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ये पचौरी की उपलब्धि नहीं, मीडिया को शर्मसार करने वाली वारदात है

पंकज पचौरी प्रधानमंत्री के किसी मामले में सलाहाकार बन गए ये उनके लिए या उनके नक़्शे कदम पर चलने वाले कुछ नए नवेले पत्रकारों के लिए उपलब्धि की बात भले हो, लेकिन सच कहूँ तो मीडिया तो फिर शर्मसार ही हुई है। सवाल ये नहीं है कि पचौरी का जाना उनके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है। सवाल ये है कि हमारे वरिष्ठ पत्रकार आने वाली पत्रकारिता की पीढ़ी को कैसी राह दिखा रहे हैं?

पंकज पचौरी प्रधानमंत्री के किसी मामले में सलाहाकार बन गए ये उनके लिए या उनके नक़्शे कदम पर चलने वाले कुछ नए नवेले पत्रकारों के लिए उपलब्धि की बात भले हो, लेकिन सच कहूँ तो मीडिया तो फिर शर्मसार ही हुई है। सवाल ये नहीं है कि पचौरी का जाना उनके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है। सवाल ये है कि हमारे वरिष्ठ पत्रकार आने वाली पत्रकारिता की पीढ़ी को कैसी राह दिखा रहे हैं?

जो भी हुआ वो कोई रातों-रात नहीं हुआ या ऐसा भी नहीं कि पचौरी का कोई बुलेटिन देख कर मनमोहन सिंह का दिल उनके टैलेंट पर आ गया और रातों-रात बुला कर अपना सलाहकार बना लिया। मीडिया की तख़्त से सटा यह दीमक मीडिया को बहुत दिनों से चाट रहा था। आखिर जब यह पूर्व नियोजित नियुक्ति है तो इससे कैसे नकार दिया जाय कि पचौरी जी ने इस महाउपलब्धि के लिए जुगाड़बाजी नहीं की होगी या उनका इरादा पहले नहीं बन चुका होगा? अगर इस बात में रत्ती भर भी सच्चाई नज़र आती है कि पचौरी साहब का यह कार्यक्रम काफी दिनों से चल रहा था, तो क्या यह सही नही है कि इससे उनकी पत्रकारिता में निष्पक्षता प्रभावित हुई होगी? एक वरिष्ठ पत्रकार की इच्छा में अगर अगर सत्ता की लोलुपता और लोभ की पराकाष्ठा हो तो शायद उसे पत्रकार मानना उचित नही होगा। प्रमुख सवाल यह भी है कि पंकज पचौरी आखिर पत्रकारिता को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर एक सत्तावादी विचारधारा की गोद में आसन क्यों जमा बैठे, जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लग चुके हैं? जो भी हुआ वो रातों-रात नहीं हुआ इसको होने में पर्याप्त समय लगा होगा और पचौरी साहब इसके लिए कब से ताक में होंगे और सेटिंग बना रहे होंगे, इसका अनुमान लगाना भी आसान नही।

लेकिन बड़ा सवाल यह है जिस व्यक्ति के मन में सत्ता की लोलुपता घर की हो, क्या वो पिछले कुछ सालों से निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहा होगा? अब तो पचौरी साहब के पत्रकारिता कैरियर पर ही संदेह हो रहा है, उनके कैरियर से सत्ता की चाटूकारिता की बू आ रही है। माफी चाहूँगा, कहीं भी एक व्यक्तिगत फैसले के तौर पर मैं पचौरी साहब के निर्णय पर सवाल नहीं उठा रहा। यहाँ मीडिया में बढ़ते राजनीतिक सेटिंग्स के चलन पर मेरा इशारा ख़ास कर है। अगर यही चलन रहा तो जैसे अपराध का राजनीतिकरण हुआ है वैसे पत्रकारिता का राजनीतिकरण हो जाएगा। अगर कल को पचौरी साहब राज्य सभा में दिख जाय तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यहाँ एक पत्रकार की मानसिकता पर सवाल है कि वो अगर इन उद्देश्यों के साथ मीडिया में है तो भला निष्पक्ष कहां तक रह पायेगा? पत्रकारिता का उद्देश्य अगर सत्तागत हो गया तो क्या यह मीडिया का दुरुपयोग नहीं माना जाना चाहिए? पत्रकारिता के बूते सत्ता के सिरहाने पहुंचने वाले पंकज पचौरी ने व्यक्तिगत रूप से भले ही कोई बड़ी उपलब्धि हासिल की हो, लेकिन यह बात तो तय है कि पचौरी के इस कदम ने मीडिया की आगामी पीढ़ी के लिए एक बुरा उदाहरण, उद्देश्य एवं लक्ष्य प्रस्तुत किया है। जिस पर यह कथित चौथा खम्भा शर्मसार ही रहेगा भले ही पचौरी साहब की रुतबा में कितना भी इजाफा हो जाय।

शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

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