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फुटेला जी, आप ‘गरियाना’ जारी रखें, और मैं ‘भीख’ मांगना

जगमोहन फुटेला से मेरी मुलाकात या देखादेखी नहीं है. जब वो दैनिक जागरण से केस लड़कर जीते थे, ये कुछ बरस पहले की बात है, तो उन्होंने मुझे फोन किया था, या मेल किया था अपनी स्टोरी, ठीक से याद नहीं, तब उन्हें मैंने एक लड़ाकू योद्धा के रूप में माना. और आज भी मानता हूं. अक्सर लोग अखबारों के प्रबंधन को बहुत ताकतवर मानकर अपने मारे गए हक की मांग करने से डर जाते हैं और चुप बैठ जाते हैं लेकिन जगमोहन फुटेला ने ऐसा नहीं किया. वे कोर्ट में गए और कई बरसों की तपस्या के बाद जागरण को हराकर ही माना. (पढ़ने के लिए क्लिक करें- फुटेला ने कोर्ट में जागरण को हराया …और… गोल्डन शेक हैंड चाहते थे संजय गुप्ता)

जगमोहन फुटेला से मेरी मुलाकात या देखादेखी नहीं है. जब वो दैनिक जागरण से केस लड़कर जीते थे, ये कुछ बरस पहले की बात है, तो उन्होंने मुझे फोन किया था, या मेल किया था अपनी स्टोरी, ठीक से याद नहीं, तब उन्हें मैंने एक लड़ाकू योद्धा के रूप में माना. और आज भी मानता हूं. अक्सर लोग अखबारों के प्रबंधन को बहुत ताकतवर मानकर अपने मारे गए हक की मांग करने से डर जाते हैं और चुप बैठ जाते हैं लेकिन जगमोहन फुटेला ने ऐसा नहीं किया. वे कोर्ट में गए और कई बरसों की तपस्या के बाद जागरण को हराकर ही माना. (पढ़ने के लिए क्लिक करें- फुटेला ने कोर्ट में जागरण को हराया …और… गोल्डन शेक हैंड चाहते थे संजय गुप्ता)

ऐसे लोग पत्रकारिता में कम होते हैं जो अपनी लड़ाई भी उतने ही शान के साथ लड़ते हैं जितनी दूसरों की. भड़ास के खिलाफ जगमोहन फुटेला जी ने भड़ास निकालकर एक और बड़ा काम किया है. इसके कारण मेरी नजर में उनकी छवि और ऊंची हुई है. इसके बहाने दरअसल उन्होंने न्यू मीडिया को लेकर चल रही बहस को आगे बढ़ाया है. न्यू मीडिया के मॉडल को लेकर आशंकाओं और चिंताओं को शब्द रूप दिया है, भड़ास के उदाहरण के जरिए. भड़ास को लेकर 'मित्रों मेरी मदद मत करना' शीर्षक से पहली पोस्ट लिखी थी फुटेला ने. अपनी साइट पर उन्होंने इसे प्रकाशित किया और कई लोगों को शीर्षक व लिंक मेल किया, मुझे भी. मैंने उसे पढ़ा तो बहुत कुछ अमूर्त लगा.  कुछ इस अंदाज में लिखा उन्होंने कि… भाई मुझे तो जरूरत नहीं पड़ेगी मांगने की, आप मांग रहे हो तो शायद ठीक नहीं कर रहे हो, फिर भी देख लो… टाइप की भावना उनके लिखे से आ रही थी. उस अमूर्त लेखन को छापना या उसका जवाब देना उचित नहीं समझा क्योंकि एक तो वह लिखने के लिए जबरन लिखा गया लगा. दूसरे, जब तक आपके लिखे में सवाल आरोप क्लीयर न हों, आपकी बात टू द प्वाइंट न हो, उसका जवाब देने की कोशिश करना अपना वक्त खराब करना होता है.

और, इस लोकतंत्र में, इस न्यू मीडिया की दुनिया में जहां कि हर ब्लागर, हर ट्विटर वाला, हर फेसबुक एकाउंटधारी खुद में एक मीडिया मालिक है, अपनी बात रखने और हजारों लोगों तक तुरंत पहुंचा देने वाला, आप यह नहीं तय कर सकते कि कब कौन क्या किसलिए किसके खिलाफ लिख देगा. दरअसल न्यू मीडिया ने मीडिया का जो घनघोर विकेंद्रीकरण किया है, उसका यह सदपरिणाम है, जो कइयों को खराब लगता है, अपन की कांग्रेस सरकार तक को, और बहुतों को बहुत अच्छा, कि अब कहीं रोके दबाए कुछ न रुकेगा, बात है तो निकलेगी, बात नहीं भी है तो भी निकलेगी.

