: भड़ास का संत्रास : 'तीसरी कसम' बहुत बाद में आई. नौटंकी बरसों पहले से थी. 60 के दशक में बीसलपुर (पीलीभीत) की राधारानी नौटंकी तकरीबन आधी यूपी के मेलों में जाती और धूम मचाती थी. उस ज़माने में उसके भी टिकट ब्लैक में बिकते थे. बहुत खूब नाचती थी वो. दाद देने का तब भी एक ही तरीका होता था. नोट वारते थे लोग उस पे. और जिसका भी रूपये दो रूपये का भी नोट आ जाता था तो तब तक राधा रानी उस व्यक्ति का नाम ले ले कर नर्तकियों वाली भंगिमाएं करती रहती थी जब तक उधर से एक नोट और झड़ न जाए. राधा रानी ने कई झाड़े उस ज़माने में. अच्छे अच्छे, तुर्रमखां.
फिर नरेन्द्र चंचल जैसे लोग आये. जगरातों में चढ़ावे आने लगे. और जब कहीं किसी तरफ से दस बीस का भी नोट आया नहीं कि गायक शुरू…चमन दास की अरदास, मैया रानी के दरबार, जोतां वाली के दरबार, मां के शुभ चरणों के पास. ये राग तब तक चलता और चमन लाल जी का चेहरा तब तक खिला रहता है जब तक उस से प्रभावित हो के कोई दूसरा चमन लाल अपने नाम की पर्ची के साथ अगला नोट न भेज दे. नाम की महिमा के साथ नोट चढ़ने का ये सिलसिला जारी रहता है. नाम की बड़ी महिमा है. दस बीस रूपये में दस बीस बार नाम गरज जाए भरी महफ़िल में तो बुरा क्या है? धंधा चलता रहता है. ठरक (आँखिनसेकी) और धर्म आसक्ति भी जब काफी नहीं रही तो धंधेबाजों ने सहानुभूति का सहारा लेना शुरू कर दिया.
कहीं भी देख लो किसी भी बड़े शहर में. एक अपाहिज होता है, सौ उसके जैसे बन के खड़े हो जाते हैं चौराहों पर. उनके हाथ पैरों की पट्टी पे चढ़े रंग और खून में फर्क न कर पाने वाले नहीं जानते कि शाम को वे दानियों से पहले और बढ़िया दारु पीनी शुरू कर देते हैं. गर्दिश फिल्म देखी ही होगी आपने. भिखमंगई का ये धंधा दरअसल उस से भी व्यापक और विकराल है. विकृति की हद तक. मीडिया ने तो इसे तू मुझे संतुष्ट रख, मैं तुझे सुरक्षित रखूंगा की हद तक भुनाया है. आजकल एक वेबसाईट पर दानी सज्जनों के नाम उनके प्रशस्ति पत्र के साथ छापे जा रहे हैं. इस आशय और आशा के साथ कि देखा देखी कुछ और लोग झड़ेंगे. जो कभी मीडिया घरानों को फाड़ देने का दम भरते थे, वे आज उनके पाठकों या प्रताड़ित पत्रकारों को को झाड़ने के काम में जुटे हैं.
शायद देखा हो आपने भी कभी. घरों, दुकानों में कुछ 'गूंगे बहरे' लोग आया करते थे कहीं से किसी भी आदमी की एक बाकायदा छपी हुई चिट्ठी ले कर. इसमें लिखा होता था कि कैसे इस आदमी या औरत का सब कुछ चला गया है. हादसों ने वो हालत की कि सुनने और बोलने की शक्ति भी चली गयी. एक अलग कागज़ पर दस रूपये से लेकर हज़ार रूपये तक की मदद करने वालों के नाम भी होते. जैसे आप से कहा जा रहा हो कि फलां ने हज़ार रूपये तक दे दिये, तुम क्या दस भी न दोगे? कुछ अपने नंगे बच्चे को गोद में उठा कर मांगते. कहते, अपने पैसों से खरीद के कपडा पहनाया तो पहले के सब मर गए. अब इसको तो कमीज़ मांग के ही पहनानी है. भीख के रंग निराले मेरे भैया.
वो हालत आजकल 'भड़ास' सम्राट की है. कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि उन से कहूं कि अपना सारा तामझाम मुझे दे दो. जो तुम्हें कुछ भी लिख भेजे भेजते रहना, छपता रहेगा. सारा खर्च मेरा. सिर्फ दस हज़ार रूपये दे देना. क्यों लाख डेढ़ लाख का खर्च बता कर अपनी ऐसी तैसी हुई जा रही बताये जा रहे हो? हाथ तो फैला ही रहे हो. उसपे पट्टी बाँध के गहरा लाल रंग भी डाल लिया आपने तो! चला भी तो कब तक चलेगा ये सब?
