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मुख़्तार अंसारी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक चुकी थी

Ujjwal Bhattacharya : आख़िर मुख़्तार अंसारी ने चुनाव न लड़ने का फ़ैसला क्यों लिया? उसे सेकुलर राजनीति की इतनी फ़िक्र हो गई थी? बनारस की हालत से परिचित लोग जानते हैं कि मुख़्तार के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक चुकी थी. मुसलमान के नाम पर कोई उसे वोट देने को तैयार नहीं था. यह चुनाव राजनीतिक हो चुका है और मुख़्तार को कोई सेकुलर राजनीति का प्रतिनिधि नहीं मानता है. हां, अगर वह चुनाव लड़ता तो 10-15 हज़ार वोट उसे मिल जाते.

Ujjwal Bhattacharya : आख़िर मुख़्तार अंसारी ने चुनाव न लड़ने का फ़ैसला क्यों लिया? उसे सेकुलर राजनीति की इतनी फ़िक्र हो गई थी? बनारस की हालत से परिचित लोग जानते हैं कि मुख़्तार के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक चुकी थी. मुसलमान के नाम पर कोई उसे वोट देने को तैयार नहीं था. यह चुनाव राजनीतिक हो चुका है और मुख़्तार को कोई सेकुलर राजनीति का प्रतिनिधि नहीं मानता है. हां, अगर वह चुनाव लड़ता तो 10-15 हज़ार वोट उसे मिल जाते.

अब स्थिति यह है कि शहर व शहर से लगे इलाके में पूरी तरह से राजनीतिक वोटिंग होगी. एक तरफ़ मोदी के समर्थक होंगे, तो दूसरी ओर केजरीवाल के इंद्रधनुषी समर्थक. 16 को केजरीवाल व आप के अन्य नेता, व साथ ही, हज़ारों कार्यकर्ता बनारस पहुंच रहे हैं. बनारस में यह एक अनोखा चुनाव अभियान होगा. केजरीवाल के समर्थन में युवा ब्रिगेड मैदान में उतर चुका है. इस चुनाव अभियान की और एक विशेषता यह है कि सारी प्रतिद्वंद्विता हिंदू बहुल शहरी इलाकों में हो रही है. सारे कार्यकर्ता वहीं देखे जा रहे हैं. बाकी इलाकों में तुलनात्मक रूप से सन्नाटा है.

अजय राय काफ़ी पीछे तीसरे स्थान पर हैं. बनारस में सेकुलर परिदृश्य अब पूरी तरह से केजरीवाल के साथ है. अगर कुछ लोग आंख मूदने में ही अपनी बुद्धिमानी समझते हैं, फिर उनकी मदद कोई नहीं कर सकता है. बनारस की लड़ाई में अब कोई मुसलमान उम्मीदवार नहीं है. अब इसे सांप्रदायिक रंग देना मुश्किल हो जाएगा. हर समुदाय में सेकुलर वोट बहुमत में हैं. उनको एकजुट करना ही असली काम है. बनारस में सबसे लंबे समय तक जीतने वाले भाजपा के श्यामदेव राय चौधरी को भी अपना प्लैटफ़ॉर्म सेकुलर बनाना पड़ता था. अटसवादी श्यामदेव इस बार महज खानापूर्ति कर रहे हैं. बनारस की आबादी को बोलशेविक बनाकर भी मोदी को आसानी से हराया जा सकता था. बनारस शहर में सपा की कोई निर्णायक भूमिका नहीं है. अगर समूचे प्रदेश को देखा जाय, तो वह खुद अपनी मिट्टीपलीद करा चुकी है. इस हालत से उबरने के लिये काफ़ी कुछ करना पड़ेगा उसे. मेरी राय में इस चुनाव में यूपी में बसपा की भारी जीत होने जा रही है. पिछला चुनाव कोई मापदंड नहीं है. इस बार भी अगर जोशी लड़ते तो अजय राय की जीत निश्चित थी. हालत बदल गई है. मुख़्तार का हट जाना उसका संकेत है. उसे तो और अधिक वोट मिले थे. मेरी राय में अपना दल के वोट का अधिकतर हिस्सा मोदी को जाएगा. लेकिन कोई भी पार्टी अपने सारे वोट किसी दूसरे को नहीं दिला सकती है. मोदी सवा दो लाख से ज़्यादा ले आयेंगे…इस बार वोट ज़्यादा पड़ेंगे. वैसे साढ़े चार लाख तो मोदी-आशावाद है…लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है ? सबको अपने-अपने लक्ष्य ऊंचे रखने चाहिये.

इस बार सारे वोट दो उम्मीदवार खींच ले जाएंगे. तीसरा काफ़ी पीछे होगा. पहले दो में से एक मोदी है. जिन्हें उम्मीद है कि अजय राय दूसरे होंगे, उन्हें इस ख़ुशफ़हमी में रहने दीजिये. स्थिति अनुकूल हो चुकी है. मुझे बस एक ही खतरा दिखाई दे रहा है : वह है अजय राय का मोदी के समर्थन में बैठ जाना. यह सोचकर कि मोदी जीतने से दुबारा चुनाव होगा और वह जीतेंगे. लेकिन अगर वह ऐसा करते हैं, तो यह उनकी राजनीतिक मौत होगी.

बनारस से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार उज्जवल भट्टाचार्या के फेसबुक वॉल से.

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