जगमोहन फुटेला जी ने दूसरा पार्ट भी लिखा. भड़ास का संत्रास. यह ज्यादा स्पष्ट और टू द प्वाइंट लगा. हालांकि इन्होंने इंट्रो समेत तीन चार पैरे में जो वर्णन किए हैं, वो उनकी अपनी पत्रकारीय मेधा, शब्द कौशल और अंदाजे बयां है. जिसके लिए मैं उनका कायल भी हूं. पर उनका लिखा पढ़कर मुझे कुछ आरोप जो मोटामोटी समझ में आए वो ये कि भड़ास के खर्चे बहुत कम हैं, इसे बढ़ा चढ़ाकर पाठकों को बताया जाता है, और इस बहाने जो भिखमंगई की जाती है वह सरासर गलत है. और ये भी कि किसने कहा था आपको कि आप ये सब करिए और भीख मांगिए. जगमोहन जी वरिष्ठ पत्रकार हैं. शब्दों के धनी है. भीख मांगने के दर्जनों तरीके बताए गिनाए हैं उन्होंने, और उससे भड़ास को कनेक्ट करते हुए बताया है कि ये भी एक तरह की इमोशनल ब्लैकमेलिंग है, उसी तरह का अत्याचार है, वैसा ही धंधा है. ये भी कहा उन्होंने कि भड़ास वाले किसी संस्थान से पैसा लेकर उस संस्थान को सुरक्षित कर देते हैं और किसी से संस्थान से टकराव लेने पर हुए मुकदमों के लिए भीख चंदा मांगते रहते हैं, जो कि गलत है, दोगलपान टाइप है.

ये सारी बातें घुमा फिराकर कई बार उठती रही हैं और उनके बारे में मैं लिखता भी रहा हूं. आज एक मौका फिर है अपनी बात रखने का. यह बहस व बातचीत इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके जरिए न्यू मीडिया से जुड़े लोगों के दिमाग के जाले साफ होते रहते हैं, समझ अपग्रेड होती रहती है, पारदर्शिता बनी रहती है. ऐसे सवाल समय समय पर उठते रहना चाहिए. मैं कोई टीवी या अखबार का संपादक तो नहीं कि अपनी आलोचना से डर जाऊं, भयभीत हो जाऊं, चुप्पी साध लूं. भड़ास ने मुझे बहुत बदला है. इतना बदला है कि सच झूठ राग द्वेष निंदा प्रशंसा से उपर उठने लगा हूं. बाबा टाइप चीज होने लगा हूं. सच में. यह महसूस करता हूं.

मेरा वादा है कि भड़ास को लेकर अगर सवाल कहीं पर उठेगा तो उसे भड़ास पर भी प्रकाशित किया जाता रहेगा ताकि भड़ास के पाठकों का इस मंच पर भरोसा और इस मंच की पारदर्शिता पर भरोसा बना रहे. लाखों मीडियावालों, पाठकों, नेटयूजर्स का भड़ास पर जो भरोसा है, इस मंच की निष्पक्षता पर जो भरोसा है, वही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है और वही मेरी ताकत है. यही कारण है कि जगमोहन फुटेला जी जैसे सैकड़ों पत्रकारों को अपनी लड़ाई की विस्तृत खबर प्रकाशित करवाने के लिए भड़ास को माध्यम बनाना पड़ता है और भड़ास बिना किसी स्वार्थ के हर संघर्षशील साथी को अपना कंधा प्रदान कर उसकी लड़ाई को, उसकी सफलता को, उसकी पीड़ा की आवाज को नई उंचाई तक, देश-विदेश तक ले जाता है. पहले भी भड़ास के खिलाफ भड़ास पर बहुतों की भड़ास छपी है, आगे भी छपता रहेगा. ये गारंटी है मेरी.

