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दिव्य भास्कर के पत्रकारों पर एफआईआर लोकतंत्र पर सीधा हमला है!

दिव्य भास्कर अखबार गुजरात के नामचीन अख़बारों में है. प्रकाश राव राने, काना बाटवा और अनिरुद्ध निकुम्ब इस अखबार के राजकोट कार्यालय में काम करते हैं. प्रकाश राव फोटोग्राफर हैं, काना बाटवा कार्यकारी संपादक हैं और अनिरुद्ध निकुम्ब रिपोर्टर हैं. कल तक ये तीनों मिल कर खबर बनाते थे, आज ये स्वयं में ही खबर बने हुए हैं. कल तक ये दूसरों के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने और उनकी गिरफ्तारी की बात जनता को बताते थे, आज दूसरे लोग इनके खिलाफ दर्ज किये गए मुकदमे और उसमें हुई इनकी गिरफ़्तारी की दास्तान बता रहे हैं.

दिव्य भास्कर अखबार गुजरात के नामचीन अख़बारों में है. प्रकाश राव राने, काना बाटवा और अनिरुद्ध निकुम्ब इस अखबार के राजकोट कार्यालय में काम करते हैं. प्रकाश राव फोटोग्राफर हैं, काना बाटवा कार्यकारी संपादक हैं और अनिरुद्ध निकुम्ब रिपोर्टर हैं. कल तक ये तीनों मिल कर खबर बनाते थे, आज ये स्वयं में ही खबर बने हुए हैं. कल तक ये दूसरों के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने और उनकी गिरफ्तारी की बात जनता को बताते थे, आज दूसरे लोग इनके खिलाफ दर्ज किये गए मुकदमे और उसमें हुई इनकी गिरफ़्तारी की दास्तान बता रहे हैं.

इस तरह प्राप्त खबरों के अनुसार गुजराती दैनिक अखबार दिव्य भास्कर के राजकोट संस्करण के संपादक बाटवा समेत तीन पत्रकारों के विरुद्ध थाना गांधीग्राम, राजकोट (गुजरात) में संजय कुमार, इंस्पेक्टर, थाना मालवीय नगर द्वारा मु०अ०स० 6/2012 धारा 447, 341, 509, 323, 500, 501, 502, 109, 292 व 120बी आईपीसी के तहत एक मुक़दमा पंजीकृत कराया गया है. यह मुक़दमा दिव्य भास्कर के राजकोट संस्करण में राजकोट सिटी के पुलिस कमिश्नर गीता जौहरी की नील सिटी क्लब, राजकोट में नए साल के ज़श्न की पार्टी में डांस करती तस्वीर छपने के आधार पर किया गया. जानकारी यह भी है कि इस मुकदमे के आधार पर ही इन तीनों पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया और कोर्ट द्वारा बेल मिलने पर भी काफी देर बाद रिहा किया गया. जानकारी के अनुसार गांधीग्राम थाने के सब इन्स्पेक्टर केके पांड्या इस मुकदमे की तफ्तीश कर रहे हैं.

वैसे उपरी तौर पर देखने में इसमें कोई बड़ी बात नहीं दिखती है. एक अखबार में कोई गलत फोटो छपी है और इसके आधार पर कुछ आपराधिक धाराओं में मुक़दमा पंजीकृत हुआ है. इस आधार पर गिरफ्तारी हुई है, यह सब तो रोजमर्रे की बात है. लेकिन यदि थोड़ी भी गहराई से देखा जाए तो मामला इतना सरल नहीं है. यह सीधे तौर पर अधिकारों का खुला दुरुपयोग, लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला और मीडिया की स्वाधीनता पर तीखा दांव है. मैं जब यह बात कह रही हूँ तो स्वाभाविक तौर से मुझे अपनी बात कहने के लिए कारण और तर्क देने होंगे. सकारण कही गयी बात का ही मतलब होगा, अन्यथा यही माना जाएगा कि मैं रटी-रटाई बात कह रही हूँ जिसका कोई मतलब नहीं होता.

मुझे अपनी बात कहने से पहले यह बताना होगा कि अभिलेखों के अनुसार इन तीनों मीडियाकर्मियों का अपराध क्या है. मैंने इस सम्बन्ध में पुलिस कमिश्नर राजकोट कार्यालय और थाना गांधीग्राम से जो जानकारी ली उसके अनुसार एफआईआर यही कहता है कि राजकोट सिटी नील सिटी क्लब में तीस दिसंबर को नए साल के ज़श्न की कोई पार्टी हो रही थी. एफआईआर के अनुसार इन तीनों लोगों ने आ कर वहाँ मौजूद घेराबंदी को तोड़ा, जबरदस्ती वहाँ घुसे, डांस कर रही पुलिस कमिश्नर गीता जौहरी को बलपूर्वक आपराधिक ढंग से रोका, उनसे मारपीट की और उनका फोटो खींच कर महिला की अस्मिता से खिलवाड़ किया. आगे एफआईआर के अनुसार इस फोटो और इसके बगल में लगे एक युवा जोड़ी के फोटो को लगा कर गीता जौहरी की मर्यादा को ठेस पहुंचाई गयी, उनकी मानहानि की गयी. इसी आधार पर मुक़दमा दर्ज हुआ.

