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‘जस्टिस काटजू जी, पत्रिका ने पत्रकारिता के मानकों का उल्लंघन किया है’

सेवा में, न्यायमूर्ति श्री मार्कंडेय काटजू, अध्यक्ष, भारतीय प्रेस परिषद, नयी दिल्ली. सन्दर्भ : पत्र क्रमांक 13/97/11-12, January 18, 2012. महोदय, कोई भी पद वैधानिक रूप से कितना महत्वपूर्ण है या उसके पास कितनी शक्ति है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि उस पद पर बैठा कौन है. तभी तो बिना किसी पद के भी गांधी दुनिया पर राज कर रहे हैं और बड़े-बड़े पदों पर बैठे बौने आज समस्या बने हुए हैं. जिस तरह श्री टी. एन. शेषण के चुनाव आयुक्त बन जाने के बाद लोगों को पता चला कि चुनाव आयोग जैसी भी कोई संस्था देश में है, उसी तरह आपके प्रेस परिषद में आने पर आम लोगों को इस नख-दंत विहीन संस्था के बारे में जानकारी मिली.

सेवा में, न्यायमूर्ति श्री मार्कंडेय काटजू, अध्यक्ष, भारतीय प्रेस परिषद, नयी दिल्ली. सन्दर्भ : पत्र क्रमांक 13/97/11-12, January 18, 2012. महोदय, कोई भी पद वैधानिक रूप से कितना महत्वपूर्ण है या उसके पास कितनी शक्ति है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि उस पद पर बैठा कौन है. तभी तो बिना किसी पद के भी गांधी दुनिया पर राज कर रहे हैं और बड़े-बड़े पदों पर बैठे बौने आज समस्या बने हुए हैं. जिस तरह श्री टी. एन. शेषण के चुनाव आयुक्त बन जाने के बाद लोगों को पता चला कि चुनाव आयोग जैसी भी कोई संस्था देश में है, उसी तरह आपके प्रेस परिषद में आने पर आम लोगों को इस नख-दंत विहीन संस्था के बारे में जानकारी मिली.

वास्तव में आपने आते ही पत्रकारों के मानसिक स्तर के बारे में जितनी बातें कही थी वह अक्षरशः सत्य है. आपकी ये भी अपेक्षा सही है कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया को भी प्रेस कोंसिल के अंदर में लाया जाय और इसे ‘मीडिया कोंसिल’ बना कर कुछ दंड देने का अधिकार भी इस संस्था के पास हो. उलेखनीय है कि जब इलेक्ट्रोनिक मीडिया अस्तित्व में आया तो उसने स्वयंभू ढंग से अखबारी पत्रकारों के सारे अधिकार हथिया लिए लेकिन अखबारों पर नियमन के लिए बनायी गयी संस्था, ‘प्रेस परिषद’ से वो बाहर रहे. यानी मीठा-मीठा गप्प-गप्प, कड़वा-कड़वा थू-थू.

ऐसे दोहरेपन से बचाने की बात कर वास्तव में न केवल आपने एक अच्छे बहस की शुरुआत किया है बल्कि सर्वोच्च न्यायिक संस्था में रहने के अनुभव का लाभ लेते हुए समानता के सबसे पवित्र संवैधानिक अधिकार की भी रक्षा करने का बीडा आपने उठाया है, इसके लिए आपको अशेष  साधुवाद. लेकिन हाल में आपके द्वारा छत्तीसगढ़ शासन को पत्रिका अखबार के संबंध में लिखे गए पत्र को पढ़ कर ऐसा लगा कि वास्तव में कुछ निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा आपको गुमराह करने का प्रयास किया गया है. यहां पर दो टुक यह कहना चाहूंगा कि ‘पत्रिका अखबार’ ने छत्तीसगढ़ में न केवल पत्रकारिता के तमाम स्थापित मूल्यों का उल्लंघन किया है बल्कि न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत का भी गला घोटा है.