जगमोहन फुटेला जी के दर्जनों लेख समय समय पर भड़ास पर छपते रहे हैं. उनके पोर्टल का एक विज्ञापन बेहद सस्ते में, मात्र दो हजार रुपये में भड़ास पर प्रकाशित किया गया था. हालांकि हम लोग कोई भी विज्ञापन न्यूनतम दस हजार रुपये साप्ताहिक के दर से कम में प्रकाशित नहीं करते हैं, लेकिन फुटेला जी ने दो हजार कहा तो दो हजार को लॉक कर दिया, क्योंकि एक तो पैसे को लेकर बारगेनिंग की कला अभी बहुत नहीं आती, करते करते थोड़ी मोड़ी आने लगी है. जल्द ही ज्यादा सीख जाऊंगा क्योंकि अब भड़ास नए स्टेज में पहुंचने वाला  है. दो अलग अलग ग्रुप भड़ास में निवेश के लिए बातचीत कर रहे हैं. जाहिर है, जल्द ही भड़ास फर्म से प्राइवेट लिमिटेड में तब्दील होने वाला है और उसके निदेशक मंडल में कई लोग होंगे. सौदा अब तक हो चुका होता, लेकिन अपन उदासीन संप्रदाय के आदमी हैं इसलिए ऐसे कामों को टालते रहने में सैडिस्ट किस्म की खुशी मिलती रहती है. दूसरे, दो हजार में इसलिए भी प्रकाशित कर दिया कि मुझे निजी तौर पर उन लोगों का सपोर्ट करने में आनंद आता है जो लड़ रहे होते हैं, न्यू मीडिया में कुछ नया कर रहे होते हैं. लेकिन यहां बस ये ध्यान रखने वाली बात है कि न्यू मीडिया माने बालीवुड की चटपटीमसालेदार खबरें छापना नहीं होता.

न्यू मीडिया माने वो खुलासे करना होता है जिसे पारंपरिक मीडिया और सत्ता तंत्र बाहर नहीं आने देना चाहता. इस पैमाने पर अगर देखूं तो हिंदी में गिनने लाइक एक दो तीन साइटें मुश्किल से मिलेंगी. लेख आलेख विश्लेषण छापना एक बात है, जिसे बहुत लोग छापते रहते हैं. और आजकल लेखक भी अपना लिखा एक दो नहीं बल्कि दर्जनों जगह ग्रुप में मेल कर देते हैं, जिसे छापना हो छापो के अंदाज में. हर कोई आलोक तोमर नहीं होता और हर वेबसाइट विकीलीक्स नहीं होती. मैं खुद को आलोक तोमर नहीं मानता और न ही भड़ास को विकीलीक्स मानता हूं. मैं बस इतना जानता हूं कि भड़ास ने अपनी यात्रा में अब तक जो कुछ किया है और करने का माद्दा रखे हुए है, वह भारत में न्यू मीडिया के जिक्र के दौरान सम्मान के साथ दर्ज किया जाएगा. अभी एक छात्र का फोन आया था दिल्ली के किसी कालेज या विश्वविद्यालय से. उसने जो प्रोजेक्ट रिपोर्ट सौंपी है रिसर्च के लिए उसमें भड़ास को विषय बनाया है और उसका प्रोजेक्ट रिपोर्ट ओके हो गया है. मैं तो फूल कर कुप्पा हो गया. जीते जी रिसर्च का विषय बन गया भड़ास और मैं. उस बालक ने ढेरों सवाल भेजे. उसके जवाब व लिंक मैंने उसे भेज दिया.

