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ढेला मारने और कालिख पोतने की सनक

ढेलमारा गोसाईं की परंपरा के बारे में जब से पढ़ा है तब से बिहार के समस्तीपुर रेलवे जंक्शन के पास ढेल मारा गोसांई के मंदिर में दर्शन की इच्छा प्रबल है। मंदिर के गोसाईं यानी भगवान को मिट्टी के ढेला मारकर पूजा की जाती है। किवंदती है कि पूजा के इस व्यवहारिक तरीके का इजाद सदियों पहले इलाके के चोर के किसी सरदार ने किया था। ढेला मारकर  जजमान के सोने या जागने का पता लगाने वाले चोर पंडितों का यह पांडित्य मुझे उन सनकियों के लिए सबक जान पड़ता है जो इनदिनों ख्यात लोगों के चेहरे पर स्याही उडेलकर, पोस्टर पर कालिख पोतकर, जूता फेंककर या प्रतीकात्मक चांटा मारकर रातों रात सुर्खियों में आ जाने का स्वांग भर रहे हैं। इन पागलों को मशहूरियत की कीमत में भीड़ के लत्तमजूते का शिकार बनना पड़ता है। बेहतर होता कि समाज के ये पागल किसी ढेलमारा गोसांई का इजाद कर लेते और समस्तीपुर के चोरों की तरह चौर्य कर्म पर जाने से जूतम पैजार के पैमाने की परख कर लेते।

ढेलमारा गोसाईं की परंपरा के बारे में जब से पढ़ा है तब से बिहार के समस्तीपुर रेलवे जंक्शन के पास ढेल मारा गोसांई के मंदिर में दर्शन की इच्छा प्रबल है। मंदिर के गोसाईं यानी भगवान को मिट्टी के ढेला मारकर पूजा की जाती है। किवंदती है कि पूजा के इस व्यवहारिक तरीके का इजाद सदियों पहले इलाके के चोर के किसी सरदार ने किया था। ढेला मारकर  जजमान के सोने या जागने का पता लगाने वाले चोर पंडितों का यह पांडित्य मुझे उन सनकियों के लिए सबक जान पड़ता है जो इनदिनों ख्यात लोगों के चेहरे पर स्याही उडेलकर, पोस्टर पर कालिख पोतकर, जूता फेंककर या प्रतीकात्मक चांटा मारकर रातों रात सुर्खियों में आ जाने का स्वांग भर रहे हैं। इन पागलों को मशहूरियत की कीमत में भीड़ के लत्तमजूते का शिकार बनना पड़ता है। बेहतर होता कि समाज के ये पागल किसी ढेलमारा गोसांई का इजाद कर लेते और समस्तीपुर के चोरों की तरह चौर्य कर्म पर जाने से जूतम पैजार के पैमाने की परख कर लेते।

बताते हैं कि समस्तीपुर के ढेलमारा गोसाईं का मंदिर में अब पत्थर या ढेला मारकर सिर्फ चोर ही पूजा नहीं करते बल्कि के इस तरीके का चलन आम भक्तों ने अपना लिया हैं। खास मौकों पर ढेला मारकर पूजा करने वालों की इस मंदिर में भीड़ हुआ करता है। ढेला मारने की परंपरा को अब शगुन या अपशगुन की परख के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है। मतलब ढेल मारा गोसांई पर अब रात के घने अंधेरे में ही नहीं बल्कि भरी दोपहर में भी ढेला मारकर पूजा की जाने लगी है। पत्थर मारने यानी ढेलेबाजी से पूजा के इस दस्तूर के विस्तार ने बीते साल की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर की सरकार को काफी परेशान कर रखा था। बाद में भीड़ को जब ये बात समझ में आ गई कि पत्थर फेंककर सुरक्षा बलों के हाथों कुटाई के अलावा कुछ हासिल नहीं होता है तो मामला खुद-ब-खुद शांत हो गया। मुमकिन है कि सोनिया गांधी के पोस्टर पर कालिख पोतने वालों के साथ 24 अकबर रोड पर हाथ सफाई का जो दौर चला उससे बाकी सनकी घबराएंगे।