महोदय, संक्षेप में मामला मामला ये है कि छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के विधान सभा में विपक्ष के एक सदस्य ने नियमित कार्यवाही के दौरान एक मामला उठाते हुए वहां की सरकार पर अवैध खनन के कथित घोटाले का मामला उठाया. अपने वक्तव्य में उस विधायक ने ये कहा कि इस घोटाले में पडोसी राज्य के एक नेता का भी हाथ है. बस….पहले से ही खार खाए बैठे पत्रिका ने इस वक्तव्य को एक ‘मौके’ के रूप में लपक कर मध्य प्रदेश की उस सामान्य खबर को छत्तीसगढ़ में लीड बनाते हुए उस नेता को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में चिन्हित कर लगभग पूरे पेज में यह खबर छापी कि ड़ा. रमन सिंह अपने रिश्तेदारों के माध्यम से मध्य प्रदेश में ‘बेल्लारी’ से भी बड़े घोटाले में लिप्त हैं.

न्यायमूर्ति, शायद आपने अपने पूरे कैरियर में इस तरह का मामला नहीं देखा होगा जब पड़ोसी राज्य में हुए किसी कथित घोटाले की खबर उस प्रदेश के बजाय दुसरे प्रदेश के मुख्यमंत्री के बारे में प्रकाशित किया जाय. अगर ऐसा कोई घोटाला हुआ होता तो ज़ाहिर है मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री या वहां के खनिज मंत्री पहले लपेटे में आते, उनके विरुद्ध बात होती. जबकि इस अखबार का मध्य प्रदेश में भी काफी पहले से संस्करण है लेकिन बजाय वहां के शासन को कठघडे में खड़ा करने के दो टुक पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री को दोषी बता देना कौन सी पत्रकारिता है? आपको जान कर ताज्जुब होगा कि खबर प्रकाशित होने के अगले ही दिन विपक्ष के उस विधायक महोदय ने बयान जारी कर साफ़-साफ़ यह कहा कि उन्होंने ड़ा. रमन सिंह का नाम नहीं लिया है. लेकिन बावजूद इसके नए-नए आपत्तिजनक कार्टून बना, हर तरह के दुष्प्रचार का उपयोग कर व्यक्ति विशेष को बदनाम करने का क्रम आज तक जारी रखा गया है. यह अन्य अपराधों के अलावा यह विधान सभा का अवमानना भी है क्यूंकि इस मामले में विधान सभा की कार्यवाई को तोर-मरोड़ कर पेश किया गया है.

सर, आपने अभी हाल ही में जस्टिस पी.वी. सावंत मामले में टाइम्स नाऊ चैनल के विरुद्ध न्यायालय द्वारा 100 करोड रूपये का जुर्माना लागाये जाने के मामले पर गौर किया है. ऊपरी अदालत ने भी उस फैसले के विरुद्ध सुनवाई करने से पहले 20 करोड नगद और 80 करोड की कोरपोरेट गारंटी ज़मानत के रूप में लेने के बाद ही आगे सुनवाई पर विचार करने की बात कही है. आपकी बात से सहमत हुआ जा सकता है कि वह कठोर फैसला है. लेकिन उस हाल ही के फैसले के आलोक में कृपया पत्रिका मामले पर गौर करें. ज़ाहिर है ‘टाइम्स नाऊ’ वाले मामले में तो ‘इंटेंशन’ भी साबित नहीं होता है. शायद एक मानवीय भूल थी जिसके कारण किसी अन्य के बदले जस्टिस सावंत का चेहरा दिखा दिया गया था. फिर संज्ञान में आते ही चैनल ने बार-बार माफी भी मांगी. लेकिन ‘पत्रिका अखबार’ की हठधर्मिता तो देखिये कि माफी मांगना तो दूर, रोज ऐसे-ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर मुख्यमंत्री के विरुद्ध व्यक्तिगत विद्वेष फैलाने में लगा है जिसका कोई सानी नहीं है. क्या यह माना जाय कि पत्रिका के अलावा अब कोई पत्रकारिता करना नहीं जानता?