बात फुटेला जी के लिखे की कर रहा था. उन्हें और अपने पाठकों को मैं भी एक किस्सा बताना चाहूंगा. इलाहाबाद आईएएस बनने के उद्देश्य से बीए करने मैं गया हुआ था. तीन साल की बीए की पढ़ाई के बाद मैं वहां से सीपीआईएमएल लिबरेशन का होलटाइमर बनकर निकला. भगत सिंह को आदर्श मानते हुए. गांव गांव ढपली बजाते और गाते हुए हम लोगों की एक गायन टीम घूमा करती थी. गाजीपुर के जमानियां विधानसभा क्षेत्र में मेरा गांव पड़ता है. उस सीट से इंडियन पीपुल्स फ्रंट से कामरेड डाक्टर सलाउद्दीन विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे. तब विनोद मिश्रा के नेतृत्व वाली सीपीआई एमएल लिबरेशन अंडरग्राउंड हुआ करती थी और संसदीय राजनीत में उसका प्रतिनिधित्व इंडियन पीपुल्स फ्रंट किया करता था. जमानियां विधानसभा के गांव गांव में हम लोग,  दस्ता की टीम, गाते बजाते ललकारते घूमती रहती थी. एक बार मैं अपने गांव गया तो पिता जी बोले कि ये साला यशवंतवा गया था इलाहाबाद आइएएस बनने, देखो इसका रूप, चमारों के बीच ढपली बजाकर भीख मांगता घूमता रहता है. तब हम लोग आईपीएफ प्रत्याशी को जिताने के लिए वोट और नोट, दोनों देने की बात करते थे. जो पार्टियां कारपोरेट से चंदा नहीं लेतीं और जिनके कार्यकर्ता दलितों मजलूमों के बीच दिन रात रहकर उनके लिए लड़ते मरते रहते हैं, उन्हें नोट भी वही जनता ही देती थी, और देती है.

मुझे पिता जी के ताने से बड़ा गुस्सा आया. उनकी समझ पर तरस आया. उनकी सामंती सोच को बेहद घटिया और बेवकूफी भरा मानकर मैंने कुछ दिनों के आंतरिक दुख के बाद स्वाहा कर दिया. ये लोग नहीं सुधरेंगे, वाले अंदाज में उन्हें उनकी सोच मुबारक, मुझे मेरा काम रास आया मानकर मैं अपने राह पर बढ़ चला. बाद में पार्टी की तरफ से मुझे बीएचयू में पार्टी प्रभारी बनाकर भेज दिया गया. वहां क्या क्या हुआ, वो सब लंबा और अलग से लिखने लायक है. उस पर फिर कभी. फिलहाल यह कि जिस बीएचयू में पढ़ा, उस बीएचयू को स्थापित करने वाले पंडित मदन मालवीय को भी बड़ी तकलीफ हुई थी. वो चंदा मांग कर पैसे इकट्ठा कर रहे थे बीएचयू बनाने के लिए. जिन्हें देना होता वो दे देते लेकिन कई लोग ऐसे भी उनको मिलते जो घंटों बैठाए रखते, बार बार बुलाते पर देते एक भी दमड़ी नहीं, उल्टे लेक्चर लंबा सुनाते, उपदेश ढेर सारा दे देते. लेकिन उससे पंडित जी ने बीएचयू बनाने का सपना नहीं छोड़ तोड़ दिया. वे लगे रहे अपने मिशन पर.

भीख मांगने, चंदा मांगने में फर्क नहीं भी है और बहुत सारा फर्क भी है. बस केवल सोचने की बात है. बस केवल चेतना व समझ के स्तर की बात है. मेरे पिता जी ने भी मुझे यही कहा था कि ये ढपली बजा बजा कर भीख मांगता रहता है. इलाहाबाद रहा हो या गाजीपुर, हम लोगों की सांस्कृतिक टीम ने नुक्कड़ नाटकों के बाद हमेशा गमछा फैला कर, ढपली आगे कर लोगों से सहयोग लिया. कुछ कहने वाले इसे भीख मांगना भी कहते और कुछ लोग सहर्ष दे भी देते. छात्र संगठन आइसा के आयोजनों, पार्टी के सम्मेलनों के लिए भी समय समय पर चंदा मांगते रहना पड़ता था. मतलब ये कि जब एक आदमी को पता है कि वह अब किसी एक परिवार का नहीं बल्कि समाज का दायित्व है तो उसका जीवन, उसका खाना पीना उस समाज का दायित्व बनता है. समाज में हर तरह के लोग होते हैं. फ्यूडल सेंटीमेंट वाले भी और डेमोक्रिटक रेशनल लोग भी. कोई देगा, कोई नहीं देगा. कोई गरियायेगा, कोई तारीफ करेगा. लेकिन कामरेड का काम, क्रांतिकारी का काम आलोचनाओं से रोने लगना और तारीफ से फुलकर कुप्पा हो जाना नहीं होता, वह तो आगे बढ़ता रहता है.