ढेलमारा गोसाईं की पूजा परंपरा की सोच को समझते हुए साफ लग रहा है कि जनार्दन द्विवेदी पर जूता फेंकने, शरद पवार को चांटा मारने, बाबा रामदेव पर स्याही उडेलने और सोनिया गांधी के पोस्टर पर कालिख पोतने वाले सनकी लोग किसी ढेलमारा गोसांई का सहारा क्यों नहीं लेते। क्योंकि हर घटना के बाद वारदात करने वाले शख्स की लत्तम जुताई से जमकर ठुकाई हुई है। फिर भी सनकी समझने को तैयार नहीं है कि यह असभ्य विरोध न सिर्फ गैरवाजिब है बल्कि नन सांइटिफिक भी हैं। क्योंकि इन सबने किसी ने ढेलमारा गोसाईं का चयन नहीं किया। ढेल मारा गोसाईं के अर्चकों से तुलना करने पर ऐसे शख्स इस दलील के साथ नाराज हो सकते हैं कि उन्होंने कोई चोरी नहीं की है बल्कि समाज के एक तबके के गुस्से का प्रतीकात्मक इजहार करने का जांबाजी भरा काम किया हैं।

इन सनकी शख्सों से सीधा और सरल सवाल है कि आपको गुस्से का प्रतीकात्मक इजहार करने को किसने कहा है? जब समाज निश्चित धीरज का परिचय दे रहा है। नकारात्मकता से हरसंभव गुरेज बरत रहा है। सहनशीलता का बेमिसाल परिचय दे रहा है, तो आपके अधैर्य का इजहार समाज के गुस्से का प्रतिबिंब कैसे बन सकता हैं? जाहिर तौर पर हाल की घटनाएं व्यक्तिगत सनक या किसी की व्यक्तिगत समस्या से ज्यादा कुछ नहीं है। यह उस किस्म की चोरी है जिसमें चौर्य कला में अनाड़ी चोर भीड़ की पकड़ में आ जाता है और भीड़ उसके विरोध के तरीके के साथ होने के बजाय उसपर ही हाथ आजमाने का काम करता है। हमारे समाज की सहनशीलता को समझने के लिए ढेलमारा गोसाईं के प्रति आमजन में बढ़ती आस्था को देखकर समझा जा सकता है। चोर के सुगम चोरी के लिए ईजाद किए गए तरीके का इस्तेमाल आम श्रद्धालु ढेलमारा गोसाईं पर शायद इस मकसद से ढेला मारता है कि हे गोसाईं तुम जगे रहो ताकि चोर हमारे घर के दरवाजे पर नहीं फटके।

एक बात और टीवी शो “बिग बॉस” के घर बंटी चोर की पेशी और उससे जुड़ी सिनेमाई कहानी ने महानगर के लोगों को धुंआधर चोरों की कहानी के प्रति लुभा रखा है। भोपाल में बंटी चोर की गिरफ्तारी के बाद से दिल्ली पुलिस की आंखें चमक रही है कि अब बरसों से अनसुलझे चोरी के कई मामलों का पेंच खुल सकता है। लेकिन बता दूं कि शहरी हुनरमंद चोरों से बेहतर गांव-गांव प्रचलित चोरों की कहानियां हैं। ज्यादातर गांव वालों के पास पुऱखों के जमाने से प्रचलित कई शंटी-बंटी चोरों की कहानियों से भरा पूरा पिटारा हुआ करता है। उस्ताद चोरों की कहानी सुनाते वक्त सीधे सरल ग्रामीणों के आंखों की चमक में आप पढ़ सकते हैं कि उन्होंने चोरों की चोरी से नहीं बच पाने को नियति मान लिया है। कई तो विश्वास के साथ बताते हैं कि चौर्य कर्म अठारह कलाओं में से एक कला है। इसलिए इसे पाप मानने के बजाय आजीविका का साधन मानना चाहिए। चोरी को कला मानकर सम्मान देने की मजबूरी देश के ग्रामीण इलाकों के खोखली सुरक्षा तंत्र की गवाही हैं। साथ ही यह मजबूरी ही बड़ी से बड़ी चोरी पर गांव वालों को धैर्य बनाए रखने की ताकत और सबक देते हैं। हमारे समाज ने चोरी के बाद धैर्य बनाए रखने और तनिक भी विचलित नहीं होने का ठोस संस्कार ऐसे ही पृष्ठभूमि से हासिल किया है। चोरों के खिलाफ इरातन विद्रोह और चोरी की सूचना पर धैर्य को जवाब देने से रोकने के लिए ही मेरे मन में ढेलमारा गोसाईं के दर्शन की प्रबल इच्छा बढ़ती जा रही है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने 'आज', 'देशप्राण', 'स्पेक्टिक्स इंडिया', 'करंट न्यूज', होम टीवी, 'माया', दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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