फेसबुक पर आज आनलाइन हुआ तो एक अखबारी मित्र ने मैसेज दिया कि चेतन भगत अपनी किताब बेचने के लिए सेक्स का सहारा ले रहे हैं, यकीन न हो तो ये लिंक देखिए. मैंने लिंक देखा तो सचमुच वैसा ही था. एक युवा चेतन भगत की किताब पढ़ रहा है, अपने बेड पर लेटे हुए. तभी एक लड़की आती है. वह उपर नीचे के कपड़े उतारकर नंगी हो जाती है और युवक के बगल में लेट जाती है. लेकिन युवक सब देखकर भी उसे इगनोर करता है और चेतन भगत वाली किताब पढ़ता रहता है. आखिर में दिखाया जाता है कि वह लड़की भी कपड़े पहनकर लड़के के बगल में लेटकर उसके साथ मिलकर किताब पढ़ती जाती है.
वीडियो के अंतिम दृश्य में संदेश आता है कि चेतन भगत की किताब बढ़ेंगे तो सेक्स तक करना भूल जाएंगे. मित्र ने मुझसे पूछा कि क्या साहित्यकारों को अब अपनी किताब बेचने के लिए सेक्स का सहारा लेना पड़ेगा, यह कितना जायज है? मैंने जवाब दिया- भई, बाजार है, सब कुछ बिकता है. किताब भी बेचा जाना है क्योंकि किताब छापने वाली कंपनी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहती है किताब बेचकर. तो, किताब बेचने के लिए उसे कोई तगड़ा बहाना चाहिए. वो किताब के साथ कुछ फ्री देने का विज्ञापन कर सकती थी, लेकिन उसमें उसे वाकई कुछ फ्री देना पड़ेगा जिसकी कीमत कंपनी को अपनी तरफ से अदा करनी होगी.
ऐसे में उसने वही पुराना फार्मूला निकाला. लड़की के सहारे, नारी देह के सहारे किताब बेचो. कुछ उसी तरह जैसे पुरुषों की शेविंग क्रीम से लेकर शेविंग इनस्ट्रुमेंट तक लड़कियों की देह और अदाओं के सहारे बेचा जाता है. पर किताब पढ़ने की तलुना सेक्स करने से करना थोड़ा बेतुका तो है, उसी तरह जैसे हवन सामाग्री किसी पैंटी में लेपटकर बेची जाए. इससे एक कांट्रास्ट, कांट्राडिक्शन, अटपटापन पैदा होता है और यही अटपटापन ध्यान खींचता है और विज्ञापन अगर ध्यान खींच ले जाए तो समझिए माल ग्राहक के दिमाग में चढ़ गया और उसका बिकना अनिवार्य है.
आप भी देखिए चेतन भगत की किताब का विज्ञापन… क्लिक करें….
यशवंत
एडिटर, भड़ास4मीडिया