मजे की बात यह है कि मानहानि तो कथित तौर पर गीता जौहरी की हुई है पर एफआईआर उन्होंने स्वयं कराना उचित नहीं समझा. इसके लिए उन्होंने अपने एक मातहत को पकड़ा. इस तरह इन्स्पेक्टर संजय कुमार को अपनी पुलिस कमिश्नर की अखबार में फोटो देख कर ऐसा एहसास हुआ कि कमिश्नर साहिबा का मानमर्दन हुआ है, उनकी मानहानि हुई है. मैंने संजय कुमार से फोन से बात की तो उन्होंने साफ़ कहा कि मैंने एफआईआर तो दर्ज कराया है पर इसके आगे मैं आपसे कोई और बात नहीं कह पाऊंगा. मेरी जुबान बंद है. इस तरह एक बंद जुबान के जरिये गीता जौहरी ने मीडिया की जुबान बंद करने की कोशिश की. यदि स्वयं भी मुक़दमा दर्ज कराया होता तो कुछ ठीक लगता, पर चूँकि वे आईपीएस अफसर हैं इसीलिए मुक़दमा किसी और से लिखवा दिया.

अब देखें इस मुकदमे में कौन-कौन सी धाराएँ लगी हैं. जहाँ तक मैं देख पा रही हूँ आईपीसी की कोई भी गंभीर धारा नहीं है जो इसमें डाल नहीं दी गयी हो. धारा 447, 341, 509, 323, 500, 501, 502, 109, 292 से लेकर 120बी तक. इस तरह अपराध है मात्र गीता जौहरी के डांस करने और उनके फोटो के बगल में एक युवा जोड़ी के सट कर खड़े होने सम्बंधित फोटो प्रकाशित करने का और इसके विपरीत धाराएँ हैं मानहानि से सम्बंधित तमाम धाराओं 500, 501, 502 आईपीसी, किसी स्थान पर जबरिया आपराधिक प्रवेश से जुडी धारा 447, किसी को जबरदस्ती आपराधिक रूप से पकड़ने और रोकने से सम्बंधित धारा 341 और मारपीट की धारा 323. इसके अलावा महिला की अस्मिता पर हमला करने की धारा 509 और अश्लील साहित्य बेचने की धारा 292 भी है. और तो और, इसे आपराधिक षडयंत्र (धारा 120बी) एवं आपराधिक उत्प्रेरण (धारा 109) तक से जोड़ दिया गया है. स्वाभाविक है कि एक सार्वजनिक न्यू ईयर पार्टी में डांस करने की तस्वीर खींच कर उसे अखबार में छापना किसी भी तरीके से कोई आपराधिक कृत्य तक नहीं है, आपराधिक षडयंत्र और आपराधिक उत्प्रेरण तो बहुत दूर की बात है.

मेरा यह मानना है कि पुलिस अथवा राज्य की किसी भी संस्था द्वारा इस प्रकार का कार्य ना सिर्फ निंदनीय है बल्कि इनमें दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई भी होनी चाहिए. ऐसा इसीलिए जरूरी है ताकि शासन-प्रशासन में बैठा कोई भी व्यक्ति ना सिर्फ लोकतांत्रिक व्यवस्था का सम्मान करे बल्कि अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने से पहले वह कई बारे सोचे. मेरा यह मानना है कि गीता जौहरी ने जो कुछ भी किया है यह उनके द्वारा अपनी शक्ति का सीधे-सीधे नाजायज दुरुपयोग है. इसीलिए मैंने गृह मंत्री, भारत सरकार एवं गुजरात के मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर इस प्रकार का अवैधानिक कार्य करने और पत्रकारों को उत्पीडित करने के मामले में उनके विरुद्ध जांच करा कर कठोर दंडात्मक कार्रवाई करने की मांग की है. मेरी निगाह में ऐसा लोकतंत्र और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में सर्वमान्य पत्रकारिता की रक्षा के लिए नितांत आवश्यक है. ऐसी घटनाएँ ही दूसरों का भी मन बढ़ाती हैं जो व्यक्तिगत मद में चूर हो कर लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान करते हैं और अपनी शक्ति का अवैधानिक प्रयोग करते हैं. अतः इनमे से प्रत्येक घटना का कड़ा प्रतिरोध आवश्यक है.

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर, मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत सिविल सोसायटी इंस्टीट्यूट फोर रिसर्च एंड डाक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) की सचिव हैं.

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