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मेरठ

समाजवादियों के राज में गन्ना किसानों का भयानक शोषण

झुर्रियों में लिपटे किसानों के चेहरों के लिए लोकतंत्र के उत्सव का अब बहुत मतलब नहीं रह गया है। कुछ वादे तो ऐसे हैं जो हर चुनाव में नेताओं की सियासी वैतरणी पार कराने के काम आते हैं। किसानों की बदहाली के लिए नेता ही सबसे अधिक कसूरवार है। कांग्रेसी नेता स्व श्री कैलाश प्रकाश ने शिक्षा व विकास की जो बुनियाद रखी, वह आज दरकती नजर आ रही है।

झुर्रियों में लिपटे किसानों के चेहरों के लिए लोकतंत्र के उत्सव का अब बहुत मतलब नहीं रह गया है। कुछ वादे तो ऐसे हैं जो हर चुनाव में नेताओं की सियासी वैतरणी पार कराने के काम आते हैं। किसानों की बदहाली के लिए नेता ही सबसे अधिक कसूरवार है। कांग्रेसी नेता स्व श्री कैलाश प्रकाश ने शिक्षा व विकास की जो बुनियाद रखी, वह आज दरकती नजर आ रही है।

न कल कारखाने लगे न ही उच्च शिक्षा का कोई केंद्र इस प्रदेश के खाते में आया। चुनाव में स्थानीय मुद्दे गुम होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बातें कर उम्मीदवार चुनावी फिजा को अपने पक्ष में करने में जुटे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उम्मीदवार चौधरी चरण सिंह को नमन कर माहौल को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनके द्वारा भी जलाई गई किसानों के विकास की लौ को कोई सहारा नहीं दे रहा।

उत्तर प्रदेश में चालू गन्ना पेराई सत्र 2013-14 में चीनी उत्पादन 55.3 लाख टन के आंकड़े पर पहुंच गया है। वर्ष 2011-12 और 2012-13 के दौरान राज्य में चीनी उत्पादन 69.7 लाख टन और 74.7 लाख टन पर था। हालांकि गन्ने का बकाया भी 7,875 करोड़ रुपये की नई ऊंचाई पर पहुंच गया है और निजी क्षेत्र की मिलों का इसमें 7,350 करोड़ रुपये का बड़ा योगदान है। गन्ने का बढ़ता बकाया खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रमुख चुनावी मुद्दा भी बन गया है। किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने में विफल रहने के लिए अखिलेश यादव सरकार जिम्मेदार है।

उत्तर प्रदेश में अब तक 119 चीनी मिलों ने सामूहिक रूप से 6 करोड़ टन से अधिक गन्ने की पेराई की है। रिकवरी प्रतिशतता सुधर कर 9.30 फीसदी पर है जो पिछले साल 9.11 फीसदी थी। यहां रिकवरी का मतलब प्रति यूनिट गन्ने की पेराई से तैयार चीनी से है और अधिक प्रतिशतता का मतलब अधिक उत्पादन और इसके परिणामस्वरूप चीनी मिलों को अधिक मुनाफा मार्जिन से है। उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों ने अब तक किसानों को 5,863 करोड़ रुपये का भुगतान किया है जबकि कुल बकाया 13,739 करोड़ रुपये है।

वास्तविक रूप से गन्ना बकाया 15,450 करोड़ रुपये का था। सरकार ने मिलों को पेराई सत्र के अंत तक प्रति क्विंटल गन्ने पर किस्त के रूप में 20 रुपये चुकाने की अनुमति दी थी। इस वजह से उनकी शुद्घ देनदारी 1,711 करोड़ रुपये तक घट कर 13,739 करोड़ रुपये रह गई। 2013-14 में गन्ने की कीमत 280 रुपये प्रति क्विंटल थी और मिलों को 260 रुपये और 20 रुपये (प्रति क्विंटल) की किस्तों में भुगतान की अनुमति दी गई थी।

उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसकी एक वजह तो यह यह नगदी फसल है और एक साथ पैसा मिल जाता है जबकि दूसरा यह कि खादर का भी बड़ा क्षेत्र है। अक्सर बाढ़ आ जाती है। बाढ़ में दूसरी फसलें मर जाती है जबकि गन्ने की फसल पर बाढ़ का असर कम होता है। लेकिन बीते कई साल से गन्ने की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है। एक तो कई साल से गन्ना कभी सूखे तो कभी बाड़ की भेंट चढ़ रहा है। दूसरा जो बचता है उसका समय से भुगतान नहीं मिल पा रहा है, जिसने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। इसके चलते किसान भी कर्ज के बोझ तले दबा जा रहा हैं।

उत्तर प्रदेश मे गन्ना किसानों के दर्द की जिम्मेदार समाजवादी पार्टी हैं।।

अभिमन्यु त्यागी

मेरठ

उत्तर प्रदेश

Abhimanyu Tyagi is a freelance Writer from Meerut, Uttar Pradesh. You can follow him at www.facebook.com/tyagiabhimanyu, www.twitter.com/abhimanyutyagi . Mobile Number : +91-9528930507 Mail : [email protected]

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