आप छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाले सारे अखबार मंगवा कर देख लीजिए, कहीं भी आपको इस कथित घोटाले की कोई खबर नहीं दिखेगी. तो क्या सीधे यह मान लिया जाय कि सब अखबार बिक चुके हैं और इस देश में पत्रकारिता की लाज बस पत्रिका के हाथ में है? नहीं अध्यक्ष महोदय, बल्कि इसके उलट ये मामला सीधे तौर पर ‘पत्रिका बनाम छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता’ http://bhadas4media.com/article-comment/1042-2011-12-12-08-01-11.html का है. यहां तक कि अति प्रतिष्ठित माने जाने वाले दैनिक इन्डियन एक्सप्रेस http://www.indianexpress.com/story-print/889118/  तक ने इसी मामले में एक टीवी चैनल के ब्लेकमेलिंग की खबर पहले पन्ने पर छापी थी. पत्रिका के खबर की तर्ज़ पर ही उस न्यूज़ चैनल ने कुछ दिन तक मुख्यमंत्री के विरुद्ध अभियान चलाया था लेकिन कोई सबूत हाथ नहीं आने पर उस चैनल ने सार्वजनिक रूप से खेद भी जताया ( देखें- http://bhadas4media.com/print/1353-2011-12-27-05-27-04.html और https://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/553/–media-world/cm-chhattisgarh-25-12-2011.html). लेकिन पत्रिका अपने खास एजेंडे के कारण अपनी हठधर्मिता पर अड़ा हुआ है और निश्चित ही न्यायिक उपचार के अलावा दूसरा कोई भी विकल्प इस मामले में पीड़ित पक्ष के पास बचा हुआ नहीं है.

आश्चर्य तो ये है कि खबर में ये जिक्र नहीं नहीं किया गया है कि पत्रिका के पत्रकारों को किस तरह से प्रताडित किया जा रहा है. हां पत्रिका में ही प्रकाशित इस इतना ज़रूर ज्ञात हो रहा है कि अखबार पर दर्जनों मुकदमा होने को समूह के पत्रकारों की प्रताडना के रूप में व्याख्यायित कर लिया गया है.  तो सर, आप बेहतर जानते होंगे कि प्रेस कोंसिल सहित किसी भी संस्था के पास न तो ये अधिकार है और न ही कोई निष्पक्ष संस्था किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को न्यायालय जाने से रोक सकता है. अगर छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से लोग पत्रिका अखबार के विरुद्ध मुकदमा कर रहे हैं या जैसा कि शिकायत की गयी है, अगर ऐसे मुक़दमे कराये भी जा रहे हों तो अखबार को उसका सामना करना चहिये न कि आपके यहां शिकायत कर न्यायिक उपचार पाने के व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार को बाधित करने की बेजा कोशिश की जानी चाहिए. इसके अलावा यह भी तथ्य है कि प्रदेश में उक्त अखबार के विरुद्ध जगह-जगह प्रदर्शन हुए हैं, अखबार की प्रतियां भी जलाई गयी है तो ऐसा शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी कार्यकर्ताओं या आहत समूहों का मौलिक अधिकार ही है, इसे भी कम से कम पत्रकारों को प्रताडित किया जाना तो नहीं कहा जा सकता.

सर, आपके जैसे प्रख्यात कानूनविद और सर्वोच्च न्यायालय के यशस्वी न्यायमूर्ति रहे व्यक्ति को क़ानून या संविधान के बारे बताना निश्चय ही धृष्टता है फिर भी संदर्भवश यह उल्लेख करना चाहूंगा कि बोलने की आज़ादी किसी भी प्रेस को अलग से नहीं दिया गया है बल्कि समाचार माध्यम, आम आदमी को मिले अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का ही इस्तेमाल करते हैं. आप बेहतर जानते हैं कि संविधान का अनुच्छेद (19) ही अभिव्यक्ति की आजादी पर युक्ति-युक्त निबन्धन भी लगाता है. न्यायालय ने अपने विभिन्न फैसले में इस प्रतिबन्ध के उल्लंघन को दंडनीय भी बताया है. उन फैसलों का जिक्र यहां करना इसलिए ज़रूरी नहीं क्यूंकि आप उन फैसलों के बारे में बेहतर जानते हैं.

महोदय, चूंकि आप संप्रति प्रेस परिषद के अध्यक्ष हैं और खुद भी काफी अच्छे विचारक और लेखक भी हैं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में रामचरितमानस का एक चौपाई उद्धृत करने की अनुमति चाहूंगा. हनुमान जी को सीता माता तक सन्देश पहुचाने के लिए कहते हुए भगवान राम के मुख से गोस्वामी जी ने कहलाया है ‘कहेहू ते कछु दुःख घटि होई, काह कहोऊ यह जान न कोई, तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा, जानत प्रिया एक मन मोरा.’ यानी कहने से ज़रूर दुःख हल्का हो जाता है लेकिन किसको कहा जाय यह बेहद ज़रूरी है. इसी तरह जब रहीम ‘निज मन के व्यथा मन ही राखो गोय’ कहते हैं तब भी इसका अर्थ शायद यही होता है कि ‘अभिव्यक्ति’ सदा कुछ मर्यादाओं के अधीन होना चाहिए. कुछ भी बोलते रहना तो आज़ादी नहीं बल्कि उच्छृंखलता ही होता है. पत्रकारिता के छात्रों को भी छः ककार ( 5W+1H) पढाए जाते हैं जिसका आशय यही होता है कि ‘अभिव्यक्ति’ हमेशा ‘कौन, कहां, किस तरह, किसके लिए’ आदि मार्यादाओं के अधीन होना चाहिए. या नहीं तो जैसा कि पायथागोरस के मत को किसी शायर ने जिस तरह स्वर दिया है वैसा कि…. ऐसी-वैसी बातों से तो खामोशी ही बेहतर है, या कुछ ऐसी बात कहो जो खामोशी से बेहतर हो.