वेबसाईट चलाने का खर्च आप डेढ़ लाख रूपये महीना बता रहे हो. किस हिसाब से?…इसकी चर्चा करेंगे पहले वेबसाईट बिजनेस के फंडे बता दें उनको जिन बेचारों को पता न हो. इनके पास जो टेम्पलेट (प्रारूप) रहा है वो बिलकुल फ्री का है. लायसेंस या कापीराईट के लिए एक पैसा भी नहीं देना पड़ता किसी को. हैक भी वो इसी लिए हो जाता है. अब जो बदला है वो डिजाइन भी फ्री में उपलब्ध है. कमेंट्स भेजने के लिए जो अक्षर टाइप करने पड़ते हैं आपको वो साफ्टवेयर भी इनका तो फ्री का है.
ये मूल रूप से साईट को स्पैम और हैकिंग से बचाने के लिए लगाया जाता है. उसके लिए भी कैप्चा जैसे वो साफ्टवेयर ही सक्षम हैं जिसके सारे के सारे लेटर्स (वर्ण) एक दूसरे से चिपके और एक दूसरे को छुए हुए होते हैं. कोई भी साईट चलाने के लिए आपको ठीक ठाक स्पीड वाला सर्वर चाहिए होता है. ताकि कभी सौ सवा सौ लोग एक साथ भी साईट खोल के बैठे तो साईट हैंग न हो. डिस्क स्पेस भी इतना तो हो कि लेख स्टोर न हो और पेज खुले ही न. इसके अलाव बाकी चाहिए तो स्टाफ. जो लेख आदि को देखे, एडिट करे और छापे.
अब आइये आपको इसका अंकगणित बता दें. एक साथ एक लाख लोगों के साईट पे होने के बाद भी खुल जाने वाली स्पीड वाला और पूरे देश के समस्त अखबारों की सामग्री के बराबर संजो कर रख सकने वाले डाटा स्पेस वाले सर्वर भी बहुत से बहुत छ: हज़ार रूपये महीने में उपलब्ध हैं. उसीमित उपयोग वाले कम्प्युटर के लिए ब्राडबैंड कनेक्शन हद से हद दो हज़ार रूपये में. आप किसी एक दिन के लेख, कमेन्ट गिन लो उनको पढने, एडिट करने के लिए बहुत से बहुत एक आदमी.
तकनीकी देखभाल के लिए वेतनभोगी कर्मचारी कोई नहीं रखता. कभी कोई दिक्कत आ ही जाए तो उसकी फीस एक स्कूटर मैकेनिक से भी कम. तो खर्चा कहाँ है, किस पे है? है भी दे दो मुझे सिर्फ दस हज़ार. साईट कभी हैंग हो जाए तो जिम्मेवारी मेरी. सारे खर्चे मेरे. विज्ञापन जो कोई आये, वो भी तुम्हारा. महीने, दो महीने, साल बाद जब भी चाहो, साईट वापिस ले लेना. चूतिया क्यों बना रहे हो पब्लिक को यार!
नहीं चलता, नहीं बस और बूते में तो बंद करो. समेटो दुकानदारी और बैठो अपने घर. भिखमंगई क्यों कर रहे हो? किसने मजमा कर लिखित अनुरोध किया था आपसे कि आओ, निकालो हमारी भड़ास वरना पेट की गैस हवा में घुल कर पर्यावरण के लिए खतरा बन जाएगी. किस पे एहसान किया था आपने? ये छपास और भड़ास अगर एहसान है तो फिर उसकी कीमत क्यों मांग रहे हो और अगर ये विशुद्ध बिजनेस है तो आप की विफलताओं की कीमत लोग क्यों अदा करें? कहाँ की तुक है कि जिस की जैसी ऐसी तैसी करें आप, नियंत्रण और विज्ञापन रहे आपका और चंदा दें अब लोग.
