जी हां. आजतक न्यूज चैनल की बात हो रही है. इस चैनल ने अपने स्ट्रिंगरों को दुखी कर दिया है. पेट पर लात मारा है. कोई घटना हो तो फौरन सूचना देने की उम्मीद स्ट्रिंगरों से की जाती है, और स्ट्रिंगर इस पैमाने पर खरे भी उतरते हैं, लेकिन जब स्टोरी चलाने की बात होती है तो विजुवल एएनआई एजेंसी का इस्तेमाल किया जाता है. इस कारण स्ट्रिंगरों को कोई पैसा नहीं मिलता क्योंकि पैसे तो तभी मिलेंगे जब उनके विजुवल चलेंगे. तो ये चालाकी की है आजतक न्यूज चैनल. वे अपने स्ट्रिंगरों के विजुवल नहीं चला रहे.
वे एएनआई के विजुवल चला रहे हैं. इस कारण स्ट्रिंगर परेशान हो गए हैं. उन्हें पैसे नहीं मिल रहे. आजतक प्रबंधन ने इस धूर्ततापूर्ण चालाकी से भले ही लाखों रुपये की बचत कर ली हो लेकिन इससे नंबर वन चैनल के स्ट्रिंगर बहुत दुखी हैं. वे कभी इतने बड़े चैनल का स्ट्रिंगर होने पर गर्व करते थे, अब वे इस चैनल का स्ट्रिंगर बने रहने में दुख महसूस कर रहे हैं. आखिर कोई हवा पानी खा पीकर तो जिंदगी नहीं चलाएगा. घर में चूल्हा जलाने और बच्चों की फीस जमा करने के लिए रुपयों की जरूरत होती है. पर आजतक प्रबंधन अपनी टेंट से रुपये निकालने के लिए तैयार नहीं है, इसीलिए उसने एजेंसी को क्रेडिट देते हुए विजुवल चलाना शुरू कर दिया है.
देश भर के कई स्ट्रिंगरों ने भड़ास4मीडिया को फोन करके इस दुखद घटनाक्रम की खबर भड़ास पर डालने को कहा ताकि आजतक प्रबंधन तक यह बात पहुंचे कि उसके मैनेजर पैसे बचाने के चक्कर में चैनल की रीढ़ स्ट्रिंगरों की जिंदगी तबाह कर रहे हैं. उम्मीद करते हैं कि मिस्टर अरुण पुरी इस मसले
पर अपने मैनेजरों को जरूर उचित आदेश देंगे. दुखद बात यह है कि जो चैनल अपने स्ट्रिंगरों को पेमेंट नहीं करता, उनकी स्टोरी नहीं चलाता, वो एक तरह से अपने स्ट्रिंगरों को दलाली करने के लिए मजबूर कर देता है या फिर मान लेता है कि उसके स्ट्रिंगर दलाल हैं और दलाली करके काफी कमा बना लेते होंगे. यही वो स्थितयां हैं जिसके कारण मार्केट में मीडिया की साख बेहद खराब हुई है.
स्ट्रिंगरों को चैनल वाले पैसे नहीं देते हैं, इसी कारण हर जिले में स्ट्रिंगरों ने अपना गैंग बना लिया है और महीने का खर्च निकालने के लिए वे कोई न कोई शिकार पकड़ने पर मजबूर होते हैं. शिकार के जाल में फंसने पर जितने पैसे मिलते हैं, उसे आपस में बांट लेते हैं. लेकिन ढेर सारे स्ट्रिंगर ऐसे भी होते हैं जो इस तरह की हंटिंग, उगाही, शिकार से कोसों दूर रहते हैं. ऐसे ईमानदार स्ट्रिंगरों रिपोर्टरों को ज्यादा संकट उठाना पड़ता है. ऐसी ही स्ट्रिंगरों रिपोर्टरों को लगने लगते हैं कि वे मीडिया में आकर फंस गए हैं, न घर के हुए न घाट के.
यह बेहद निराशाजनक तस्वीर है. चैनल के वरिष्ठ लोग वैसे तो नैतिकता की बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर चुप्पी साधकर एक तरह से प्रबंधन का साथ देते नजर आते हैं. उम्मीद करते हैं कि इस मु्द्दे पर भी टीवी के संपादक बैठकर कोई विमर्श करेंगे और रास्ता निकालेंगे ताकि देश भर में फैले विभिन्न चैनलों के हजारों स्ट्रिंगर पत्रकारिता करते हुए सम्मान की जिंदगी जी सकें.
भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट.