सर, जैसा कि मैंने पत्रिका अखबार में ही पढ़ा, आपने मुख्यमंत्री और अधिकारियों को भेजे पत्र में महाराष्ट्र और ज़म्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में दिए गए वकीलों के उदाहरण का हवाला दिया है. तो विनम्रता से कहना चाहूंगा कि किसी मुवक्किल का केस लड़ने से भले कोई वकील दोषी नहीं हो जाता लेकिन वकालत और पत्रकारिता में मूलभूत फर्क है. जहां वकीलों का ‘पक्षपाती’ होना उसके पेशे का गुण होता है वहीं पत्रकारों से हमेशा निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है. अगर वो खुद ‘पक्ष’ हो जाय, या किसी दुर्भावनावश दुष्प्रचार में खुद शामिल हो जाय तो उसे ‘बोलने के मौलिक अधिकार पर लगे युक्तियुक्त निबंधन’ का दोषी ही माना जा सकता है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षपाती होने के अपने पेशागत गुण के बावजूद अगर कोई वकील भी किसी गवाह को अनावश्यक रूप से प्रेरित करता हुआ पाया जाय तो वो दंड का भागी होता है जैसा उत्तर प्रदेश के एक मामले में एक वरिष्टतम वकील का लाइसेंस निलंबित कर न्यायालय ने किया भी था.

छत्तीसगढ़ में पत्रिका किस तरह दुर्भावना से काम कर रहा है इसका एक अन्य उदाहरण देना चाहूंगा. अभी हाल में शासन ने प्रदेश में नौ नए जिले बनाए हैं. कुछ जिले तो ऐसे बनाए गए हैं जिसकी मांग दशकों से की जा रही थी. बनाए गए जिलों में कुछ तहसील ऐसे हैं जो सौ साल से अधिक पुराने थे. पिछले दिनों उन जिलों के लोकार्पण की शुरुआत हुई. किसी को भी यह जान कर विस्मय हो सकता है कि तहसील रहे उन छोटी जगहों पर लाख-लाख लोगों की भीड़ उन लोकार्पण समारोहों में इकट्ठा हुई. लेकिन समारोह के शुरू के दिन का पत्रिका की प्रति उठा कर देख लें, आपकों एक पंक्ति की खबर इन समारोहों की नहीं दिखेगी. हालांकि निस्संदेह कौन सी खबर कहाँ लगाया जाय या नहीं लगाया जाय यह अखबार विशेष का विशेशाधिकार है. कोई अन्य उसका एजेंडा सेट नहीं कर सकता. लेकिन इस उदाहरण से पत्रिका का दुराग्रह तो पता चलता ही है.

इसके अलावा इसने 14 जनवरी 2012 को लिखे अग्रलेख में साफ़ तौर पर यह लिखा कि ‘स्थानीय मीडिया’ यहां नेता, अफसर और माफिया के साथ मिला हुआ है. और ये चौकरी ‘दीमक की तरह राज्य को खोखला कर रही है.’ इस तरह इस अखबार ने सीधे क्षेत्रीयता के आधार पर विद्वेष फैला सभी स्थानीय पत्रकारों को अपमानित करने का काम भी किया है. ऐसे ही एक बयान के आधार पर पिछले साल रायपुर प्रेस क्लब ने कुछ मानवाधिकारियों के क्लब में प्रवेश को प्रतिबंधित किया था. सर, ये तथ्य है कि क्षेत्रीय मीडिया अभी भी राष्ट्रीय कहे जाने वाले माध्यमों से ज्यादा सरोकारपूर्ण है, ऐसा आपने भी अपने हाल के एक बयान में स्वीकार किया था. तो पत्रिका को चाहिए कि या तो वो स्थानीय पत्रकारों के खिलाफ सबूत पेश करे या उनसे माफी मांगे.