दरअसल ये चंदा वसूली ही है जो आपको ले के बैठ गई है. आप ने खुद माना है एक जगह कि प्रतिष्ठानों से पैसे मिलने अब बंद हो गए हैं. अव्वल तो अपनी समझ में ये ही नहीं आता कि आप से कहीं ज्यादा पाठकों या दर्शकों वाले मीडिया हाउस पैसे आपको विज्ञापन के बदले में देते होंगे. देते भी हों तो कितने? मुझे याद है कि वायस आफ इंडिया वाले बड़े रोब से कहते थे कि उनके खिलाफ एक लाइन नहीं छप सकती आप के यहाँ. चार सौ से ज्यादा पत्रकारों के पेट पे एक साथ लात मार दी उन्होंने. एक लाइन नहीं छपी कभी आपके यहाँ. मुझे ये यूं पता है कि मैं खुद रेज़ीडेंट एडिटर हुआ करता था वहां और मुझे मालूम है कि मैनेजमेंट आप की तरफ से बेफिक्र क्यों थी.
बात बड़ी साफ़ है भाई. या तो रामनाथ गोयनका बनो. तय कर लो कि मरना है या मार देना है. मुरारी लाल महेश्वरी और डोरी लाल अग्रवाल बनो और बेचो अमर उजाला उनकी तरह सर पे टोकरी रख के आगरे की गलियों में. वेबसाईट भी चलानी है तो अपने दम गुर्दे से चलाओ न. लोगों को वायस आफ इंडिया जैसी बेफिक्री तो दो तुम और हिंदुस्तान टाइम्स के खिलाफ तुम्हारा केस लडें गरीब पत्रकार. ये नहीं होना चाहिए.
पत्रकारों की समस्याएं पहले भी थीं. और उनके भीतर दुष्यंत कुमार की सी आग जब तक है तो वो फिर भी रहेगी. लेकिन उनके मुंह में डाल के प्रतिष्ठानों की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ का खेल अब नहीं चलेगा. इस लिए भी कि आप न लेबर कोर्ट हैं, न पत्रकारों की कोई युनियन. कोई ट्रिब्यूनल या पंचाट भी आप नहीं हैं. आप केवल किन्हीं की बदनामी कर सकते थे. उस मामले में भी लोग अब शेर हो गए हैं. डराने, धमकाने का खेल कभी कामयाब नहीं होता. किसी के खिलाफ कुछ भी लिख भेजने वाले का काम तो उसी दिन ख़त्म हो जाता है जिस दिन आप उसकी भड़ास छाप देते हैं. उसके बाद की भुगतन और उसका भुगतान आप की सिरदर्दी है. एक गलत सोच और कांसेप्ट से अपने आप को इस अवस्था में आपने खुद डाला है. भगवान् के लिए अब अपनी मूर्खता को कुर्बानी का नाम देकर उसका मुआवजा मत मांगो.
मैंने ये सब लिखने से पहले बहुत सोचा. बहुत बार. यकीन करना मुझे बहुत पीड़ा हो रही है. आपने इस देश में वेब मीडिया को एक पहचान दिलाई. हिंदी की लगभग सारी साइटें आपकी देखा देखी आईं. आपको तो आइकान होना चाहिए था. लेकिन भारत में इस न्यू मीडिया को इसकी शुरुआत में गन्दला भी आपने ही किया है. पहले धमकियां दे दे कर. अब भीख मांग मांग कर. वो भी पट्टी और उसपे रंग डाल के. दस हज़ार के खर्चे को डेढ़ लाख और दानियों को राधा रानी की तरह उकसा उकसा के. सच, राधा रानी बहुत सुन्दर थी. भारत में नौटंकी को जन्म देने वालों में. 'चली चली रे गोरी पनियां भरण को' जब स्टेज पे गाती वो तो तो उसका नितम्ब-नृत्य अफ्रीकनो से भी आकर्षक हुआ करता था. राजकपूर ने 'मेरा नाम जोकर' में वो डायलाग भी बहुत बाद में डाला. राधा रानी को देख कर लोग सच में ही अपने घर का रास्ता भूल जाते थे.
लेकिन बताते हैं कि उसने बहुत बुरे दिन देखने के बाद बड़ी बुरी हालत में दम तोडा. वो बिना कुछ गाये, हिलाए बिना ही पैसे मांगने लग गई थी. वो तो गई सो गई. उसके साथ वो नौटंकी भी चली गई जो कभी सिनेमा का सशक्त विकल्प हुआ करती थी.
नैतिकता न हो तो नौटंकी भी बहुत देर तक नहीं चलती..!
मित्रों, मेरी मदद मत करना !
