है और हर उस आदमी को परेशान करता है जिसके पास किसी भी तरह का अपना खुद का जमीर है.
लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. जनपक्षधर पुलिसिंग के समर्थक हैं. पुलिस में सकारात्मक सुधार के लिए विभिन्न तरीकों से सक्रिय हैं.