सर, निश्चय ही प्रेस की आज़ादी को आप सभ्य समाज में लोकतंत्र का पैमाना समझ सकते हैं. दुसरे शब्दों में ये कहा जा सकता है कि कौन सा समाज कितना सभ्य है इसे हम, उस समाज में ‘असहमत’ होने की कितनी आज़ादी है, इससे तौल सकते हैं. लेकिन विनम्रता से यह कहना होगा कि ये अधिकार राजनीति से जुड़े हुए लोगों को भी तो प्राप्त है. सर, इस भरोसे के संकट के ज़माने में, राजनीति की इस काज़ल कोठरी में तो बेदाग़ रहना एक बड़ी चुनौती है. बड़ी ही मेहनत और तपस्या से बनायी गयी किसी की छवि भी किसी झूठे आरोप के एक झोंके से तार-तार होने को काफी है. जैसा कि बसीर बद्र साहब ने कहा है ‘ लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम रहम नहीं खाते बस्तियां जलाने में.’ समाचार उद्योग अगर अपने छोटे-छोटे ईगो, अपने अधिकारों के घमंडवश या फिर कोई स्वार्थ पूरा नहीं होने को कारण बना चरित्र हनन करना शुरू कर दे तो ‘मीडिया और राडिया’ के बीच मिटते फर्क के इस कठिन समय में लोकतंत्र के जबरन बन गए चौथे स्तंभ द्वारा भरोसे का कत्ल किया जाना ही तो माना जाएगा.

संदर्भवश आप इस तथ्य पर भी गौर करें कि जहां एक विशुद्ध कथात्मक माध्यम होने के बावजूद फीचर फिल्मों को अपना एक-एक फ्रेम प्रमाणित करने के बाद ही सार्वजनिक रूप से प्रसारित करने की वैधानिक मजबूरी है, वहीं सच का झंडाबरदार होने का दावा करने वाले समाचार माध्यमों को किसी भी संस्था के प्रति जिम्मेदार नहीं बनाया गया है. प्रेस को चाहिए कि इस आज़ादी का उपभोग करते हुए ज्यादा विनम्र और जिम्मेदार बने. लेकिन यह कहते हुए ज़रूर अफ़सोस हो रहा है कि ऐसी कोई विनम्रता या जिम्मेदारी पत्रिका के इस मामले में तो कम से कम देखने में नहीं आयी है.  

महोदय, आप दशकों तक भारत की न्याय व्यवस्था के एक बड़े स्तंभ रहे हैं. निश्चय ही इस नए दायित्व में भी आप एक नजीर कायम करेंगे ऐसी उम्मीद है. कम से कम आपके जैसा कानूनविद तो, किसी पर मुकदमा किये जाने को ‘प्रताडना’ के रूप में व्याख्यायित नहीं ही करेगा. साथ ही कानून के पहरुए रहे आप जैसे विद्वान ये भी मानेंगे ही कि धरना-प्रदर्शन आदि भी व्यक्ति या समूह का मौलिक अधिकार है. हालांकि इसी मामले में एक टीवी चैनल ने सार्वजनिक खेद जताया है लेकिन यह अखबार, रत्ती भर भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है. अतः साग्रह निवेदन है या तो इस मामले में परीक्षण करा पत्रिका के इस कदम की परिषद द्वारा भर्त्सना किया जाय या फिर इस मामले में न्यायालय का फैसला होने तक के लिए धैर्य रखा जाय. अभिव्यक्ति के संबंध में ‘वाल्तेयर’ के एक चर्चित उद्धरण के भावानुवाद यहां काफी प्रासंगिक है तुम्हें अपनी अभिव्यक्ति का पूरा अधिकार है. तुम्हारे इस अधिकार की रक्षा हेतु हम प्राण भी दे सकते हैं. लेकिन मुझे भी ये कहने का अधिकार है, कि तुम गलत हो. धन्यवाद.   

पंकज झा

समाचार संपादक
'दीपकमल' मासिक पत्रिका
रायपुर (छत्तीसगढ़)


जस्टिस काटजू ने रमन सिंह को जो पत्र लिखा था, उसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://www.bhadas4media.com/edhar-udhar/1928-2012-01-19-10-38-28.html

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