संकल्प तो पहले भी था. आज प्रण भी कर लेते हैं. 'जर्नलिस्टकम्युनिटी' को किसी भी रूप में किसी तरह की सहायता, दान-राशि या भीख नहीं चाहिए होगी. कभी नहीं. और ये न एहसान है. न किसी पे कोई आक्षेप. बात उसूल की है. और इस सिद्धांत का व्यवहार बड़ा साफ़ है. मैं अपनी बात करूं. मैंने जब ये पोर्टल शुरू किया तो दिमाग में सिर्फ एक बात थी. पत्रकारों की यूनियनें तो थीं, अपने भीतर और अपने साथ चलते तमाम विवादों और अंतर्विरोधों के साथ. मगर खुद उनके भीतर भी आपसी तालमेल की कोई समझ या व्यवस्था नहीं थी. मैंने देखा कोई भी एक यूनियन (या संस्था) अपने किसी भी सदस्य को लगभग वैसी ही सोच वाली किसी दूसरी संस्था के साथ संपर्क रखने देना नहीं चाहती थी. यूं देखा कि पत्रकारों में आपसी कोई संपर्क है भी तो न के बराबर है. ये सब दिमाग में चल ही रहा था तो एक दिन सर्फिंग के दौरान अचानक एक की-वर्ड हाथ लग गया, जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम…
उन दिनों मैं किसी के भी निधन के उपरान्त शोक सभा की सूचना देने के लिए महंगे अखबारी विज्ञापनों के विकल्प के रूप में कोई इंटरनेटी व्यवस्था खोज रहा था. rasamkirya.com, antimardas.com और shraddhaanjali.com उसी खोज का परिणाम थे. सोचा लगे हाथ पत्रकारों के लिए एक सोशल नेटवर्क भी बना दूं. क्या पता किसी दिन दुनिया भर के पत्रकार एक दूसरे से बतियाने लगें. इसके लिए इस साईट पे चैट की व्यवस्था भी कर दी. अब कोई साल भर से ये सभी साइटें चल रहीं हैं. पैसे हम शोकसभा की किसी उस सूचना के लिए भी नहीं लेते जो अखबारों में लाखों रूपये दे के छप पाती हैं. और किसी के प्रति श्रद्धांजलि के दो शब्द पैसे देकर भी कहीं नहीं छप पाते.
लेखन में पाठक अंतिम ग्राह्य है. और अब तीस साल से अखबारों और टीवी में काम किये होने से अपना अनुभव ये कि पाठक (या दर्शक) को पा लेना ही पूँजी है, खुद पाठक नहीं. पाठक तो अंतिम ध्येय है. उसे पा लिया तो फिर सब अपने आप आने लगता है. प्रसार भी. विज्ञापन भी. और वो नहीं है तो इसकी कीमत पाठक को नहीं चुकानी चाहिए. इसे अखबार के सन्दर्भ में देखें. मालिक को प्रेस नोट भेजने वालों से पैसे नहीं लेने चाहिए. वे विशुद्ध कारोबारी हों तो भी नहीं.
आप फिर भी ले लें उसी के साथ या बाद में विज्ञापन के रूप में तो भी चलो कोई गनीमत है. मगर सम्पादक के नाम पत्र या शिकायत भेजने वाले पाठकों से पैसे तो क्यों लोगे? अगर आप अपने कंटेंट या रणनीति से अपने अखबार को व्यावसायिक रूप से सफल नहीं कर पा रहे हो तो इसकी कीमत पाठकों से क्यों वसूल की जानी चाहिए? अखबार पाठकों के लिए एक मंच तो हो सकता है. पाठकों को शोषित या इमोशनली ब्लैकमेल करने का माध्यम नहीं होना चाहिए.
पंजाब में 'नवां ज़माना' नाम से के अखबार होता था कभी कामरेडों का. कभी कामरेड रामकृष्ण नाम के एक मुख्यमंत्री भी हुए उनके पंजाब में. आज शायद उसकी पांच सौ कापियां भी नहीं छपतीं. लेकिन कभी किसी मजदूर रैली में बोरी बिछा के उसके लिए पैसे इकट्ठे नहीं किये गए. उस अखबार में काम करने वाले लोग आज भी अपनी मर्ज़ी से, बिना तनख्वाह के काम करते हैं. पंजाब में राज या कांग्रेसी करते हैं या अकाली. अकालियों की 'अकाली पत्रिका' की हालत भी 'नवां ज़माना' से बेहतर नहीं है.