मैं अब न कोई कामरेड हूं और न क्रांतिकारी. मैंने भड़ास की शुरुआत किसी क्रांति के लिए नहीं की थी, सिर्फ अपनी भड़ास निकालने और मीडिया के लोगों की आवाज को मंच देने के उद्देश्य से की थी. लेकिन लोग मिलते गए और कारवां बनता गया. खबरें आती गईं और बिना डरे बिना झुके छपती गईं. इस प्रक्रिया में कई लोगों से दोस्ती भी हुई. जिस वीओआई का जिक्र फुटेला जी ने अपने लेख में किया है, उस वीओआई के पतन के बारे में एक कारण भड़ास को बताया जाता है. अमित सिन्हा जब आए तो उनसे एक मुलाकात हुई और उन्होंने खुद को पत्रकार टर्न्ड उद्यमी बताया. उनके बातचीत और स्वभाव से बहुत लोग प्रभावित हुए थे, मैं भी हुआ. उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की कि वीओआई अब एक नई उंचाई पर जाएगा, आप सपोर्ट करिए. मैं कोई जल्लाद तो हूं नहीं. मैंने एवमस्तु कहा.

लेकिन जब अमित सिन्हा के दौरान भी हालात बिगड़ने लगे तो मुझे याद है कि उनके खिलाफ खबरें, लेख आदि छपने लगे. देहरादून वाले सुभाष गुप्ता का लेख मुझे अभी तक याद है जिन्होंने पैसे मारे जाने और वीओआई के पतन के वास्ते लिखा था. कई और लोगों ने भी लिखा. वीओआई में अमित सिन्हा के आखिरी दिनों में वीओआई को लेकर मधुर मित्तल और अमित सिन्हा के बीच कोर्ट कचहरी की खबरें सिर्फ भड़ास पर छपा करती थीं. बाद तक भी वीओआई की दशा-दिशा को लेकर सूचनाएं छपती रहीं. अब फुटेला जी ने खुद वीओआई के खिलाफ कुछ नहीं लिखा, तो इसमें मेरी गलती नहीं. उन्हें अपनी सेलरी पसंद थी, इसलिए सब गलत देखकर भी वो चुप रहे. मैं तो हवा पानी खा पीकर जीता रहता हूं इसलिए मैं वीओआई के खिलाफ आखिर तक जो भी सच रहा, उसे छापता रहा. फुटेला जी को अगर याद हो तो वो बता दें कि उन्होंने वीओआई के खिलाफ क्या लिककर मेरे पास भेजा था, और नहीं छपा. मैं उन्हें दर्जनों खबरें दिखा दूगा जो अमित सिन्हा के खिलाफ छपी हैं.

मैं अब बता देता हूं कि भड़ास का खर्चा कितना है. मेरा और मेरे परिवार का महीने का खर्च पचास हजार रुपये है. कैसे है, इसे फुटेला जी कहेंगे तो बता दूंगा. दाल चावल चीनी गैस स्कूल दारू मांस पेट्रोल किराया सबका डिटेल दे दूंगा. पच्चीस हजार रुपये मेरे कंटेंट एडिटर को मिलते हैं. हिंदी प्रदेशों के कई राजधानियों में कुछ एक पत्रकारों को पांच पांच हजार रुपये महीने देता हूं. होस्टगेटर की पुणे स्थित भारतीय शाखा से साइट के लिए डेडीकेटेड सर्वर लिया है जिसका महीने का खर्च अट्ठारह हजार रुपये आता है.

पहले यही सर्वर पगमार्क चंडीगढ़ से लिया था तो महीने के तीस हजार रुपये से ज्यादा आते थे. साइट के जो तकनीकी पक्ष को देखते हैं उन्होंने महीने का हजार रुपये देता हूं. साल भर मिलाकर बारह हजार रुपये. आफिस, फोन, नेट, मोबाइल, तीन ट्रेनीज, आफिस असिस्टेंट आदि मिलाकर महीने का डेढ़ लाख से दो लाख रुपये पड़ता है. अभी मैंने अपने कार की बकाया किश्त भी अदा की है, डेढ़ लाख रुपये से ज्यादा देकर. मैंने आम्रपाली के प्रोजेक्ट में दो बेडरूम का एक फ्लैट भी बुक करा रखा है. मैं अपने घर अपनी मां और अपने बड़े भाई को गाहे बगाहे पैसे भी देता रहता हूं. मेरी और मेरी पत्नी के नाम से एलआईसी है, उसकी किश्त भी देता रहता हूं. कह सकते हैं कि आप क्रांतिकारी हैं तो क्या जरूरत है मकान लेने की, कार पर चलने की, दारू पीने की, मांस खाने की, बीमा कराने की, मां-भाई को पैसे देने की… पर मैं इसे जरूरत मानता हूं.

