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कवि वीरेन डंगवाल का पहला संकलन जब आया तो वह चालीस के हो चुके थे

Ashok Kumar Pandey : पता नहीं कितने नए कवि जानते हैं कि हमारे समय के सचमुच के बड़े कवि वीरेन डंगवाल का पहला संकलन जब आया तो वह चालीस के हो चुके थे. मनमोहन जैसे कवि का भी उसी उम्र के दौरान आया. आज जिस तरह की आपाधापी मची है किताब छपवाने को लेकर, उसमें किताबें इतनी जल्दी आ जाती हैं कि न पूछिए. एक कवि को आप पहली बार कहीं सुनते/पढ़ते हैं और फिर कुछ उम्मीद सी जगने लगती है तो पता चलता है कि संकलन बस आने ही वाला है! मन करता है पूछूं कि आके भी क्या हो जाएगा!

Ashok Kumar Pandey : पता नहीं कितने नए कवि जानते हैं कि हमारे समय के सचमुच के बड़े कवि वीरेन डंगवाल का पहला संकलन जब आया तो वह चालीस के हो चुके थे. मनमोहन जैसे कवि का भी उसी उम्र के दौरान आया. आज जिस तरह की आपाधापी मची है किताब छपवाने को लेकर, उसमें किताबें इतनी जल्दी आ जाती हैं कि न पूछिए. एक कवि को आप पहली बार कहीं सुनते/पढ़ते हैं और फिर कुछ उम्मीद सी जगने लगती है तो पता चलता है कि संकलन बस आने ही वाला है! मन करता है पूछूं कि आके भी क्या हो जाएगा!

एक प्रकाशक के रूप में ऐसे अनुरोध भी मिलते ही रहते हैं. उनसे बहुत विनम्रता से कहा करता हूँ कि पहले हिंदी की ज़रूरी पत्रिकाओं में छप लीजिये, थोड़ा अपने समय और परम्परा के कवियों को पढ़ लीजिये. छंद वाली कविता में तो छंद सही है तो बहुत कुछ चल जाता है लेकिन मुक्तछंद कविता इसके अलावा भी बहुत कुछ मांगती है. ऊपर से बहुत आसान लगने वाली कविता लिखना बहुत आसान होता नहीं है. वह बहुत ध्यान मांगती है, बहुत एडिटिंग मांगती है…

तो किताब आना बड़ी बात नहीं है…बड़ी बात है उसे ऐसा होना कि अपने समय में हस्तक्षेप कर सके.

बहुत मुआफ़ी के साथ…

साहित्यकार अशोक कुमार पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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