मगर कभी अकालियों ने उसके लिए कोई चंदा इकठ्ठा नहीं किया. नेशनल हेराल्ड के लिए कभी कांग्रेस नहीं गिड़गिड़ाई किसी के आगे. न खुद राजीव गाँधी के नाम को आगे बढाने के लिए 'कांग्रेस वीकली' और 'कांग्रेस साप्ताहिक' मंदी या बंदी से बचाने के लिए किसी कांग्रेसी ने कोई अपील की. अपनी सरकार, अपनी पार्टी या खुद अपनी तारीफ़ के लिए आये न्यूज़ चैनल तिल तिल कर मर रहे हैं. मगर कभी किसी ने दर्शकों से नहीं कहा कि हम तो जा रहे हैं, अब तुम आ के चला लो…सच बात तो ये है कि कोई छोड़ कर जाता भी नहीं. जाएगा तो अपनी चवन्नी की लागत के चालीस गिन के जाएगा.
विशुद्ध अर्थशास्त्र के हिसाब से भी देखें तो लाभ या हानि उद्यमी की खुद है. घाटे के लिए ग्राहक या बाज़ार जिम्मेवार नहीं है. आप से चलता है तो चलाओ अपना ढाबा. नहीं चलता तो ये नहीं कह सकते आप ग्राहकों से कि अपना लाओ, खुद छीलो, भूनो और चबाओ मुर्गा. तंदूर हम छोड़े जा रहे हैं. बात मीडिया की हो या न्यू मीडिया की. औकात और आमदनी तो कंटेंट तय करेगा. पचास हज़ार प्रतियां छपती न हों आपकी मगर अगर 'ब्लिट्ज' हैं आप तो करंजिया कहलायेंगे और पूरे देश के किसी भी बड़े या छोटे शहर में दूसरे अंग्रेजी अखबारों से अधिक बेशक न बिकते हों आप, मगर 'इंडियन एक्सप्रेस' हैं तो फिर देश की व्यवस्था तो आप ही तय करेंगे. कंटेंट ही नहीं है तो फिर भले ही आगरा का बसंत प्रकाशन हो जाइए आप. लोगों को इन्द्रलोक के सपने दिखाइये और खुद स्वर्गवासी हो जाइए.
आप कैसे कह सकते हैं किसी से कि मैंने तेरी गालियाँ भिजवाईं सब तक अब मेरे पिटने की बारी आई, तू बचा. किसने कहा था कि वो सब छापो जो सिर्फ छपने तक के लिए था. न पढने के लिए, न समझने के लिए और वो न छपता तो कोई अनर्थ हो जाता. अखबारों में, पत्रिकाओं में भी बहुत लोग बहुत कुछ लिख कर भेजते हैं छपने के लिए. तय तो खुद ही करना पड़ता है कि क्या उचित, क्या शोभनीय, क्या पठनीय और क्या सन्दर्भयुक्त है. लोग तो आएँगे, जो कहना, बकना है कह, बक कर चले जाएंगे. वो तो आएँगे. भड़ास निकालेंगे. भड़वा कर बना कर चले जाएंगे. कोई पलट के न पूछेगा कि उसकी लिखती से जो कोर्ट कचहरी आप पे टूटी उसके लिए वकील की फीस उस से ले लो.
चलिए बहरहाल, औरों की और जानें. अपन को कोई पैसा नहीं चाहिए. न अब. न फिर कभी. वैसे भी अपनी तो छ: साइटें चलती हैं. इतनी बढ़िया स्पीड वाले सर्वर के साथ कि एक लाख लोग एक साथ खोलें तो भी जाम न हो. और डाटा स्पेस भी इतना कि हिंदी का सारा साहित्य समा जाए. और खर्च आता है, कुल दस हज़ार रूपये. बस सोच का फर्क है. किसी को अपने काम के लिए भी दूसरों का निवेश चाहिए वो भी आवश्यकता से कहीं अधिक. अपनी सोच ये कि सोच ही बदल लेनी पड़ेगी. या तो सोशल नेटवर्किंग में जाओ मत. जाओ तो वो सर्विस ओरिएंटेड हो. गाली गलौज के लिए किसी को अपना मुंह न दो. समाज को कोई तो सर्विस दो. थोडा सब्र करो. ये इंडस्ट्री है तो एक दिन आज की लागत बहुत बड़े लाभ लाएगी. दाम के रूप में भी, और नाम धाम के रूप में भी.
लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. दैनिक जागरण समेत कई संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. इन दिनों न्यू मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनका यह लिखा उनके पोर्टल से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.
जगमोहन फुटेला के इस लिखे पर भड़ास के एडिटर यशवंत का लिखा जवाब पढ़ें-