इसलिए जरूरत मानता हूं क्योंकि मैं भीख मांगने के लिए भिखमंगा वाली मुद्रा धारण करना पसंद नहीं करता. हां, जब भड़ास शुरुआत किया था तब मैं जरूर भिखमंगे वाली हालत में था. तब मैंने कोई भीख नहीं मांगी थी. शुरुआती एक साल बेहद परेशानी वाले गुजरे. घर में राशन कैसे आएगा, यह संकट बना रहता था. तब भी मैं दिन भर काम करता और रात में दारू पीकर काम करता. तब मैंने जो कुछ शुरू किया था, उसके आधार पर किसी से पैसे नहीं मांग सकता था. लेकिन आज मैं कह सकता हूं कि यह एक ऐसा मंच बन गया है जो प्रतिदिन साढ़े पांच लाख हिट्स पाता है. यकीन न हो तो कभी दिल्ली आइएगा तो साइट का कंट्रोल पैनल खोलकर दिखा दूंगा. एलेक्स रैंकिंग में हम लोग वहां पहुंचे जहां पहुंचने के लिए कारपोरेट कंपनियां अपनी साइटों पर कई करोड़ रुपये खर्च कर दिया करती हैं. दर्जनों बार सर्वर बदले क्योंकि सर्वर के झांसे के खेल में कई बार ठगा गया, फंस गया लेकिन उससे निकलते और बेहतर सर्वर की खोज करते हुए आगे बढ़ता रहा.

उपर मैंने बात की थी कि भड़ास अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनने की तैयारी में है. तब भड़ास का महीने का खर्च डेढ़ दो लाख नहीं रहेगा. पांच लाख से उपर चला जाएगा. आफिस किसी कनाट प्लेस जैसी जगह में लेंगे हम लोग. हर स्टेट कैपिटल में घोषित तौर पर आफिस व आदमी रखेंगे. तब भी पांच लाख रुपये महीने पाने के लिए कोई उगाही नहीं करेंगे क्योंकि जो निवेशक पार्टनर बनने जा रहे हैं, उनसे इसी बात पर सहमति है कि वे पैसे तो खर्च करेंगे लेकिन रेवेन्यू लाने के लिए कोई दबाव नहीं डालेंगे. रेवेन्यू के लिए कोई मार्केट ओरियेंटेड प्रिंट की मैग्जीन निकालेंगे जिससे सरकारी विज्ञापन आदि लेकर खर्च निकाल सकें. बिजनेस प्लान खोलकर बता रहा हूं क्योंकि मन में कोई छल नहीं दुराव नहीं साजिश नहीं.

फुटेला जी, आप अपनी एक दो तीन नहीं दर्जनों साइट बना लीजिए और चलाते रहिए, किसी से मत मांगिएगा. बड़ी अच्छी बात है. ये आपकी सोच है और आपकी स्टाइल, जिसकी मैं कद्र करता हूं. मैं ये नहीं कहूंगा कि अगर आपमें दम है तो आप अपनी दर्जनों साइटों में से किसी एक को भड़ास के बराबर रैंकिंग में लाकर दिखा दें, भड़ास जैसे खुलासे और तेवर बनाकर दिखा दें, मैं सिर्फ ये कहूंगा कि न्यू मीडिया अभी शैशव काल में है और इसका कोई एक मॉडल डिफाइन नहीं है कि ऐसे ही चलेगा. तो, लोग अपने अपने हिसाब से प्रयोग करते रहेंगे. कोई आपके शब्दों में भीख मांगेगा, तो कोई अपनी पत्नी के गहने बेचकर चलाएगा तो कोई समझौते करके धन उगाहेगा तो कोई ब्लैकमेलिंग करके पैसे बनाएगा, कोई ब्लाग बनाकर बिना किसी से लिए अपनी बात कहेगा, तो कोई फेसबुक और ट्विटर को अपना माध्यम बनाकर फ्री में अपने सुख दुख को बयान करेगा.

हर माध्यम व तरीके के अपने खतरे हैं और अपनी अच्छाइयां हैं. कहने वाले कहते हैं कि जिस दिन गूगल ने अपने ब्लाग पर फीस लगा दी तो क्या होगा? कहने वाले कहते हैं कि गूगल के सर्वर पर जो डाटा है वो अमेरिकी कंपनी गूगल का है, उसी का कापीराइट है, जिस दिन उसने डाटा देने से मना कर दिया, उस दिन क्या करेंगे, जिस दिन उसने आपके कंटेंट को गैरकानूनी करके डिलीट कर दिया उस दिन क्या होगा. और यह सब हो भी रहा है. फेसबुक पर पत्रकार कुमार सौवीर ने एक न्यूज पोस्ट का लिंक दिया और फेसबुक ने उसे आपत्तिजनक मानते हुए डिलीट कर दिया. क्या कर लेंगे आप फेसबुक का.  

अपनी जमीन बनाकर रखना बहुत जरूरी है. और इस प्रकिया में ही हम लोग सीखते हैं. आने वाला समय साइबर का है. कंटेंट पर कापीराइट की मारामारी होने वाली है. सरकारों के दबाव में साइटें बैन की जाएंगी. शुरुआत हो चुकी है इसकी. कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की वेबसाइट को मुंबई पुलिस ने बैन कर दिया.  कल को भड़ास भी बैन हो जाए तो कोई बात नहीं. लेकिन हम लोगों के पास अपनी साइट का हर रोज का बैकअप होता है. आज बैन किया तो चौबीस घंटे में नए डोमेन नेम से हम अवतरित हो जाएंगे वही कंटेंट लेकर. भारत में बंद किया तो विदेश से उसे अपलोड करा लेंगे. ये ताकत है अपने काम का. लेकिन कंटेंट तो होना चाहिए पार्टनर. कितने दिन आप भड़ास पर लिखकर या भड़ास के खिलाफ लिखकर अपनी साइटों पर ट्रैफिक ले जाएंगे. ट्रैफिक जाएगा भी तो स्थायी नहीं रहेगा क्योंकि लोग दमदार कंटेंट पढ़ने आते हैं, शाब्दिक लफ्फाजी नहीं.

आप बिना कहीं नौकरी किए, किसी काले धन के स्वामी के अंडर में प्रधान संपादक या सलाहकार बने बिना कहां से हर महीने पैसे लेकर अपनी साइटें चला ले जाते हैं, ये आप जानते होंगे. शायद आपके पिताजी ने बहुत सारा पैसा छोड़ा होगा जो दारू पीने से लेकर साइट चलाने तक के खर्चे आप खुद उठाकर दूसरों को भीख न मांगने की नसीहत दे पा रहे होंगे. लेकिन भइया हम तो बहुत गरीब घर से आते हैं. मां को कभी हजार रुपये भेज देता हूं तो वो बहुत दुवाएं देती है. बड़े भाई ने बेटे का नाम स्कूल से कटाने के लिए कह दिया था क्योंकि उनके पास पैसा नहीं था, सो उसको मैंने आठ हजार रुपये भेजे. चलिए ये तो सिर्फ घर का मामला बता रहा था. अब आपको कुछ और बातें बता ही देता हूं. एक जुझारू पत्रकार साथी ने अपनी कंपनी से इस्तीफा दिया तो उन्होंने कंपनी से मिले लैपटाप को भी जमा कर दिया. मैंने उन्हें अपना एक लैपटाप दे दिया. उनके घर की माली हालत मैं जानता हूं इसलिए नौकरी मिलने तक उनके घर के खाने खर्च के लिए हर महीने पांच हजार रुपये भेजता रहा.

पिछले दिनों एक साथी अचानक ब्रेन हैमरेज के शिकार हुए तो मैं फौरन जहाज से उनके शहर पहुंचा और भीख मांग मांग कर उनके इलाज के लिए पैसा इकट्ठा कर दिया. कई साथी हैं जो बेरोजगारी में बेहद मुश्किल से पैसे के लिए मेरे आगे मुंह खोल देते हैं तो उन्हें मैं इच्छित रकम दे देता हूं. भले वे लौटाएं या नहीं. यही नहीं, कई लेखकों को उनके लिखने के एवज में पैसे दिए क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक न होने की बात मालूम हो गई थी. ऐसे एक नहीं दर्जनों किस्स हैं जिसमें मैं लोगों का दिल खोलकर मदद करता हूं क्योंकि अगर मेरे पास पैसा है तो वो मेरा पैसा नहीं है, भड़ास का पैसा है और भड़ास तो ही चूतियापे का नाम. जिस पर दिल आ जाए उसके लिए कुर्बान.

मैंने अपने जीवन में कथित नैतिकता, सामाजिकता, दुनियादारी का बहुत ध्यान नहीं रखा. जो अच्छा लगता है वही करता हूं और लोग उसे कई बार गलत कहते हैं तो उनकी परवाह नहीं करता. लेखक, इतिहसकार, विश्लेषक, आलोचक मेरा जिस भी रूप में विश्लेषण करें, मुझे बहुत फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैंने जीवन को हमेशा अपने अंदाज में जिया है और जीता रहता हूं. अगला प्रोजेक्ट सुन लीजिए. करीब पच्चीस लाख रुपये में भड़ास आश्रम बनाने की योजना है. ये आश्रम बाबाओं वाले आश्रम सरीखा नहीं होगा. अलग सा होगा. यह भी कर के दिखाऊंगा, तब आप जरूर लिखिएगा कि ये पच्चीस लाख रुपये आए कहां से. असल में हर दौर में ऐसे लोग रहते हैं जो दूसरों के जीवन, क्रिया कलाप आदि में घुसकर मीन मेख निकालते बताते रहते हैं. तथ्यों को कई बार वे अपने स्वार्थ व सुविधा व सोच के हिसाब से पेश करते हैं, जबकि वो सच नहीं होते.

फिर भी, यह काम जारी रहना चाहिए क्योंकि दुनिया व समाज लगातार बतियाने लिखने बहसियाने कहने से ही ट्रांसपैरेंट, सुंदर और सम्मानजनक होगी, छिपाने दबाने अंधेरे में रखने से नहीं. आने वाले समय में मेरी भीखमंगई की कई अन्य योजनाएं भी हैं. आश्रम के लिए भी भीख मांगना शुरू कर दिया है. भड़ास को सिस्टमेटिक बनाने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है. जान लीजिए, जब सब कुछ आर्थिक रूप से अच्छा हो जाएगा तब भी मैं भीख मांगता रहूंगा क्योंकि भीख मांगना मेरे लिए उदात्त होने का दर्शन है. यकीन न हो तो मेरी इस पोस्ट को जरूर पढ़ लीजिएगा… मसूरी में भीख मांगते देखे गए यशवंत.

और हां, कुछ और लोगों ने मेरे भिखमंगई के अनुरोध के कारण नोट झाड़े हैं, उनके नाम और चेक आदि के डिटेल भी जल्द छापूंगा. आप मुझे गरियाना जारी रखें, और मैं अपना भीख मांगना. और, हां, मैं ऐसा भिखमंगा हूं कि मैं मदिरा पीता हूं और पीने के लिए भी चाहता हूं कि मेरे पाठक पैसे दिया करें. देते भी हैं. हैदराबाद वाले भरत सागर जी ने मुझे अपने पत्र में हजार रुपये का नोट भेजा था, दारू पीने के लिए, उस नोट से सच में मैंने दारू खरीदकर दो तीन दोस्तों को पिलाया और पिया. समझे फुटेला साहब. यहां थोड़ा मोटा फटा फूटा नहीं है कि सीने की जरूरत पड़े. यहां पूरा का पूरा फटा फूटा है, पूरी तरह पारदर्शी और बिंदास, इसीलिए अपन फटेला-फूटेला-थकेला-अकेला नहीं, मांगेला-धकेला-खाएला-लड़ेला है.

शायद ये आखिरी लाइन आपको चुभ जाए, संभवतः यह बिलो द बेल्ट माना जाए लेकिन बदमाशी करने का मन मेरा भी तो करता है, आपकी ही तरह. और, मैंने आप पर ये तो आरोप लगाया नहीं कि अमित सिन्हा ने मुझे बताया कि आप उनके खिलाफ मुकदमा करके उनसे पैसे मांग रहे थे. झूठी सही खबरें फैला करती हैं फुटेला साहब, सब पर कान देने की जरूरत नहीं होती, भरोसे का रिश्ता सबसे मजबूत रिश्ता होता है. अगर भरोसा नहीं तो आपको अपनी ही पत्नी में हर सुबह शाम रात एक छिनार औरत की शक्ल नजर आएगी.

चीयर्स.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

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